एक असफल वैश्विक पुलिस मैन है अमरीका

2021-04-18T04:37:59.28

11 सितम्बर तक अमरीकी राष्ट्रपति जो बाइडेन का अफगानिस्तान से बाहर निकलने का फैसला एक सराहनीय कदम है। उन्होंने हार को स्वीकार करने का साहस दिखाया है। एक ऐसे युद्ध को लम्बा खींचने जिसे अमरीका कभी भी जीत नहीं सकता, से अपने नुक्सान को कम करने और सैनिकों को घर बुलाने का कदम समझदारी लगता है। 

अमरीका ने 9/11 हमलों के बाद अपने सुरक्षाबलों को अफगानिस्तान भेजा था। इस हमले का मास्टर माइंड ओसामा बिन लादेन वहां से अपना कार्य संचालित कर रहा था। यह एक वैध खोज थी। तालिबान शासकों का बोरिया-बिस्तर गोल हो चुका था। हालांकि अमरीकी एक बार फिर पाकिस्तान द्वारा छले गए। आई.एस.आई. की मदद से तालिबान का सफाया करने में वे विफल रहे। हालांकि यह स्पष्ट था कि पाकिस्तान के दोहरे आचरण पर तालमेल के बिना तालिबान को हराना कठिन होगा। 

अमरीकियों ने अफगानिस्तान में अपने आदमियों और सामग्री को उतारा। अपनी युद्ध सामग्री, हवाई क्षेत्र तथा अन्य आपूर्ति के लिए वांछित भूमि हेतु पाकिस्तान को बिलियन डालर नकद दिए गए। एक बार फिर लादेन पाकिस्तानी क्षेत्र में मारा गया। फिर भी अमरीकी अपने नुक्सान में कटौती करने और घर लौटने में असफल रहे। तब यह स्पष्ट था कि तालिबानों को वहां से जड़ से नहीं हिलाया जा सकता। कठपुतली सरकार ने काबुल तथा कुछ ने शहरी केंद्रों पर नियंत्रण किया। 2001 से लेकर 2011 तक जब ऐबटाबाद में बिन लादेन का सफाया हुआ तब अमरीकियों ने पूरा दशक ही अफगानिस्तान में गुजार दिया। तब किसी को आशा नहीं थी कि सुरक्षाबलों की वापसी के नतीजे में तालिबान फिर से वापस नहीं लौटेंगे। 

एक दशक बाद अब 2021 में अमरीका ने अंतत: उस बुरे दौर के बाद पीछे मुडऩा चाहा है। एक बार जब अमरीकी वापस लौट जाएंगे तो अफगानिस्तान में सिविलियन सरकार की हिस्सेदारी होगी। तालिबान अमरीका के साथ यह बात करते हैं कि सिविलियन सरकार कितनी कमजोर होगी और किस तरह तालिबान  आतंकियों से भिड़ा जाएगा। एक बार अमरीका अफगानिस्तान को छोड़ देगा तो कट्टर इस्लामवादियों का शासन चलेगा। इस्लामवादी आतंकवादी और उनके आध्यात्मिक साथी आई.एस.आई. एक बार फिर अफगानिस्तान को पीड़ा देंगे। दो दशकों तक अफगान पुरुषों और महिलाओं द्वारा जिस स्वतंत्रता का आनंद लिया गया था एक बार फिर से अमरीका के लौटने के बाद सारी स्वतंत्रताएं खत्म हो जाएंगी। 

भारत यह सुनिश्चित नहीं कर सकता कि तालिबान आई.एस.आई. द्वारा प्रशिक्षित आतंकियों को कश्मीर और इस देश में अन्य जगहों पर तबाही मचाने के लिए रोक सकेगा। भारत के सुरक्षा प्रतिष्ठान को यह सुनिश्चित करना होगा कि आई.एस.आई. द्वारा नियंत्रित तालिबान देश में तबाही मचाने के लिए अपनी कार्रवाइयां न करे। इस बीच यह महत्वपूर्ण है कि द्वितीय विश्व युद्ध के बाद अमरीकियों ने एक भी जंग नहीं जीती। अमरीका ने अनेकों विदेशी धरतियों पर सैन्य दखलअंदाजी तो की है मगर अपने उद्देश्यों को अंजाम तक पहुंचाने के लिए वह सफल नहीं हो पाया। 

छोटे से वियतनाम के हाथों मिली शर्मनाक हार से उसने कोई सबक ही नहीं सीखा। मध्य एशिया में भी उसको काफी नुक्सान हुआ है। ईराक, ईरान, सीरिया और लीबिया में अमरीकी सैन्य हस्तक्षेप इस बात का गवाह है कि उसे बहुत कुछ गंवाना पड़ा। उसे जान और माल की एक बड़ी कीमत चुकानी पड़ी। असफल विदेशी नीति को आगे बढ़ाने के लिए यह कीमत डैमोक्रेटिक और रिपब्लिकन प्रशासन दोनों ने चुकाई। एक ‘वैश्विक पुलिस मैन’ की भूमिका को अमरीका ने बिना कुछ लक्ष्य पाए खेला। इसने अमरीका को कमजोर कर दिया और उसका खून रिसता रहा। 

मध्य एशिया की बात करें तो थोड़ा कहना ही बेहतर होगा। दो खाड़ी युद्ध अमरीका के लिए तबाहकुन साबित हुए। अरब धरती पर लोकतंत्र का बीज प्रफुल्लित करने में अमरीका असफल हो गया। इससे अरब जगत अमरीका के खिलाफ हो गया। प्रत्येक अरब राष्ट्र में अमरीका को खत्म करने के नारे सुने जाते हैं। जहां एक ओर अमरीका वैश्विक पुलिस मैन होने का खेल खेलता रहा वहीं उसके प्रतिद्वंद्वी अपनी अर्थव्यवस्थाओं और सेना को बढ़ाने में अपना ध्यान केन्द्रित करते रहे। इसका नतीजा यह हुआ कि व्लादीमीर पुतिन के अंतर्गत आश्वस्त रूस और शी जिन पिंग के नेतृत्व में चीन अमरीका को कुचलने के लिए आगे बढ़ रहा है। पुतिन सीरिया में अमरीकी योजना को भी विफल करते नजर आए। 

ईराक में अमरीकी कितनी देर खड़े रह सकते हैं यह स्पष्ट नहीं मगर सच्चाई यह है कि वह देश एक मझधार में है और अफगानिस्तान की तरह नहीं है जो विदेशी सुरक्षाबलों की वापसी का इंतजार कर रहा है। ईराक में ईरान की बड़ी हिस्सेदारी है और उसने अमरीकियों को रौंदने का काम किया है। यहां तक कि अफगानिस्तान में भी चीन और रूस दोनों का पाकिस्तान के साथ सहयोग है। भारत इससे ज्यादा खुश नहीं रह सकता। शांति के वातावरण में एक विदेशी ताकत द्वारा खनिज और ऊर्जा स्रोतों को लूटने के लिए इंतजार हो रहा है। पाकिस्तान ने भी अमरीका को दो बार मूर्ख बनाया है। पहला उसने खैबर पख्तनूवा में तालिबानों को आश्रय दिया।  दूसरा यह कि तालिबान के खिलाफ लड़ाई लडऩे के लिए अमरीकियों की मदद का विश्वास दिला रहा है। 21वीं शताब्दी के सबसे बड़े युद्ध में अमरीका 2000 जानें और 2 ट्रिलियन डालर से ज्यादा का घाटा सह चुका है।-सीधी बातें वरिन्द्र कपूर
 


Content Writer

Pardeep

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