दो सांसों की डोर पर टिकी है यह जिंदगी

6/6/2021 5:11:17 AM

सुना और देखा होगा आपने कि दो आदमी किट में लिपटे आए, पुल से दरिया में लाश फैंकी और रफू-चक्कर हो गए। चार सफाई कर्मचारियों ने सफेद कपड़े में लिपटी लाश को उठाया और किसी अज्ञात स्थान पर जला दिया। यह लाश दिल्ली के प्रसिद्ध अस्पताल से उठाई गई थी। दूसरा मंजर गंगा मैया में तैरती लाशों का देखा। तीसरा दृश्य देखा कि दो आदमियों ने एक गड्ढा खोदा, लाश को दबाया और शीघ्रता से नौ दो ग्यारह हो गए। चौथे दृश्य में तो मानव की लाश को कुत्तों द्वारा नोचते हुए देखा। 

कोरोना महामारी में मृतकों की लाशों की ऐसी बेकद्री देखकर तो रूह कांप गई। पर प्लेग महामारी का वह दृश्य कैसा होगा जब गांव के गांव जला दिए गए होंगे? दादा जी सुनाया करते तो स्वयं रुआंसे हो जाते। दादी कहानी सुनाती तो कहती इंसान की हस्ती मात्र दो गज कपड़ा है मोहन लाल। और प्रसिद्ध गायक गुरदास मान गाया करते ‘‘ढाई हथ्थ थां तेरे लई बंदिया’। कभी-कभार लाला जगत नारायण हंसी-हंसी में कहा करते-दो सांसों की डोर पर टिकी है यह इंसानी जिंदगी। मैं मुस्कुरा दिया करता, ‘‘नहीं, जी मनुष्य ने बड़े-बड़े डैम बनाए, दरियाओं के रुख मोड़ दिए।’’ 

मानव तो सिकंदर महान है। वह तो अहमदशाह अब्दाली, महमूद गजनी, मोहम्मद गौरी, चंगेज खान और तैमूरलंग है। यह लूट-खसूट, यह महल-माठियां तो इसी मानव की हैं। एक आतंकी मानव को तो दूसरे की गर्दन काटते तनिक भी डर नहीं लगा। भरी जवानी में तो इस मानव का अट्टहास भी मान नहीं था। सफेद चादर में लपेट दिया इस मानव को कोरोना ने। कोरोना संक्रमित को अपने ही नहीं सभाल रहे। संभालना तो क्या अपने पिता की लाश को पुत्र कंधा नहीं दे रहा। श्मशानघाट तक सगे संबंधी नहीं जा रहे। कोरोना ने कैसा समय ला दिया। 
आज दिल्ली में मेरे एक परम मित्र की धर्मपत्नी का कोरोना से देहांत हो गया, अफसोस देखिए मेरे मित्र जो स्वयं कोरोना पीड़ित हैं, पत्नी को कंधा तो क्या देना था, श्मशानघाट तक न जा सके। मेरे सगे सांढू जो पेशे से सुप्रसिद्ध डाक्टर थे, कोरोना से उनका देहावसान क्या हुआ कि उनके परिवार के किसी सदस्य को श्मशानघाट नहीं जाने दिया गया। सगा जवान भतीजा गया तो पता ही नहीं कि उसका संस्कार किसने कर दिया। भाभी बीमार हैं, आदमी की विवशता देखिए खबर लेने नहीं जा सकता। सहमा हुआ, डरा हुआ, बेबसी के इस आलम में तड़पता मानव अपने कमरे में बंद हो गया। ऊपर से रोजी-रोटी की चिंता। 

बीच में इस महामारी का फंदा? मानव करे भी क्या? एक सन्नाटा-सा पसरा है सारे आलम में और आगे है मानव के ‘अंतहीन अमावस’ यानी अंधेरा ही अंधेरा। बुद्धिजीवी जरूर उपदेश दे रहे हैं कि ‘सकारात्मक सोच बढ़ाओ, अच्छा सोचो, ध्यान करो, योग करो।’ पर डर और भय में ध्यान कहां? टिड न पइयां रोटियां ते सब्बे गल्लां खोटियां। न काम, न काज, ऊपर से महामारी का खौफ। दूसरा अपनों का ‘अनलमेंटेड’ और ‘अनवैप्ट’ चले जाना। हमने तो कभी सोचा ही नहीं था कि महामारी से ऐसा होता होगा। 

मेरी यह सोच कोरोना के 15 दिनों के अज्ञातवास में पनपी। चलो, अच्छा हुआ कि मेरे डाक्टर बेटे एवं मेरी पुत्रवधू डाक्टर ने मुझे अपने प्रयासों से इस कोरोना महामारी से बाहर निकाल लिया परन्तु चिंता तो मुझे उनकी खाए जा रही है जिन्हें न डाक्टर मिले, न बैड, न कोवैक्सीन मिली, न ऑक्सीजन। तड़पते-तड़पते इस दुनिया को अलविदा कह गए। ऊपर से रोना यह कि अंतिम समय कोई भी व्यक्ति मृतक के दर्शन भी न कर सका। बुद्धिजीवी फिर उपदेश देने लगे कि यह तो मानव की अपनी गलती है। उसने प्रकृति से खिलवाड़ किया था। प्रकृति नाराज हो गई। मैं पूछता हूं इन बुद्धिजीवियों से, तब आवाज बुलंद क्यों नहीं की जब मनुष्य प्रकृति को उजाड़ रहा था। तब तो यह बुद्धिजीवी प्रकृति सेवक सुंदर लाल बहुगुणा का मजाक उड़ा रहे थे। 

ऊर्जावान, पवित्र बेईं नदी को साफ करने वाले बाबा सीचेवाल का साथ क्यों न दिया। इन्होंने नर्मदा बांध के निर्माण  का विरोध करने वालों मेधा पाटकर और बाबा आ टे की बातों की तरफ ध्यान क्यों नहीं दिया? मैंने बतौर वन मंत्री सभी संतों, महंतों, शंकराचार्यों और सिख पंथ के सभी हैडग्रंथियों को हाथ जोड़ कर प्रार्थना की कि कड़ाह प्रसाद, फुल्लियों और पताशों के साथ-साथ पौधों का प्रसाद आप लोग अपनी-अपनी संगतों में बांटना शुरू करें। पर मुझे अफसोस है तत्कालीन त त श्री केसगढ़ आनंदपुर साहिब के हैडग्रंथी के सिवाय किसी ने मेरा निवेदन स्वीकार नहीं किया। मैं चिल्ला-चिल्ला कर कहता रहा कि पौधे मानव का जीवन हैं, वर्षा है, अन्न है। तब बुद्धिजीवियों ने कहा, मैं पागल हूं। 

कोई भी समझदार व्यक्ति बुरा न माने। मरने वाले व्यक्ति की लाश के भी कुछ कानूनी अधिकार हैं। लाशों का पूरा स मान होना चाहिए। लाशों का तिरस्कार कानूनी अपराध है। ईसाई और मुस्लिम समुदायों में लाशों को पूरे धार्मिक संस्कारों से दफनाने का नियम है। उनकी कब्रों को फूल-पौधों से नवाजा जाता है। ङ्क्षहदू मायथोलॉजी में लाशों का विधि विधान से जला कर संस्कार किया जाता है। परन्तु कोरोना महामारी में ङ्क्षहदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई, यहूदी, पारसी सभी को एक ही चिता पर चढ़ाया जा रहा है। हां, संकटकाल एक बात जरूर सिखा जाता है कि संकट में ‘हम सब एक हैं’ परन्तु भारत में अपने समाज का आलम ही निराला है। 

मैं मोदी के दोष निकाल रहा हूं तो मोदी साहिब कांग्रेस पर दोष मढ़ रहे हैं। संकट की इस महामारी में भी हमारे समाज में कांग्रेस, बीजेपी, अकाली, बहुजन समाज पार्टी, कम्युनिस्ट या समाजवादी बने हुए हैं। धड़ाधड़ एक-दूसरे को इस महामारी का दोषी ठहरा रहे हैं। मानव की हस्ती को भी पहचान लिया।-मा.मोहन(पूर्व परिवहन मंत्री.पंजाब)


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