बुजुर्गों की सेवा में ‘समय बैंक’
punjabkesari.in Monday, Jan 26, 2026 - 07:27 AM (IST)
भारत जैसे देश में, जहां बुजुर्गों की संख्या तेजी से बढ़ रही है और पारंपरिक परिवार संरचना कमजोर पड़ रही है, बुजुर्गों की देखभाल एक बड़ी चुनौती बन गई है। सरकारी पैंशन योजनाएं और सामाजिक सुरक्षा कार्यक्रम तो हैं लेकिन वे अक्सर अपर्याप्त साबित होते हैं। ऐसे में, स्विट्जरलैंड की ‘समय बैंक’ अवधारणा एक प्रेरणादायक मॉडल प्रस्तुत करती है, जो न केवल बुजुर्गों की देखभाल को सुनिश्चित करती है, बल्कि समाज में सहानुभूति और सामुदायिक भावना को भी मजबूत करती है। यह अवधारणा, जो स्विट्जरलैंड के संघीय सामाजिक सुरक्षा मंत्रालय द्वारा विकसित की गई है, युवाओं को बुजुर्गों की सेवा करने का अवसर देती है और बदले में उन्हें भविष्य में खुद की देखभाल के लिए ‘समय’ जमा करने की अनुमति देती है।
स्विट्जरलैंड में इस कार्यक्रम की शुरुआत बुजुर्गों की बढ़ती आबादी और उनकी देखभाल की जरूरतों को ध्यान में रखकर की गई थी। कार्यक्रम के अनुसार, स्वस्थ और संवाद करने में कुशल व्यक्ति बुजुर्गों की मदद करते हैं, जैसे खरीदारी करना, कमरा साफ करना, सूरज की रोशनी में बाहर ले जाना या केवल बातचीत करना। प्रत्येक घंटे की सेवा को सामाजिक सुरक्षा प्रणाली के व्यक्तिगत ‘समय खाते’ में जमा किया जाता है। जब व्यक्ति खुद बुजुर्ग हो जाता है या बीमार पड़ता है, तो वह इस जमा समय को निकाल सकता है और अन्य स्वयंसेवक उसकी देखभाल करेंगे। यह प्रणाली न केवल पैसे की बचत करती है बल्कि मानवीय संबंधों को भी मजबूत करती है।
भारत में इस अवधारणा को लागू करने की संभावनाएं अपार हैं। एक अनुमान के तहत, 2030 तक हमारे देश में बुजुर्गों की आबादी 19 करोड़ से अधिक हो जाएगी और कई परिवारों में बच्चे शहरों में बस जाते हैं, जिससे बुजुर्ग अकेले रह जाते हैं। पारंपरिक रूप से, भारत में बुजुर्गों की देखभाल परिवार की जिम्मेदारी रही है लेकिन आधुनिकीकरण ने इस संरचना को प्रभावित किया है। ‘समय बैंक’ जैसा कार्यक्रम युवाओं को प्रोत्साहित कर सकता है कि वे बुजुर्गों की सेवा करें और बदले में उन्हें अपनी सुरक्षा का आश्वासन मिले। यह न केवल सरकारी संसाधनों पर दबाव कम करेगा बल्कि बेरोजगार युवाओं को सार्थक कार्य प्रदान करेगा।
हालांकि, भारत में इसे लागू करने से पहले कुछ चुनौतियों पर विचार करना जरूरी है। सबसे पहले, कार्यक्रम की निगरानी के लिए एक मजबूत डिजिटल प्लेटफार्म की जरूरत होगी, जहां सेवा घंटों को रिकॉर्ड किया जा सके। आधार कार्ड और डिजिटल इंडिया जैसे मौजूदा सिस्टम इसमें मदद कर सकते हैं। दूसरा, स्वयंसेवकों की ट्रेङ्क्षनग जरूरी है, ताकि वे बुजुर्गों की भावनात्मक और शारीरिक जरूरतों को समझ सकें। तीसरा, दुरुपयोग रोकने के लिए सख्त सत्यापन प्रक्रिया होनी चाहिए, जैसे कि समय निकासी के समय पहचान जांच। सरकार को दिल्ली या मुंबई जैसे शहरों में इसकी पायलट प्रोजैक्ट की तरह से शुरुआत करनी चाहिए। यदि सफल रहा, तो इसे राष्ट्रीय स्तर पर विस्तारित किया जा सकता है। यह आयुष्मान भारत या राष्ट्रीय वृद्धजन स्वास्थ्य देखभाल कार्यक्रम के साथ एकीकृत किया जा सकता है। कॉर्पोरेट घराने एन.जी.ओ. को अपने कॉर्पोरेट सोशल रिस्पॉन्सिबिलिटी (सी.एस.आर.) फंड्स और स्थानीय समुदायों द्वारा सहयोग करें।
इस अवधारणा के सामाजिक लाभ भी कम नहीं हैं। आज के दौर में, जहां अकेलापन एक महामारी बन गया है, ‘समय बैंक’ लोगों को जोड़ सकता है। बुजुर्गों से बातचीत करने से युवाओं को जीवन के अनुभव मिलेंगे और बुजुर्गों को भावनात्मक समर्थन। यह भारतीय मूल्यों-जैसे ‘सेवा परमो धर्म’ से मेल खाता है। भारत में, जहां पैंशन सीमित है, यह एक क्रांतिकारी कदम साबित हो सकता है। आर्थिक दृष्टि से भी यह फायदेमंद है। भारत में बुजुर्ग देखभाल पर खर्च बढ़ रहा है, नर्सिंग होम और अस्पताल महंगे हैं। ‘समय बैंक’ से स्वयंसेवी देखभाल बढ़ेगी, जिससे सरकारी व्यय कम होगा। यदि हम आज कदम उठाएं, तो कल के बुजुर्ग, जो आज के युवा हैं, एक सुरक्षित और सम्मानजनक जीवन जी सकेंगे। यह न केवल एक नीति है, बल्कि मानवता का निवेश है।-विनीत नारायण
