यह जीवन एक शो की तरह चल रहा है

09/19/2021 3:33:07 AM

जैसे कि घातक कोरोना वायरस की तीसरी लहर का खौफ सिर पर है, लोग और अधिक सावधान तथा जागरूक हो रहे हैं। अब तक लोगों ने इस वायरस के पैट्रन को समझ लिया है तथा यदि परिवार में कोई एक इस वायरस का शिकार हो गया तो ज्यादातर लोगों ने क्या जरूरी और क्या करना है इस पर मिल कर काम किया। महामारी के इन दो वर्षों में हमारे इर्द-गिर्द व्याप्त प्रोटोकोल तथा व्यवहार को सबने समझ लिया है। हमने यह भी सीख लिया है कि यह बेहद अनिवार्य है कि परिवार, दोस्त तथा हमारे आसपास के लोगों ने ऐसे समय में वायरस से बहुत कुछ सीखा है। हमने दयालुता को भी सीखा है तथा फ्रंटलाइन कर्मचारियों के मूल्यों को भी समझा है। परमेश्वर डाक्टरों, नर्सों, पुलिस, एम्बुलैंस, ड्राइवरों तथा उन सब लोगों पर दया दिखाएं जिन्होंने जरूरतमंदों तथा गरीबों को अपने सभी साधनों से उनकी मदद की है। 

पिछले कई दशकों से यह सब कुछ देखना विचित्र था कि भारत में कितने परिवार पारिवारिक सदस्यों की हेंकड़ी के कारण टूट रहे हैं। यह सब विचलित करने वाली बात थी और इसका कोई समाधान दिखाई नहीं देता था कि कैसे किया जाए। किसी के पास एक-दूसरे के लिए वक्त ही नहीं था। यह सब एक चूहा दौड़ की तरह थी और किसी एक व्यक्ति के पास शायद ही एक मिनट का समय हो जिस दौरान वह अपने अभिभावकों, रिश्तेदारों या फिर दोस्तों से बात कर सकें। 

मेरी मां आमतौर पर कहा करती है कि महामारी का ऐसा दौर, भूस्खलनों तथा बाढ़ जैसी बातें ‘भगवान का कहर है’। बड़ों से लेकर बच्चों तक, बूढ़ों से लेकर युवाओं तक प्रत्येक व्यक्ति का एक अपना विचार था और कोई भी बीच का रास्ता दिखाई नहीं पड़ता था। युवा वर्ग अपने ही कारोबार में उलझा हुआ था और वे इस विचार के साथ आगे बढ़ रहे थे कि शायद कल आएगा ही नहीं। परिवार दाएं-बाएं से टूट रहे थे और बहुत कम मूल्य बचे हुए थे। हर व्यक्ति एक गति के साथ आगे बढ़ रहा था और ऐसा सोच रहा था कि सब कुछ नकली है और एक शो की तरह है। पैसा पानी की तरह बहाया जा रहा था। यह पैसा शादियों, जन्मदिन समारोहों, छुट्टियों पर लुटाया जा रहा था। ये सब बातें ऐसे देश की हैं जहां पर भुखमरी, बेघर तथा गरीबी से लोग पीड़ित हैं। सभी चीजों का मूल्य शून्य हो चुका था। 

इस वायरस ने बलपूर्वक हम सभी का दिमाग बदल दिया है। हम सबने समझा है कि यहां कुछ भी स्थायी नहीं और हम यह नहीं जानते कि अगले ही सैकेंड क्या होने वाला है।  युवा मर रहे हैं, बूढ़े मर रहे हैं, स्वस्थ लोग भी मर रहे हैं और बच्चे झेल रहे हैं। बच्चे स्कूल नहीं जा सकते, न वे पार्कों में खेलने जा सकते हैं और न ही जन्मदिन की पाॢटयां आयोजित कर सकते हैं। वे अपने घर पर बैठ कर ऑनलाइन क्लासें चला रहे हैं। न कोई दोस्त, न ही किसी से बातचीत हो रही है। इस दौरान हमारी दादी मां के खाने की रिवायतों ने हमें एक बार फिर स्वस्थ रखा है। 

हमने अपनी रसोई में अदरक, हल्दी, छोटी इलायची और दालचीनी का प्रयोग फिर से किया है। अब सभी घर पर बनी मिठाई का आनंद लेते हैं। अब परिवार के सदस्य शाम को एक साथ बैठ कर खाना खाते हैं। अब सब परिवार संयुक्त परिवार की तरह रह रहे हैं। दोस्तों ने भी यह समझा है कि वे जीवन भर आपके साथ रहेंगे। सामाजिक दिनचर्या बहुत कम हो गई है और इससे बहुत पैसा बचाया जा सका है क्योंकि कोई भी होटलों तथा रेस्तरां में खाना खाने नहीं जा रहा। औरतें भी घर पर कार्य कर रही हैं और अपने परिवार की देखरेख में लगी हुई हैं। मुझे यकीन है कि संयम का अभाव सब में है। मैं भी अपने परिवार के लिए स्वच्छ और स्वस्थ खाना बना रही हूं और हम एक-दूसरे का साथ निभा रहे हैं। आसपास भी स्वच्छता का स्तर बढ़ा है। 

मैं मानती हूं कि ऐसे दौर में सबसे बदतर हिस्सा  यह है कि अमीरों और प्रसिद्धों ने खुले दिल से अपना योगदान नहीं दिया। वह इससे भी ज्यादा कर सकते थे। हमारे उद्योगपति अपने क्षेत्रों में और अधिक मदद कर सकते थे।  सरकार को भी यकीनी बनाना चाहिए था कि वे ऐसा करें। वास्तविकता यह है कि गुरुद्वारों जैसी संस्थाओं तथा कुछ अन्य छोटी संस्थाओं ने प्रत्येक की मदद की क्योंकि कारोबार निम्र हो चुका है, लोगों के लिए यह मुश्किल है कि वे ऐसे संस्थानों, वरिष्ठ नागरिकों और बेसहारों की मदद कर सकें क्योंकि उनके पास दवाइयों तथा नर्सों या डाक्टरों को देने के लिए पर्याप्त पैसा नहीं है। डोनेशन का प्रवाह कम हो चुका है। यह अच्छा है कि हमारे धनी मंदिर, गुरुद्वारे और सिख समुदाय ने बिना किसी भेदभाव, जाति और धर्म के लोगों की सहायता की है।-देवी एम. चेरियन 
 


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Content Writer

Pardeep

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