आज राजनीति ‘मुनाफे’ का पेशा हो गई

2020-03-21T01:51:13.913

एक राजनीतिक नेता के लिए अपनी छवि बनाने की प्रक्रिया बेहद पेचीदा है। लोगों की नजरों में इसे निरंतर एक जैसा रखना पड़ता है परंतु इनके वायदों तथा कार्यशैली में अंतर होता है। देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने लोगों की सोच को पकड़ा जब उन्होंने अपने आपको गांधी नगर से नई दिल्ली शिफ्ट किया। इससे पहले 2002 में उनकी गुजरात के मुख्यमंत्री के तौर पर छवि कलंकित हुई थी। लोग अभी भी आश्चर्यचकित हैं कि मोदी ने कैसे अपनी छवि को इस तरह नाटकीय ढंग से बदल डाला। 2014 की चुनावी रैली में उन्होंने लोगों के साथ हर प्रकार के वायदों से अपनी स्थिति मजबूत की। कांग्रेसी नेतृत्व के अधीन उसकी रूढि़वादी कार्यशैली से लोग बदलाव की ओर देख रहे थे। वे ऐसे नेतृत्व की तलाश में थे जो करिश्माई हो और आगे की तरफ देखने वाला हो। वे नहीं चाहते थे कि ऐसा नेता पारम्परिक सांचे में ढला हो। 

कुछ विशिष्ट कांग्रेसी नेताओं को धूल में न मिलाया जाए
मुझे एक लातिनी कहावत याद आ रही है, जिसके अनुसार एक शेर द्वारा नेतृत्व किए जाने वाली हिरणों की सेना एक हिरण द्वारा नेतृत्व की जाने वाली शेरों की सेना से ज्यादा डरावनी होती है। इसका मतलब यह कि कुछ विशिष्ट कांग्रेसी नेताओं को आजादी से पूर्व तथा बाद में धूल में मिला दिया गया, यहां तक कि वर्तमान प्रधानमंत्री उन दिग्गजों के सामने औसत दर्जे के दिखाई पड़ते हैं। 

आजकल योग्य नेताओं की कमी का कारण आखिर क्या है? इसका साधारण उत्तर देश का राजनीतिक वातावरण कुछ इस तरह से बिगड़ गया है कि कुछ योग्य लोग आजकल महामारी जैसी राजनीति से अपना किनारा कर चुके हैं। हमारे मध्य कुछ होनहार युवा नहीं हैं मगर वे अवांछित तथा सत्ता के दलालों द्वारा शून्य कर दिए गए हैं। आज राजनीति मुनाफे का पेशा हो गई। इसमें माफिया योगदान तथा पैसे का वर्चस्व बढ़ गया। राजनीति आज लोगों की सेवा के लिए नहीं होती, यह तो सिर्फ पैसा बनाने और सत्ता हासिल करने के लिए होती है। इस संदर्भ में मैं यूरेशिया ग्रुप के अध्यक्ष इयान ब्रेम्मर के शब्दों का उल्लेख करना चाहूंगा। उन्होंने मई 2019 में कहा, ‘‘आर्थिक सुधारों के लिए मोदी भारत की सबसे बड़ी उम्मीद हैं।’’ 

‘द प्रिंट’ के अनुसार ब्रेम्मर ने अपने विचार को बदल दिया और कहा कि भारत मोदी के अधीन 2020 का पांचवां सबसे बड़ा राजनीतिक जोखिम है। उनके अनुसार इसका कारण यह है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अपने दूसरे कार्यकाल का ज्यादातर हिस्सा विवादास्पद सामाजिक नीतियों को प्रोत्साहित करने में लगा दिया। उन्होंने आर्थिक एजैंडे की बलि दे दी। वह आगे लिखते हैं कि ऐसी नीतियों का असर साम्प्रदायिक भावना, विदेशी तथा आॢथक नीति पर पड़ा है। यूरेशिया रिपोर्ट इस बात का उल्लेख करती है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने 2019 के चुनाव के बाद किस तरह विवादास्पद सामाजिक एजैंडे को तरजीह दी। ब्रेम्मर तथा सह-लेखक क्लिफ कुपचान बताते हैं कि कैसे गृह मंत्री अमित शाह उग्र नीति के लिए जिम्मेदार हैं। 

लेखकों ने कहा कि कैसे नागरिकता के डर से भारत में प्रदर्शन फैले। भाजपा नेतृत्व में सरकार अपनी धर्मनिरपेक्ष पहचान को खो चुकी है। इसके आगे यह भी लिखा गया कि बढ़ रहे प्रदर्शनों की परवाह किए बिना मोदी पीछे नहीं हटेंगे। ऐसा आकलन झटका देने वाला है क्योंकि यूरेशिया ग्रुप ने मोदी के 2014 में चुने जाने के बाद भारत की सम्भावनाओं के बारे में तेजी आने की बात कही थी। ‘टाइम’ के लिए अपने आर्टीकल में उन्होंने कहा कि नरेन्द्र मोदी भारत की सबसे अच्छी उम्मीद हैं मगर अब सब कुछ बदल गया है। लोकसभा चुनावों के बाद केन्द्रीय श्रम मंत्रालय के मई में जारी किए गए डाटा ने दर्शाया है कि रोजगार योग्य 7.8 प्रतिशत युवक बेरोजगार थे। प्राइवेट निवेश का कम होना मोदी सरकार के लिए चिंता का विषय था। हालांकि सरकार अर्थव्यवस्था को पुनर्जागृत करने में लगी है। 

जून 2019 की समाप्ति वाली तिमाही में प्राइवेट निवेश 15 वर्षों में सबसे कम स्तर पर था। इस बात को नकारा नहीं जा सकता कि देश ने आॢथक चेन प्रतिक्रिया को झेला। नौकरियों की क्षति का मतलब लोगों के हाथों में कम पैसा होना है, जिससे उपभोग में भी कमी आती है और फैक्टरियों में उत्पादन प्रभावित होता है, जब कमाई गिर जाती है तो मुद्रास्फीति बढ़ जाती है। रिटेल मुद्रास्फीति आम आदमी को सीधे तौर पर प्रभावित करती है। भाजपा नेताओं ने प्रदर्शनों को बढ़ाने और झूठ तथा अफवाह फैलाने में विपक्षी दलों पर इसका आरोप लगाया है, खासकर कांग्रेस पर। वर्तमान में भाजपा सरकार ने नो गोइंग बैक के एजैंडे को अपनाया है। किसी एक को इन बातों पर यकीन नहीं कि संवेदनशील सामाजिक मुद्दों तथा आॢथक मंदी पर कोई बात की जाएगी। प्रधानमंत्री मोदी के अर्थव्यवस्था के लिए अच्छे दिन के वायदे के प्रति मेरी उम्मीदें अभी भी जिंदा हैं। 

दिलचस्प बात यह है कि अंतर्राष्ट्रीय समुदाय के लिए पी.एम. मोदी के नेतृत्व में भारत की कहानी आर्थिक सफलता की हो सकती है मगर उसमें धार्मिक ङ्क्षहसा तथा दमन का लेखा-जोखा नहीं होगा। मेरा पूरा यकीन है कि सभी प्रकार की सामाजिक तथा आर्थिक परेशानियों के बीच हमारे लोगों में काफी सहनशीलता की भावना व्याप्त है, जो हर मुश्किल से पार पाना जानते हैं। देश को आज सही रास्ता दिखाने की जरूरत है, जिसके तहत गरीबों तथा भूखे-नंगों का उत्थान हो। राजनीतिक संस्थानों से उम्मीद है कि वे निष्पक्ष रहें। हाल ही के दिनों में प्रशासन की कार्यप्रणाली की विश्वसनीयता को आघात पहुंचा है क्योंकि अपने फायदों के लिए इसने इसका गलत इस्तेमाल किया है। मेरा विचार है कि प्रधानमंत्री मोदी के लिए वक्त आ गया है कि वह प्रशासन की विश्वसनीयता को सुदृढ़ करें तथा हमारे लोकतंत्र की कार्यप्रणाली को और कुशल बनाएं। लोगों के लिए पारदर्शिता कायम की जाए। इसी से सुनामी जैसी सामाजिक, आर्थिक परेशानियों से निपटा जा सकता है। मेरा प्रधानमंत्री मोदी में अटल विश्वास है। हालांकि उनके लिए अमित शाह एक सही पसंद नहीं थे।-हरि जयसिंह
    


Pardeep

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