उत्तर प्रदेश जनसंख्या नियंत्रण विधेयक : चुनावी या वास्तविक जरूरत

2021-07-25T05:35:19.647

उत्तर प्रदेश सरकार ने जनसं या (नियंत्रण, स्थिरीकरण व कल्याण) विधेयक-2021 को प्रस्तावित ड्राफ्ट के जरिए प्रदेश में जनसं या नियंत्रण का रोडमैप तैयार किया है। प्रस्तावित कानून दो बच्चे नीति को बढ़ावा देता है। जो लोग दो बच्चे पैदा करेंगे, उनसे कई तरह की सरकारी रियायतों का वादा किया गया है, जबकि दो से अधिक बच्चे पैदा करने वालों को कई तरह की सरकारी सुविधाओं से वंचित रहना पड़ेगा। इस विधेयक का मूल उद्देश्य सभी को खाद्य सुरक्षा, स्वच्छ पेयजल, आवास, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, रोजगार के अवसर, बिजली उपलब्ध कराना है।

इस मसौदा प्रस्ताव के बाद से ही इसकी आवश्यकता पर कई संगठनों/ लोगों द्वारा प्रश्न उठाए जा रहे हैं, साथ ही इसे चुनावी जुमला भी बता कर सरकार को कटघरे में खड़ा किया जा रहा है। हालात यहां तक हैं कि कई लोग इसे सांप्रदायिक रंग देने में भी लगे हुए हैं। इस विधेयक के विरोध में तर्क यह भी है कि उत्तर प्रदेश की जनसं या 1970 से 1990 के मध्य प्रत्येक दशक में 25 से 26 प्रतिशत बढ़ी है, जबकि 2001 से 2011 के मध्य घटकर 21 प्रतिशत पर आ गई और 2011 से 2021 के मध्य यह 15.6 प्रतिशत संभावित है। ऐसे में जब जनसं या पर खुद नियंत्रण हो रहा है तो विधेयक की आवश्यकता कहां है?

प्रस्तावित विधेयक 21 वर्ष से अधिक उम्र के युवकों और 18 वर्ष से अधिक उम्र की युवतियों पर लागू होगा। उत्तर प्रदेश सरकार के अधीन कार्यरत ऐसे कर्मचारी, जो 2 बच्चों की नीति को स्वीकार करते हैं, उन्हें विभिन्न सरकारी सुविधाएं तथा शिक्षा संस्थानों में प्रवेश में प्राथमिकता प्राप्त होगी। गरीबी रेखा से नीचे जीवन-यापन करने वाले लोग, जो एक बच्चे की नीति का पालन करते हैं, आम जन को दी जाने वाली सुविधाओं के अतिरिक्त उन्हें एकमुश्त 80,000 रुपए लड़का होने की दशा में या 1 लाख रुपए लड़की होने की दशा में सरकार द्वारा अनुदान दिया जाएगा। यदि कोई व्यक्ति जनसं या नीति के नियमों का पालन नहीं करता तो उसे किसी भी प्रकार का प्रस्तावित लाभ देय नहीं है, बल्कि-सरकारी योजनाओं से वह वंचित होगा। 

विवादों का निस्तारण : दूसरी प्रैग्नैंसी में यदि जुड़वां बच्चे होते हैं तो सरकारी लाभ देय हैं। दो बच्चों के अतिरिक्त कोई तीसरा बच्चा अडॉप्ट करता है तो सरकारी लाभ देय हैं। यदि किसी अभिभावक के दो में से कोई एक बच्चा डिसेबल हो या किसी एक की मौत हो जाती है तो उसके तीसरे बच्चे को सरकारी लाभ देय हैं। यदि किसी व्यक्ति के दो बच्चे हैं और इस विधेयक के लागू होने के एक वर्ष के भीतर तीसरा बच्चा पैदा करता है तो उसे सरकारी लाभ देय है। एक से अधिक शादी करने वाले लोगों को सरकारी सुविधा दो बच्चों तक ही सीमित रहेगी। 

यह विधेयक सरकारी गजट में प्रकाशित हो जाने के एक वर्ष पश्चात अस्तित्व में आएगा। सरकार इसके लिए स्टेट पापुलेशन फंड बनाएगी, जिसके जरिए सरकार मैटरनिटी और हैल्थ सैंटरों को और मजबूत करेगी। यदि डाक्टर की लापरवाही से नसबंदी के बाद भी प्रैग्नैंसी होती है तो सरकार 50,000 रुपए की सहायता परिवार को देगी और जन्म लेने वाले बच्चे को सभी सरकारी लाभ देय होंगे। 

इस विधेयक की आवश्यकता की बात की जाए तो यह इसलिए भी अति आवश्यक है कि उत्तर प्रदेश जनसं या के मामले में न केवल देश में प्रथम है, बल्कि वैश्विक स्तर पर मात्र 4 देशों की जनसंख्या उत्तर प्रदेश से अधिक है। जबकि वर्ष 2016 की जी.डी.पी. में यह विश्व में 11वें, अपेक्षित जीवन (2003) में विश्व में 10वें क्रम पर, क्षेत्रफल की दृष्टि से राजस्थान, मध्यप्रदेश और महाराष्ट्र के पश्चात उत्तर प्रदेश चौथे स्थान पर है। अपराध दर की सं या में इसका दूसरा, स्वच्छ पेयजल में चौथा, बाल पोषण में 25वां स्थान है, प्रजनन दर बिहार के बाद सबसे अधिक है। मानव तस्करी में 12वां, औसत साक्षरता दर में 8वां स्थान है। राज्य की 29.43 प्रतिशत जनसं या गरीबी रेखा के नीचे रहती है। स्कूल नामांकन दर में इसका 23वां, कर राजस्व में तीसरा स्थान है। बेरोजगारी दर 6.5 प्रतिशत है। इन सब आकड़ों के पीछे की मूल वजह आपको जनसं या वृद्धि ही मिलेगी। 

ऐसे में हम सभी का नैतिक दायित्व बनता है कि बड़े बदलाव में शामिल होकर विकास की बात करें, न कि विवाद की। हालांकि सरकार के लिए इस विधेयक के पश्चात ङ्क्षलग अनुपात बनाए रखना एक बड़ी चुनौती हो सकती है, जहां बेटे की चाहत में लोग कई अनैतिक कार्यों को अंजाम दे सकते हैं। 1000 पुरुषों पर 912 महिला ङ्क्षलग अनुपात पहले से ही ङ्क्षचता का विषय है। उत्तर प्रदेश ङ्क्षलग अनुपात में राज्यों/ केंद्र शासित प्रदेशों में 26वें स्थान पर है।-डा. अजय कुमार मिश्रा


सबसे ज्यादा पढ़े गए

Content Writer

Pardeep

Recommended News