नदी जोड़ व तालाब बनाने से होगा कारगर ‘जल प्रबंधन’

8/28/2019 3:09:55 AM

बड़ी हैरानी की बात है, एक ही समय में भारत के पूर्वी प्रदेशों में बाढ़ से, शेष भारत के आधे से ज्यादा भाग में भयंकर सूखे से और उत्तर के पहाड़ी प्रदेशों उत्तराखंड, जम्मू-कश्मीर और हिमाचल के वनों में आग लगने से तबाही मच जाती है। 

सरकार चाहे तो क्या नहीं हो सकता? भारत में भारी सूखे की हालत में ऐसे उदाहरण भी मिल रहे हैं, जैसे रेगिस्तान में लोगों द्वारा खोदे गए तालाबों के कारण फसलें लहलहा रही हैं, वे स्थान रेगिस्तान में नखलीस्तान (हरा-भरा क्षेत्र) की तरह नजर आ रहे हैं। तालाब खोदना भारत की प्राचीन परम्परा है। ऋग्वेद में भी तालाबों का उल्लेख मिलता है, चाणक्य ने ‘अर्थशास्त्र’ में भी तालाबों द्वारा खेती को सींचने की बात लिखी है। 

पिछले लगभग 6 सालों से भारत में खाद्य पदार्थों के उत्पादन में लगातार गिरावट आ रही है। इसका मुख्य कारण वर्षा का लगातार कम होना है। परिणामस्वरूप भारत के एक बड़े भू-भाग में हर वर्ष सूखा पड़ रहा है। भारत में 72 प्रतिशत ऐसी भूमि है जहां प्रतिवर्ष औसत 1150 मि.मी. से भी कम वर्षा होती है। इसमें 30 प्रतिशत ऐसी भूमि है, जहां 750 मि.मी. से भी कम वर्षा होती है। भारत में कुल वर्षा में से 73.7 प्रतिशत केवल दक्षिण-पश्चिम मानसून पवनों द्वारा जून से सितम्बर के बीच होती है। शेष आठ महीनों में केवल 26.3 प्रतिशत वर्षा होती है। वर्षा के इस 73.7 प्रतिशत भाग को ही संभालने की जरूरत है। इसका लगभग आधा भाग बाढ़ का कहर ढहाता हुआ नदियों द्वारा बह कर समुद्र में चला जाता है। इसलिए भारत में पानी का भूमिगत स्तर भी लगातार नीचे जा रहा है। 

पानी की उपलब्धता के स्तर पर भारत की भूमि को मुख्य तौर पर दो भागों में बांटा जा सकता है। पहला भाग भारत की वह भूमि जो हिमालय की तराई में स्थित है या तराई के नजदीक है, वहां वर्षा का औसत स्तर भी ऊंचा है, इस क्षेत्र में मौजूद भूमिगत पानी का स्तर भी ऊंचा है जिसको ट्यूबवैलों द्वारा सिंचाई व पीने के तौर पर प्रयोग में लाया जाता है। इस क्षेत्र में हिमालय से निकलने वाली बहुत सारी नदियां भी सारा साल बहती हैं, जिनके द्वारा सिंचाई की जाती है परन्तु भारत का दूसरा भाग जो कुल क्षेत्रफल का लगभग 70 प्रतिशत है और हिमालय की तराई से दूर है जैसे उत्तर प्रदेश में बुंदेलखंड का क्षेत्र, मध्य प्रदेश, झारखंड, छत्तीसगढ़, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, उड़ीसा, तमिलनाडु, राजस्थान, गुजरात और महाराष्ट्र के क्षेत्र सिंचाई के तीनों पक्षों से ही कमजोर हैं। इस क्षेत्र में औसत स्तर से नीचे वर्षा का होना, भूमिगत पानी के स्तर का बहुत ज्यादा नीचे होना और सारा साल चलने वाली नदियों का न होना, इस क्षेत्र की मुख्य विशेषताएं हैं। इसलिए इस क्षेत्र में सिंचाई के अलावा पेयजल के लिए भी भारी संकट पैदा हो जाता है। 

सिंचाई और पेयजल के पक्के हल के लिए आजादी से लेकर आज तक बुनियादी कदम अभी तक नहीं उठाए गए। (क) तालाबों, झीलों और चैक डैमों का निर्माण (ख) नदियों को जोडऩे वाली नीति को व्यावहारिक रूप देना (ग) शहरों के गंदे पानी को री-साइकिल करना (घ) समुद्र के वाष्प कणों को ठंडा करके शुद्ध पानी प्राप्त करना आदि। 

तालाबों का निर्माण सबसे उपयुक्त
तालाबों, झीलों और चैक डैमों के निर्माण वाला पहला कदम अति-उपयुक्त, सस्ता और चिरस्थायी है। भारत में किसी भी सरकार ने इस महत्वपूर्ण कदम की तरफ उतना ध्यान नहीं दिया है जितना देना चाहिए था। यह कदम निरोल राज्य सरकारों के भाग में आता है परन्तु केन्द्र सरकार का सहयोग अति आवश्यक है। गत पंद्रह वर्षों में गुजरात सरकार ने चैक डैम बनाने में विशेष ध्यान दिया है, इसके फलस्वरूप गुजरात राज्य को इसका फल भी मिल रहा है। 

हमारी केन्द्र और राज्य सरकारों को पहल करते हुए 2020 अगस्त के लिए अभी से तैयारी करनी चाहिए, जिसको हम अगस्त क्रांति का नाम दे सकते हैं। उन नदियों की निशानदेही करनी चाहिए जो बाढ़ों का कारण बनती हैं। सबसे आसान तरीका यह हो सकता है, किसी भी नदी को बीस के लगभग सुखना झील के बराबर बड़ी झीलों का निर्माण करके जोड़ा जाए, ताकि अगस्त में जो फालतू पानी बाढ़ लाता है, वह पानी इन झीलों में इकट्ठा किया जा सके। उन गांवों की पहचान की जाए जिनके पास पांच एकड़ से ज्यादा पंचायती जमीन है, उस पंचायती जमीन में कम-से-कम 5 एकड़ का तालाब खुदवाना लाजिमी किया जाए। इन खोदे गए तालाबों को बरसाती नालों के साथ जोड़ा जाए। इन झीलों और तालाबों को अगस्त झील और अगस्त तालाब का नाम दिया जा सकता है। 

इस अगस्त क्रांति से कई फायदे हो सकते हैं। (1) फालतू पानी संभलने से बाढ़ से बचा जा सकता है। (2) धरती के भीतर पानी का स्तर ऊंचा हो जाएगा (3) पानी को सिंचाई के लिए और शुद्ध करके पीने के लिए प्रयोग में लाया जा सकेगा। (4) झीलों को सुंदर बना कर पर्यटन के लिए प्रयोग में लाया जा सकेगा। झीलों मेें बोटिंग का प्रबंध भी हो सकता है। नदियों को झीलों के साथ जोडऩे की नीति सारे भारत में लागू होनी चाहिए। इससे मध्य और दक्षिण भारत में पेयजल का संकट दूर हो सकता है। 

प्रत्येक वर्ष यही देखने को मिलता है कि हिमालय से आने वाली नदियां पूरे उत्तरी भारत में बाढ़ें ला देती हैं। इन नदियों पर नए बांध बनाए जाएं। इसी तरह घग्गर पर बांध बनाकर इसको बांधने की जरूरत है। इसके लिए केन्द्र और राज्य सरकारों को मिल कर काम करने की जरूरत है। बांध अंतर्राष्ट्रीय संगठनों से कर्जा लेकर बनाए जा सकते हैं। पैदा होने वाली बिजली द्वारा आमदन से कर्जा वापस किया जा सकता है। घग्गर पर बांध बनाने से पंजाब, हरियाणा और राजस्थान के बीच पानी का मसला भी हल हो सकता है। 

नदियों को जोडऩा
दूसरे कदम के तौर पर नदियों को जोडऩा देश के सूखाग्रस्त क्षेत्रों के लिए एक क्रांतिकारी कदम साबित हो सकता है। नदियों को जोडऩे का इतिहास हजारों वर्ष पुराना है। असुरों और देवताओं के मध्य हुए युद्ध का सबसे बड़ा कारण गंगा के बहाव को दक्षिण की तरफ मोडऩा था ताकि असुर प्रदेशों, मध्य और दक्षिण भारत में पानी की कमी को दूर किया जा सके। 

नदियों को जोडऩे का मूल प्रस्ताव 2004 में प्रधानमंत्री श्री अटल बिहारी वाजपेयी सरकार ने पास किया था। मार्च 2012 में भारत की सर्वोच्च अदालत ने नदियों को जोडऩे के मामले पर अपनी मोहर लगाते हुए उस समय केन्द्र में मनमोहन सिंह की अगुवाई वाली कांग्रेस सरकार को इस नेक काम को जल्द पूरा करने की हिदायत दी थी। नदियों को जोडऩे वाली टास्कफोर्स ने सिफारिश की थी कि उत्तरी भारत में नदियों के 14 जोड़ होंगे जिसमें सबसे लम्बा जोड़ शारदा, यमुना, राजस्थान, साबरमती होगा। दक्षिण भारत में नदियों के 16 जोड़ होंगे जिसमें सबसे लम्बा जोड़  महानदी, गोदावरी, कृष्णा, कावेरी होगा। स्वर्ण रेखा-महानदी का जोड़ उत्तर को दक्षिण से जोड़ेगा। 

नदियों को जोडऩे से आर्थिक और सामाजिक तरक्की वाले लक्ष्य हासिल किए जा सकते हैं। उत्तरी भारत की जो नदियां मानसून के समय में बाढ़ से तबाही मचाती हैं, उन पर बड़े बांध लगाकर उनमें से नहरें निकाल कर पानी सूखे वाले प्रदेशों की तरफ भेजा जाएगा।  हजारों मैगावाट बिजली का अतिरिक्त उत्पादन होगा। पानी को संभालने के लिए तीसरे कदम के तौर पर शहरों और कस्बों के गंदे पानी को ट्रीटमैंट करके इसे दोबारा सिंचाई के लिए प्रयोग में लाया जाए। यह नीति सारे देश में लागू होनी चाहिए। इस नीति से पानी की बचत तो होगी ही, साथ ही हमारे प्राकृतिक स्रोतों की स्वच्छता की रक्षा भी हो सकेगी। 

मुफ्त में शुद्ध पानी प्राप्त करने के लिए चौथा कदम बिल्कुल नई किस्म का हो सकता है। समुद्र के किनारों पर वायु शुद्ध पानी के वाष्पकणों से भरी होती है। कांच की बड़ी रैफ्रीजरेटर स्क्रीनों पर जल वाष्पों को ठंडा किया जा सकता है। इस तरकीब से लाखों लीटर शुद्ध पानी प्राप्त किया जा सकता है। बिजली की बचत करने के लिए रैफ्रीजरेटर को सोलर पैनल से बिजली बनाकर चलाया जा सकता है। 

यदि उपरोक्त चारों कदम, केन्द्र सरकार और राज्य सरकारों द्वारा पूरे तालमेल के साथ उठाए जाएं तो ये देश में एक नई ‘जल क्रांति’ को जन्म दे सकते हैं। इससे देश में सूखे और बाढ़ से बचा जा सकता है, देश में भूमिगत पानी का स्तर भी ऊंचा होगा, खाद्य पदार्थों के उत्पादन में भी बढ़ौतरी होगी, किसानों द्वारा की जा रही खुदकुशियों को रोका जा सकेगा, देश में खुशहाली और निर्यातों के लिए नए दरवाजे खुलेंगे, सारे देश में हरियाली बढ़ेगी और नदियों को प्रदूषण मुक्त किया जा सकेगा।-प्रिं. प्रेमलता 
 


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