इच्छा मृत्यु की मांग कहां तक जायज

11/21/2021 4:00:02 AM

‘मर्सी किलिंग’ अथवा ‘दया मृत्यु’ शुरूआत से ही एक विवादित प्रश्न रहा है। मृत्यु-अधिकार पर केन्द्रित यह मुद्दा अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर आज भी बहस का विषय बना हुआ है। ‘इच्छा मृत्यु’ अर्थात ‘यूथेनेसिया’ मूलत: एक यूनानी शब्द है, जिसका शाब्दिक अर्थ है, ‘अच्छी मृत्यु’। चिकित्सा-शास्त्र में इससे अभिप्राय: है ‘स्वैच्छिक मृत्यु’, चिकित्सक की सहायता से की गई आत्महत्या अथवा कष्ट-मुक्ति  के आधार पर स्वेच्छा से मृत्यु अंगीकार करने का निर्णय। 

‘इच्छा मृत्यु’ को विभिन्र शाखाओं में विभक्त  कर सकते हैं : स्वैच्छिक : रोगी की मंजूरी के पश्चात जान-बूझकर ऐसी दवाइयां देना, जिससे रोगी की मृत्यु संभव हो पाए।  अनैच्छिक : ऐसी अवस्था जब रोगी मानसिक तौर पर अपनी मौत की मंजूरी दे पाने में असमर्थ हो, असाध्य पीड़ा से मुक्त करने हेतु उसे इरादतन दवाइयां देना। निष्क्रिय : रोगी की मृत्यु संभव बनाने हेतु इलाज बंद करना अथवा जीवनरक्षक प्रणालियां हटाना। 

सहायक आत्महत्या : पूर्व सहमति के आधार पर चिकित्सक द्वारा रोगी को ऐसी दवाइयां दिया जाना, जिनके प्रयोग से उसकी मृत्यु हो जाए। 

दरअसल, ‘इच्छा-मृत्यु’ जटिल व अत्यन्त संवेदनशील मुद्दा है। कानूनी मामले सहित सामाजिक व चिकित्सीय आदि अनेक पहलू इससे संबद्ध हैं। यही कारण है कि इसकी वैधता को लेकर सबकी अपनी अलग राय है। ‘यूथेनेसिया’ समर्थक ‘सम्मानजनक मौत’ की दलील देकर, ऐसे व्यक्ति को मृत्यु का अधिकार देने के पक्ष में हैं, जो पीड़ादायक असाध्य रोगों से ग्रस्त है या नाममात्र को जिंदा है। हालांकि पिछले कुछ समय से ‘इच्छा-मृत्यु’ की मांग वैश्विक स्तर पर जोर पकडऩे लगी है किंतु इसकी आंशिक अनुमति अभी तक नीदरलैंड्स, स्विट्जरलैंड, बैल्जियम, अमरीका, भारत जैसे कुछेक राष्ट्रों में ही, विशेष परिस्थितियों तथा शाखायी आधार पर मिलनी संभव हो पाई है। कम विवादास्पद तौर पर केवल निष्क्रिय अवस्था के दौरान रोगी का उपचार बंद करने अथवा जीवनरक्षक प्रणालियां हटाने को ही वैश्विक समर्थन मिल पाया है। 

एक लंबे समय तक ‘इच्छा-मृत्यु’ व ‘दया-मृत्यु’ के समर्थन को अवैधानिक मानते हुए भारतीय दंड संहिता की धारा 309 के अंतर्गत इसे ‘आत्महत्या’ जैसे दंडनीय अपराध की श्रेणी में रखा गया। किंतु 41 वर्षीय अमरीकी महिला टेरी शियावो की मौत वैश्विक-चर्चा का विषय बनी, जिसने ‘इच्छा-मृत्यु’ का मामला गर्मा दिया। हृदयाघात के पश्चात दिमागी तौर पर संज्ञाशून्य पड़ी पत्नी को त्रासदीपूर्ण जीवन से मुक्ति  दिलाने हेतु, 7 वर्ष लंबी कानूनी लड़ाई लडऩे के पश्चात, अंतत: टेरी के पति को उसकी आहार नली हटाने की अनुमति मिल ही गई, जब 18 जनवरी, 2006 को अमरीकी सर्वोच्च न्यायालय ने पूरे अमरीका में ‘इच्छा-मृत्यु’ को कानूनी तौर पर वैध करार दिया। 

टेरी शियावो मामले पर बहस भारत में भी प्रतिध्वनित होने लगी। कई मामलों में रोगी ने स्वयं अथवा अपने रिश्तेदारों के माध्यम से ‘दयामृत्यु’ की इच्छा जताई। 9 मार्च, 2018 को ‘निष्क्रिय इच्छा मृत्यु’ पर बहुप्रतीक्षित फैसला सुनाते हुए, विशेष मामलों में ‘इच्छामृत्यु’ को कानूनी वैधता प्रदान की गई। लेकिन इसके साथ ही सर्वोच्च न्यायालय ने बुजुर्गों को बोझ मानने वाले मामलों में इसके दुरुपयोग की आशंका जताई, जोकि निराधार नहीं। ऐसी ‘हृदयविदारक मांग’ निश्चित तौर पर सम्पूर्ण व्यवस्था पर बहुत बड़ा प्रश्नचिन्ह है। विषय की गंभीरता भांपते हुए इसे राष्ट्रीय स्तर पर उठाना आवश्यक है। 

बुजुर्ग पारिवारिक, सामाजिक व राष्ट्रीय दायित्व हैं, बोझ नहीं, उन्हें यह बोध करने हेतु समाज व सरकारों को समग्र दृष्टिकोण अपनाना होगा। उनकी सहायतार्थ बनाए गए कानून तथा उन्हें मिलने वाली सुविधाओं संबंधी जानकारी का व्यापक स्तर पर प्रचार-प्रसार हो। कानूनी प्रक्रिया सुगम व सर्वसुलभ बने। जीवनाधार का कोई संबल या स्रोत उपलब्ध न होने की दशा में उनकी सम्पूर्ण देखभाल का जिम्मा निर्विवादित रूप से सरकारों द्वारा उठाया जाए। यह स्वाभाविक तौर पर थोड़ा कठिन अवश्य लगता है, किंतु यदि समाज व सरकारें संयुक्त रूप से अपने दायित्व के प्रति कृतसंकल्प हो जाएं तो कुछ भी असंभव नहीं। 

बुजुर्ग समाज रूपी विशाल वृक्ष की जड़ें हैं। असंवेदनशीलता ‘इच्छा मृत्यु’ के रूप में प्रहार करे अथवा असमर्थता का बोध ‘इच्छा मृत्यु’ की मांग का कारण बने, दोनों ही अवस्थाएं समाज व राष्ट्र के लिए घातक व शर्मनाक हैं। 

यह भी नहीं भूलना चाहिए कि जिस गति से भारत में अंग प्रत्यारोपण को लेकर कानून की आड़ में अवैध धंधा पांव पसार रहा है, उसी प्रकार ‘इच्छा मृत्यु-अधिकार’ का दुरुपयोग भी संभावित है। ‘इच्छा मृत्यु’ का प्रावधान केवल वहीं लागू हो पाए, जहां कोई अन्य विकल्प न बचा हो, प्रत्येक स्तर पर हमें यह सुनिश्चित बनाना होगा।-दीपिका अरोड़ा 
 


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