तालिबान के विरुद्ध अमरीका या चीन का साथ

09/21/2021 4:37:34 AM

तालिबान और पाकिस्तान के गठबंधन की कश्मीर पर निगाह है। ये दोनों पूरी तरह आपस में गुंथे हुए हैं। हमें तय करना है कि इस गठबंधन का सामना करने के लिए हम अमरीका का साथ लेंगे या चीन का? एक संभावना यह है कि भारत और अमरीका तालिबान-पाकिस्तान और चीन के गठबंधन का सामना करें। दूसरी यह कि भारत-चीन मिलकर तालिबान-पाकिस्तान के गठबंधन का सामना करें। 

आज विश्व का सामरिक विभाजन अमरीका और चीन के बीच है। हम अमरीका का साथ देंगे तो अमरीका के दुश्मन चीन की स्वाभाविक प्रवृत्ति होगी कि वह तालिबान एवं पाकिस्तान के साथ जुड़े। यूं भी चीन के पाकिस्तान के साथ मधुर संबंध हैं इसलिए चीन का झुकाव मूल रूप से तालिबान-पाकिस्तान की तरफ होगा लेकिन यह गठबंधन हमारे लिए कष्टप्रद होगा क्योंकि तब हमारे पश्चिमी छोर से पूर्वी छोर तक तालिबान-पाकिस्तान-चीन के गठबंधन द्वारा हम घेर लिए जाएंगे। 

इसके अतिरिक्त पाकिस्तान-तालिबान के गठबंधन को चीन की आर्थिक सहायता मिल जाएगी तो वह ताकतवर हो जाएगा। इसलिए हमें दूसरी संभावना पर विचार करना चाहिए कि भारत और चीन मिलकर तालिबान-पाकिस्तान के गठबंधन का सामना करें। यह संभावना वर्तमान में कठिन दिखती है लेकिन मेरे आकलन में यह असंभव नहीं है। कारण यह कि चीन को पाकिस्तान से जो लगाव है वह मुख्यत: वाणिज्यिक है। यदि चीन को भारत से वाणिज्यिक और व्यापारिक लाभ मिलता है तो उसे पाकिस्तान का त्याग करने में कठिनाई नहीं होगी। 

अपने सहयोगी को चिन्हित करने के लिए पहले उसकी ताकत को आंकना जरूरी है। इसमें कोई संशय नहीं कि बीते 100 वर्षों में विश्व के अधिकांश तकनीकी आविष्कार पश्चिमी देशों अथवा अमरीका द्वारा किए गए हैं, जो अमरीका की ताकत हैैं लेकिन बीते 2 दशकों में चीन ने तकनीकी क्षेत्र में भारी प्रगति की है। आज चीन और अमरीका तकनीकी दृष्टि से बराबर से दिखते हैं इसलिए तकनीकी आधार पर हम अपने मित्र का चयन नहीं कर सकते। चीन की आॢथक ताकत भी अमरीका के बराबर पहुंच चुकी है। 

सहयोगी चयनित करने का एक आधार सामरिक है। अमरीका के भारत पर कई उपकार हैं। द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान इंगलैंड के प्रधानमंत्री विन्सेंट चॢचल अमरीकी राष्ट्रपति रूजवेल्ट से मिलने अमरीका गए थे। उन्होंने रूजवेल्ट से विश्व युद्ध में इंगलैंड की मदद करने का आग्रह किया। रूजवेल्ट ने मदद देने की एक शर्त यह रखी कि इंगलैंड को भारत जैसे अपने उपनिवेशों को स्वतंत्र करना होगा। इसके बाद 60 के दशक में अमरीका ने भारत को पब्लिक लॉ 480 के अंतर्गत मुफ्त अनाज भारी मात्रा में उपलब्ध कराया था। उस समय हमारे देश में सूखा पड़ गया था और हम भुखमरी के कगार पर आ गए थे। 

अमरीका के इन उपकारों को मानते हुए हमें उसके दूसरे पक्ष को भी देखना होगा। उसने सऊदी अरब में लोकतंत्र विरोधी सरकार का निरंतर साथ दिया, पाकिस्तान को एफ-16 लड़ाकू विमान समेत सैन्य सहायता दी, जिसका उपयोग पाकिस्तान द्वारा भारत के विरुद्ध किया जा सकता है। अफगानिस्तान में अपने द्वारा बनाई गई सरकार को जिस प्रकार अमरीका छोड़ कर भागा है, इससे उसमें विश्वास कम ही पैदा होता है। पूर्व में दक्षिण वियतनाम में भी ऐसा ही हुआ था। हाल में ही यूरोपीय देशों के प्रमुख ने कहा कि यूरोपीय देशों को विश्व स्तर पर सैन्य गतिविधियां करने के लिए अमरीका से इतर अपनी ताकत बनानी होगी। 

दूसरी तरफ हमारा चीन से 1962 से शुरू हुआ सरहद का विवाद लगातार जारी है। चीन ने हमको चारों तरफ से घेरने का प्रयास किया है जैसे श्रीलंका, म्यांमार और बंगलादेश को भारी ऋण दिए हैं। अत: हमारे सामने कुएं और खाई के बीच चयन करने जैसी स्थिति है। अमरीका भरोसेमंद नहीं है जबकि चीन के साथ हमारा लगातार विवाद रहा है। इन दोनों विकल्पों को सैन्य दृष्टि से भी देखना चाहिए। यदि हम चीन के साथ हाथ मिलाते हैं तो भारत-चीन के गठबंधन में तालिबान-पाकिस्तान के गठबंधन पर अंकुश लगाने में सफल होने की संभावना अधिक दिखती है। इस दिशा में पहले हमें चीन के साथ अपना सरहद का विवाद निपटाना पड़ेगा। 

दूसरी तरफ यदि हम अमरीका से हाथ मिलाते हैं तो तालिबान-पाकिस्तान-चीन का विशाल गठबंधन हमारे सामने खड़ा होगा जिसका सामना करना कठिन होगा क्योंकि चीन की आर्थिक ताकत इस गठबंधन को पोसेगी।  इसलिए मेरा मानना है कि हमें चीन के साथ अपने सीमा विवाद को निपटाना और वर्तमान में जो बड़ा संकट तालिबान-पाकिस्तान-चीन के गठबंधन के बनने का हमारे सामने खड़ा है, उसे क्रियान्वित होने से रोकने का प्रयास करना चाहिए। इस समय हमें चीन से कम और तालिबान-पाकिस्तान से खतरा अधिक है इसलिए छोटे दुश्मन चीन से मिलकर बड़े दुश्मन तालिबान-पाकिस्तान का सामना करना चाहिए।-भरत झुनझुनवाला
 


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Content Writer

Pardeep

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