मोदी को हम एक पी.एम. की बजाय प्रचारक के तौर पर देखेंगे

5/9/2021 3:27:24 AM

4 राज्यों तथा एक केंद्र शासित प्रदेश के नतीजों की घोषणा को एक सप्ताह बीत चुका है। प्रत्येक पार्टी ने कुछ हद तक जीत का दावा किया है। यदि पूरी जीत नहीं तो भाजपा से ज्यादा कोई नहीं। एक आम सच्चाई यह है कि 4 राज्यों में स्थिर सरकारें हैं और जीतने वाले पक्ष को पूर्ण बहुमत मिला है।

हारने वाला पक्ष राज्य विधानसभा में विपक्ष के तौर पर बैठने के लिए स मानजनक सं या खो रहा है। लोग विजेता हैं। लोगों के अलावा पार्टियों में निर्वाविद विजेता तृणमूल कांग्रेस, लै ट डैमोक्रेटिक फ्रंट और डी.एम.के. है। भाजपा ने असम को जीता है मगर केरल और तमिलनाडु में बुरी तरह हार गई है। कांग्रेस ने असम और केरल में प्रमुख विपक्ष होने का अधिकार अर्जित किया है मगर पश्चिम बंगाल में यह शून्य दिखाई दी। 

इन सभी चुनावी युद्धों में मोदी बनाम दीदी का मुकाबला देखने लायक है। मोदी ने ममता को दीदी ओ दीदी का उच्चारण कर उन पर कटाक्ष किया जोकि एक प्रधानमंत्री होने के नाते पूरी तरह से गलत है। उन्होंने यह कह कर समझाया कि वह केवल दो बार दीदी शब्द का उच्चारण कर रहे थे। मगर बीच में ‘ओ’ शब्द का मतलब समझाने में वह असफल रहे। ममता बनर्जी की परिभाषित छवि उनकी व्हीलचेयर थी जिसके माध्यम से वह विजयी रहीं। केरल की लड़ाई भी कम नहीं थी जहां पर यू.डी.एफ. ने एल.डी.एफ. से हार प्राप्त की। लोकप्रिय वोट का 0.8 प्रतिशत रहा। 

स्तनधारी और पुन: आविष्कार
मेरी परिकल्पना यह है कि क्षेत्रीय दल लोगों के अधिक निकट हैं और यह बात एक बार फिर से सही साबित हुई। एक क्षेत्रीय पार्टी लोगों की भाषा बोलती है। उनकी संस्कृति को बेहतर जानती है और समाज के बदलते मापदंडों को जल्द ही पहचान लेती है। एक क्षेत्रीय पार्टी परिवर्तनों का चतुराई से पालन करती है और उन्हें जल्द ही समायोजित कर लेती है। राष्ट्रीय पाॢटयां बड़े स्तनधारी जीवों की तरह हैं। वे सबसे बुद्धिमान होती हैं मगर परिवर्तन ग्लेशियर के फटने की गति से होता है।

कांग्रेस ने एक या फिर दो कारणों से बदलने की कोशिश की। पुन: आविष्कार करने में यह नाकामयाब रही। आगे बढऩे के लिए पुन: आविष्कार करना एकमात्र रास्ता है। भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के फिर से आविष्कार किए गए तत्व बुद्धिमान प्रवेक्षकों को दिखाई देते हैं। 

भाजपा जल्द ही बड़ा बनने और सत्तावादी नेता को स्वीकार करने की कीमत चुका रही है। भाजपा का ‘वन पार्टी’ बनना क युनिस्ट पार्टी ऑफ चाइना के बराबर है। मोदी को इससे ज्यादा खुशी नहीं मिल सकती और वह शी जिनपिंग बन रहे हैं। उनके रास्तेे में जो खड़े हैं वह संविधान और अलग समय पर होने वाले राज्यों के चुनाव हैं। वन नेशन, वन इलैक्शन जैसे नारे से लोग लुभाए गए। मोदी का मु य लक्ष्य एक साथ चुनाव (संसद और राज्य विधानसभाओं के लिए)को स्वयं में एक जनमत संग्रह में परिवर्तित करना है। ज

हां तक संविधान का सवाल है वे धैर्यपूर्वक प्रतीक्षा करेंगे जब तक कि राज्यसभा में दो तिहाई बहुमत न हो जाए और आधे राज्य भाजपा सरकारों के अंतर्गत न आ जाएं। हालांकि ज्यादातर मतदाताओं की बहुसं या ने मोदी के डिजाइनों को भांप लिया है और वह इसका अनुसरण नहीं करेंगे। इसके अलावा अगले तीन वर्ष 2021 से बहुत अलग नहीं होंगे।
2022 में उत्तर प्रदेश, गोवा, मणिपुर, पंजाब, उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश और गुजरात में विधानसभा चुनाव होंगे और 2023 में मेघालय, नागालैंड, त्रिपुरा, कर्नाटक, छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश, मिजोरम, राजस्थान और तेलंगाना में विधानसभा चुनाव होंगे। 2024 में लोकसभा चुनाव होंगे। हम मोदी को एक प्रधानमंत्री की बजाय प्रचारक के तौर पर देखेंगे। 

दुख और मौत
अर्थव्यवस्था को महामारी की दो लहरों से आघात पहुंचा है और इस बात का यकीन नहीं कि यहां पर तीसरी और चौथी लहर भी होगी। सुस्त अर्थव्यवस्था लोगों को मार रही है। कारोबार बंद पड़े हैं। रोजगार छिन चुके हैं (बेरोजगारी दर 8 प्रतिशत पर) और उपभोक्ता मूल्य मुद्रास्फीति बढ़ रही है। पूंजी भारत से भाग रही है। सरकार के पास खर्च को बनाए रखने के लिए और अधिक उधार लेने के अलावा कोई विकल्प नहीं है। मगर सरकार लहर को पलट नहीं सकती। 

मध्यम वर्ग द्वारा एक सबसे बड़ा सबक सीखा गया है। उन्होंने माना कि ‘मोदी है तो मुमकिन है’ लोगों ने अपने समुदायों, कालोनियों के गेट बंद कर दिए। उन्होंने थालियां बजाईं और दीये जलाए। इसके अलावा घर से काम किया। गरीब खासकर दैनिक मजदूर और प्रवासी श्रमिकों की अनकही पीड़ा से अपनी आंखें बंद कर लीं। आज वे सरकार की अक्षमता के कारण खुद  सिलैंडर और अस्पताल के बिस्तर के लिए भीख मांग रहे हैं और अस्पतालों के गलियारों में बैठे नजर आते हैं। प्रत्येक दिन किसी न किसी परिवार, रिश्तेदार, दोस्त या अजनबी की मौत का समाचार आता है। मृत्यु हम में से हरेक के करीब इतनी कभी नहीं रही। 

एक गंभीर भविष्य
सरकार ने महामारी और अर्थव्यवस्था दोनों पर अपना नियंत्रण खो दिया है। जीवन और आजीविका दोनों ही बचाए जाने लायक हैं और इन दोनों को ही बड़ी मात्रा में धन की आवश्यकता होती है जिसकी आपूॢत बेहद कम है। सरकार के पास राजकोषीय घाटे को बढ़ाने के अलावा कोई विकल्प नहीं है और मोदी के पास ऐसा करने की हि मत नहीं है। उनकी वित्तमंत्री उनसे सलाह लेने के लिए बेहद डरपोक हैं और प्रधानमंत्री के सलाहकार परेशान हैं।

नतीजन एक अप्रत्याशित त्रासदी देखी जा रही है जिसने करोड़ों परिवारों को तबाह करके रख दिया है। सम्राट और उसके मंत्री बिना कपड़ों के हैं। विश्व के मीडिया ने यह सब देखा है। भारतीय मीडिया अब हरकत में है। अपना आक्रोश दिखाने के लिए लोग प्रत्येक चुनाव की ओर बढ़ रहे हैं जिसका उदाहरण यू.पी. के पंचायती चुनाव थे। 2021 में एक हार मिली जो 2022 और 23 में भी देखने को मिलेगी।-पी.चिदंबरम


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