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‘सवाल’ उठाने तो बनते ही हैं

2020-06-26T03:34:48.157

11 घंटे की मैराथन बैठक के बाद भारतीय और चीनी सेनाओं के कोर कमांडर विवादित पूर्वी लद्दाख सीमा पर तनाव कम करने के लिए आपसी सहमति पर पहुंचे हैं। लद्दाख की गलवान घाटी में पी.एल.ए. के सैनिकों द्वारा 20 भारतीय सैनिकों के शहीद किए जाने के बाद से 8 दिनों के बाद विघटन पर निर्णय आया है। हालांकि इस प्रक्रिया के लिए अभी तक कोई समय-सीमा निर्धारित नहीं की गई। 

मुख्य बिंदू यह है कि क्या हम वास्तविक नियंत्रण रेखा (एल.ए.सी.) पर शांति बनाए रखने के लिए चीन पर भरोसा कर सकते हैं? साम्राज्यवादी तथा विस्तारवादी राष्ट्र के तौर पर चीन का पूर्व का इतिहास देखते हुए यह कठिन लगता है कि इस कठोर  पत्थर को हम तोड़ पाएंगे। चीन कभी भी अपने शब्दों पर कायम नहीं रहा। अब ऐसी रिपोर्टें आई हैं कि इसने हमारी दौलतबेग ओल्डी (डी.बी.ओ.) की हवाई पट्टी के निकट डेपसांग में एक नया फ्रंट खोल दिया है। हम कभी भी पूरे तौर पर गलवान घाटी में पेईचिंग के भविष्य के आयामों के बारे में कुछ नहीं कह सकते। 

1993 में चीन ने भारत के साथ बार्डर पीस एंड ट्रैनक्वैलिटी एग्रीमैंट (बी.पी.टी.ए.) पर हस्ताक्षर किए थे। सीमा पर शांति तथा सौहार्द के लिए कई संचालित परिक्रियाओं को भी अपनाया गया था। वह सब अब इतिहास के ढेर पर हैं। यह कहना है चीन में भारत के पूर्व राजनयिक गौतम बम्बावाले का। गौतम बम्बावाले का कथन है कि जमीनी स्तर पर कुछ छोटे तकनीकी लाभों के लिए चीन ने कूटनीतिक तौर पर भारत को खो दिया (द हिंदू जून 22)। मैं उनसे बिल्कुल सहमत हूं। यथास्थिति बनाने के लिए प्रधानमंत्री मोदी ने बहुआयामी निजी समझौतों का निर्माण करने के लिए कुछ विशेष प्रयास किए। पीपल्स लिब्रेशन आर्मी (पी.एल.ए.) शीर्ष नेतृत्व से सिग्नल के बिना अपने ही शब्दों पर खरी नहीं उतरी। उस मामले में नई दिल्ली पेईचिंग के साथ राजनीतिक तथा आर्थिक समझौतों के विस्तार को देखता आया है। 

भारत-चीन समझौते वास्तविक होने चाहिए थे जोकि हमारे राष्ट्रीय हितों पर आधारित हैं। मैं यह देख कर खुश हूं कि भारतीय नेतृत्व एक सही दिशा की ओर कदम बढ़ा रहा है। एल.ए.सी. पर  जमीनी स्थिति पर कोई भी कार्रवाई के लिए हमारे सशस्त्र बलों को खुली छूट मिल गई है। भारतीय वायुसेना ने अपने फ्रंटलाइन लड़ाकू विमानों को तैनात किया है जिसमें एस.यू.-30 एम.के.-1 एस. तथा मिग-29 यू.पी.ए., ए.एच.-64 ई अपाचे हैवी अटैक हैलीकॉप्टर शामिल हैं। इसका मकसद चीनी रक्षापंक्ति को बेअसर करना है। इसके अलावा भारत ने सी.एच.-47 चिनूक हैवी लिफ्ट हैलीकॉप्टरों को भी लद्दाख में तैनात किया है। इन सब बातों से पेईचिंग को एक स्पष्ट संदेश पहुंचाया जा रहा है कि नई दिल्ली व्यवसाय चाहता है और चीन को उसके हिसाब से नहीं चलना होगा। यह सब जरूरी भी था क्योंकि चीन ने अपनी तोपों से लैस वाहन तथा टैंक एल.ए.सी. पर अपनी ओर तैनात किए थे। 

एल.ए.सी. के आसपास भारत चाहता है कि 5 मई से पूर्व वाली यथास्थिति बनाई जा सके। गलवान मुश्किल के अलावा पैंगोंग त्सो क्षेत्र भी एक गर्म मुद्दा है क्योंकि पेईङ्क्षचग ने ङ्क्षफगर 4 तक अपने पैर पसारे हैं और ङ्क्षफगर 8 पर भी अपना दावा ठोक रहा है। रक्षा रिपोर्टें सुझाती हैं कि पैंगोंग त्सो क्षेत्र का मामला निपटने में समय लग सकता है। पूर्व सेनाध्यक्ष जनरल वी.पी. मलिक का कहना है कि एल.ए.सी. पर किसी प्रकार की भी घुसपैठ और इससे संबंधित क्षेत्र की रक्षा करने को कब्जा माना जाना चाहिए। मेरी धारणा यह है कि पैंगोंग त्सो के उत्तर में पी.एल.ए. सैनिकों ने फिंगर 4 और 8 जहां पर दोनों देश हाल ही में पैट्रोलिंग कर रहे थे, के विवादास्पद क्षेत्र पर कब्जा कर रखा है। गलवान घाटी में एल.ए.सी. से लेकर सयोक रिवर के साथ पोजीशनें ले रखी हैं। इस तरह चीन ने एल.ए.सी. पर हमारी गतिविधियों को नकारा है। 

यह एक बेहद संवेदनशील मामला है और मोदी सरकार को इसकी अनदेखी नहीं करनी चाहिए। इस संदर्भ में जो बात विचलित करने वाली है, वह यह है कि सर्वदलीय बैठक में प्रधानमंत्री की टिप्पणी पर विवाद उपजा है। मोदी ने कथित तौर पर उस दिन कहा था कि न तो हमारे क्षेत्र के अंदर कोई है और न ही हमारे किसी क्षेत्र पर कब्जा किया गया है। इस बयान के जवाब में कांग्रेस ने पूछा है कि क्या प्रधानमंत्री मोदी का मतलब यह है कि भारतीय क्षेत्र चीन को सौंप दिया गया है। हालांकि पी.एम.ओ. ने कांग्रेस की टिप्पणी को पी.एम. की टिप्पणी के लिए शरारती व्याख्या के रूप में खारिज कर दिया। इसने स्पष्ट किया कि प्रधानमंत्री की टिप्पणियों की वास्तविक नियंत्रण रेखा के हमारे पक्ष में कोई चीनी उपस्थिति नहीं थी, जोकि हमारे सशस्त्र बलों की बहादुरी के परिणामस्वरूप स्थिति से संबंधित थी। 16 बिहार रैजीमैंट के सैनिकों के बलिदान ने चीनी पक्ष के प्रयास को विफल कर दिया और उस दिन एल.ए.सी. के इस बिंदू पर किए गए चीनी प्रयास को भी समाप्त कर दिया गया। 

राष्ट्र के लिए संकट की इस घड़ी में मैं प्रधानमंत्री मोदी की विश्वसनीयता पर कोई सवाल नहीं उठाऊंगा। वह एक अच्छे वक्ता हैं और अच्छी तरह से ध्यान केेन्द्रित करने वाले नेता हैं मगर कई मौकों पर वह अपने शब्दों के लिए डगमगा जाते हैं। मैं पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की बात से सहमत हूं कि पी.एम. मोदी को हमेशा ही अपने शब्दों के उलझाव के प्रति सचेत रहना चाहिए। प्रधानमंत्री मोदी आमतौर पर बिना तैयारी के ही बोल देते हैं जो अनुचित शब्दों के इस्तेमाल का नेतृत्व होता है। मगर पी.एम. मोदी की देश की अखंडता और सम्प्रभुता के प्रति उनके योगदान और उनकी प्रतिबद्धता पर सवाल नहीं उठाने चाहिएं। राहुल गांधी के प्रधानमंत्री मोदी को सैरेंडर मोदी कह कर बुलाना भी अच्छी बात नहीं। राजनीतिक दृष्टि से एक नकारात्मक रवैया अपनाना राहुल के लिए मददगार साबित नहीं होगा। राहुल को ममता बनर्जी, मायावती तथा शरद पवार जैसे विपक्षी नेताओं से सीखना होगा।-हरि जयसिंह


Pardeep

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