अधूरे वादे : सिख आकांक्षाएं और कांग्रेस नेतृत्व
punjabkesari.in Thursday, May 28, 2026 - 04:09 AM (IST)
सिख समुदाय और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के बीच का संबंध आधुनिक भारतीय इतिहास के सबसे महत्वपूर्ण लेकिन सबसे कम ईमानदारी से जांचे गए अध्यायों में से एक है। इसकी शुरूआत स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान भरोसे, बलिदान और सांझा संघर्ष के साथ हुई थी, लेकिन समय के साथ यह अविश्वास, टकराव और अनसुलझे संवैधानिक सवालों में बदल गया। पंजाब में बाद में हुए बहुत से उथल-पुथल को आजादी से पहले सिखों से किए गए आश्वासनों और 1947 के बाद उन वादों में से कई के अधूरे रहने के तरीके को दोबारा समझे बिना नहीं समझा जा सकता।
कांग्रेस और सिख नेतृत्व के बीच सांझेदारी 1920 के दशक के गुरुद्वारा सुधार आंदोलन के दौरान मजबूत हुई थी। सिखों ने ब्रिटिश संरक्षण का आनंद ले रहे भ्रष्ट महंतों से अपने ऐतिहासिक धर्मस्थलों को मुक्त कराने के लिए एक शांतिपूर्ण आंदोलन शुरू किया। एक अनुशासित अहिंसक आंदोलन में हजारों लोगों ने गिरफ्तारियां दीं, क्रूर दमन का सामना किया और अपने प्राणों की आहुति दी। इस संघर्ष ने राष्ट्रीय नेताओं को गहराई से प्रभावित किया। महात्मा गांधी ने इस आंदोलन की सफलता और 1925 में सिख गुरुद्वारा अधिनियम के पारित होने को ‘भारत की आजादी की पहली निर्णायक लड़ाई’ के रूप में वर्णित किया था। उस अवधि के बाद से सिख राजनीतिक नेतृत्व, विशेष रूप से मास्टर तारा सिंह के अधीन, खुद को व्यापक राष्ट्रीय आंदोलन के साथ जोड़ता चला गया। ऐसे समय में जब पूरे भारत में सांप्रदायिक राजनीति तीव्र हो रही थी, सिख नेतृत्व ने एक अलग व्यवस्था की मांग करने की बजाय एक संयुक्त और धर्मनिरपेक्ष भारत का समर्थन करना चुना। अल्पसंख्यक होने के बावजूद, सिखों ने स्वतंत्रता संग्राम, क्रांतिकारी आंदोलनों और सैन्य सेवा में असमान रूप से (आबादी के अनुपात से कहीं अधिक) योगदान दिया।
1929 में, कांग्रेस ने एक प्रस्ताव अपनाया जिसमें सिखों सहित अल्पसंख्यकों को आश्वासन दिया गया कि कोई भी संवैधानिक व्यवस्था तब तक स्वीकार्य नहीं होगी जब तक कि वह उन्हें संतुष्ट न कर दे। 1931 में, दिल्ली के गुरुद्वारा सीस गंज साहिब में एक सिख सभा को संबोधित करते हुए महात्मा गांधी ने कथित तौर पर घोषणा की थी कि कांग्रेस सिख हितों के विपरीत कुछ भी नहीं करेगी और यदि उसने कभी उनके साथ विश्वासघात किया तो सिखों को इसका विरोध करने का पूरा अधिकार होगा। सबसे ज्यादा उद्धृत किया जाने वाला आश्वासन जुलाई 1946 में जवाहरलाल नेहरू की ओर से आया जब उन्होंने कहा था कि ‘‘पंजाब के बहादुर सिख विशेष विचार के पात्र हैं’’ और उन्हें उत्तर में एक ऐसे क्षेत्र और व्यवस्था में कुछ भी गलत नहीं दिखता जहां सिख भी स्वतंत्रता की चमक (आभा) का अनुभव कर सकें। हालांकि, स्वतंत्रता के बाद की अवधि ने सिख राजनीतिक मांगों के प्रति केंद्रीय नेतृत्व के दृष्टिकोण में एक निर्णायक बदलाव का संकेत दिया। सांझेदारी का आशावाद धीरे-धीरे संदेह में बदल गया। पंजाबी सूबा की मांग जो मूल रूप से तेलुगू, मराठी, कन्नड़ और गुजराती भाषियों के लिए बनाए गए राज्यों की तरह एक भाषाई राज्य की मांग थी, को एक सांप्रदायिक चश्मे से देखा जाने लगा।
जवाहरलाल नेहरू अकाली राजनीति को तेजी से सांप्रदायिक और अस्थिर करने वाली राजनीति के रूप में देखने लगे। इस मानसिकता की एक झलक नेहरू के 29 दिसंबर 1953 के पत्र में मिलती है, जो उन्होंने फतेहगढ़ साहिब में मास्टर तारा सिंह और अकाली समर्थकों से जुड़ी गड़बडिय़ों के बाद केंद्रीय गृह मंत्री कैलाश नाथ काटजू को लिखा था। उस पत्र में नेहरू ने लिखा था, ‘‘मैं इस बात से सहमत हूं कि अब समय आ गया है कि मास्टर तारा सिंह के दावों को समाप्त किया जाए। उन्हें बहुत लंबी छूट मिल चुकी है।’’ नेहरू के जीवनकाल में पंजाबी सूबा की मांग को कभी पूरी तरह स्वीकार नहीं किया गया। नेहरू और मास्टर तारा सिंह के बीच जटिल संबंध इस पूरी अवधि में जारी रहे। विडंबना यह है कि अकाली दल का कांग्रेस में दो बार विलय हुआ, पहली बार 1948 में और फिर 1956 में इस उम्मीद में कि विभाजन से पहले सिख आकांक्षाओं से किए गए वादों को आखिरकार पूरा किया जाएगा।
पंजाब का पुनर्गठन अंतत: 1966 में प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के तहत पंजाब पुनर्गठन अधिनियम के माध्यम से किया गया। फिर भी यह समझौता अधूरा ही रहा। चंडीगढ़ को पंजाब को पूरी तरह से सौंपने के बजाय एक केंद्र शासित प्रदेश बना दिया गया। कई पंजाबी भाषी क्षेत्रों को बाहर कर दिया गया और नदियों के पानी को केंद्रीय व्यवस्था के तहत रखा गया जिसे कई पंजाब नेता अनुचित मानते थे। ये अनसुलझे विवाद आज भी पंजाब की राजनीति को प्रभावित कर रहे हैं। एक महत्वपूर्ण और अभी भी अनसुलझा प्रश्न बना हुआ है, पंजाब में उग्रवाद को किसने पैदा किया बढ़ावा दिया और हवा दी। उस त्रासदी की जड़ों को समझना आवश्यक बना हुआ है यदि आने वाली पीढिय़ों को वही गलतियां दोहराने से बचना है। दुर्भाग्य से, न तो सिख बौद्धिक हलकों और न ही प्रवासी ‘डायस्पोरा’ के कुछ हिस्सों ने इस दर्दनाक दौर की सामूहिक और निष्पक्ष जांच को गंभीरता से लिया है।
1985 के राजीव लौंगोवाल समझौते ने सुलह की उम्मीद जगाई थी। इसने चंडीगढ़, क्षेत्रीय विवादों, नदी जल और मुआवजे पर समाधान का वादा किया था। हालांकि, समझौते के बड़े हिस्से लागू नहीं हुए। इसके तुरंत बाद संत हरचंद सिंह लौंगोवाल की हत्या ने एक स्थायी राजनीतिक समाधान की संभावनाओं को और कमजोर कर दिया। सिख समुदाय सहानुभूति नहीं चाहता। यह निष्पक्षता, गरिमा और गंभीर जुड़ाव चाहता है। एक परिपक्व लोकतंत्र में इतिहास के कठिन अध्यायों को स्वीकार करने और रक्षात्मक होने की बजाय ईमानदारी से वास्तविक शिकायतों का समाधान करने का साहस होना चाहिए। समुदाय और राष्ट्र के भीतर गंभीर चिंतन अतीत के दर्द को सुलह और प्रगति के रोडमैप में बदलने में मदद कर सकता है।
शायद वह समय आ गया है जब एक सरल सच्चाई को स्वीकार किया जाए, अनसुलझी शिकायतें समय के साथ गायब नहीं होती हैं वे पीढिय़ों के दौरान चुपचाप गहरी होती जाती हैं। सुलह बयानबाजी की नहीं, बल्कि नैतिक साहस, राजनीतिक ईमानदारी और राष्ट्रीय सद्भाव के प्रति सांझा प्रतिबद्धता की मांग करती है। तभी अतीत के अधूरे वादे अधिक भरोसेमंद और एकजुट भविष्य का मार्ग प्रशस्त कर सकते हैं।-इकबाल सिंह लालपुरा(पूर्व अध्यक्ष, राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग, भारत सरकार)
