पेगासस की सच्चाई कभी नहीं बताई जाएगी

2021-07-30T06:23:50.167

पेगासस के बारे में मैं क्या जानता हूं? ग्रीक पौराणिक कथाओं के अनुसार यह एक उडऩे वाला घोड़ा था जिसका इस्तेमाल असंभव के लिए बेलेरोफोन करती थी-स्वर्ग पहुंचने के लिए। हालांकि बेलेरोफोन अपने अभियान में सफल नहीं हो सकी। वह मारी गई तथा घोड़ा एक तारामंडल में बदल गया! उस पेगासस के बारे में क्या, जिसे लेकर विपक्षी नेता मोदी जी तथा अमित जी पर आरोप लगा रहे हैं कि उनके खिलाफ इसका इस्तेमाल किया गया। क्या पेगासस का हश्र भी पौराणिक ग्रीक घोड़े जैसा होगा? 

एन.एस.ओ. से सा टवेयर किसने खरीदा? इस पर कितना खर्च हुआ? इसका उद्देश्य क्या था? ऐसे प्रश्रों का उत्तर कभी भी नहीं दिया जाएगा। यदि उत्तर दे दिया गया तो लबादों तथा खंजरों की दुनिया ताश के पत्तों के महल की तरह ढह जाएगी जिससे आखिरकार जीवन तथा सम्पत्ति और राष्ट्र की सुरक्षा खतरे में पड़ जाएगी। विश्व के सभी देश, यहां तक कि बहुत कम जनसं या वाले छोटे देशों को भी अपने नागरिकों पर नजर रखने की जरूरत होती है जो शांति भंग करना चाहते हैं। मुझे कभी भी खुफिया जानकारी एकत्र करने तथा उसकी समीक्षा करने का काम नहीं सौंपा गया है। 

जासूसी की कला में मैं निराशाजनक होता जब मैं 60 के दशक के अंत तथा 70 के दशक के शुरू में मुंबई में पुलिस उपायुक्त था, मेरे कोर्स सहयोगी सूर्यकांत जोग मुझे देखने के लिए बड़ी जल्दी में मेरे कार्यालय आए जिनके पास स्पैशल ब्रांच द्वारा पकड़ी  गई एक इंटरसैप्ट कॉल थी, जिसके साथ मुझे तेजी से सीट से उठाकर वह कमिश्नर के कमरे में ले गया। शिवसेना के संस्थापक तथा प्रमुख बाल ठाकरे मजदूर नेता जॉर्ज फर्नांडीज द्वारा उस शाम शिवाजी पार्क में संबोधित की जाने वाली जनसभा पर हमले बारे अपने ‘शाखा प्रमुखों’ में से एक के साथ बात कर रहे थे। यह क्षेत्र मेरे अधिकार क्षेत्र में आता था।  एस.जी. प्रधान पुलिस आयुक्त थे।

उन्होंने उस संवेदनशील सूचना की प्रति के साथ सूर्यकांत को मुख्यमंत्री वसंतराव नाईक को मिलने भेजा। इस बीच कमिश्रर तथा मैंने शिवसेना की योजना से निपटने के लिए अपनी रणनीति तैयार कर ली। मुख्यमंत्री कार्यालय पहुंचने पर तुरन्त सूर्यकांत जोग की बात सुनी गई। बाद में सूर्यकांत ने मुझे बताया कि नाईक ने पलक भी नहीं झपकी। स्वाभाविक था कि उन्हें योजना के बारे जानकारी थी और सूचना को अपने पास ही रखा। जोग को यह महसूस हुआ कि ठाकरे की योजना को मुख्यमंत्री की स्वीकृति प्राप्त थी। 

जब मेरी उपस्थिति में यह जानकारी प्रधान को दी गई तो हम परेशान हो गए। कमिश्रर ने इससे निपटने की जिम्मेदारी मुझे सौंप दी। मैंने सुरक्षा को मजबूत करने का निर्णय किया। प्रभारी पुलिस निरीक्षक एक अनुभवी व्यक्ति था। उसने मुझे बताया कि वह ऐसी दर्जनों राजनीतिक जनसभाओं से सफलतापूर्वक निपट चुका है और वह नहीं समझ सका कि क्यों एक युवा डी.सी.पी., जिसके पास बहुत कम अनुभव है पहले से ही साबित हो चुकी व्यवस्थाओं में खलल डालेगा। जब शिव सैनिकों ने अपनी योजना त्यागने का निर्णय किया तथा जनसभा बिना किसी बाधा के समाप्त हो गई। यदि हमला हो जाता तो मजदूर नेता तथा बाल ठाकरे की सेना के ल पट तत्वों के बीच एक बड़ा संघर्ष हो जाता। मैं अनुमान नहीं लगा सकता, यहां तक कि आज भी कि यह संघर्ष कैसा होता। 

मैं इस घटना अथवा ‘न हुई घटना’ का जिक्र कुछ चुनिंदा विपक्षी नेताओं, विशेषकर जिनका झुकाव हिंसा शुरू करने की ओर है, के फोनों पर जासूसी के महत्व बारे अपने पाठकों को बताना चाहता हूं। ऐसी जासूसी कोई नई बात नहीं, बहुत प्राचीन है। विपक्षी नेता आमतौर पर जानते होते हैं कि उनके फोन जांच के दायरे में हो सकते हैं। वर्दीधारी पुलिस की खुफिया इकाइयों के अतिरिक्त विभिन्न एजैंसियों को टैलीफोन टैप करने की ताकत दी गई होती है। यहां तक कि बड़े डिफाल्टर्स से निपटने वाले आयकर विभाग के एक वर्ग को भी ऐसी शक्ति प्राप्त होती है। हरेक के अपने नियम तथा प्रक्रियाएं होती हैं। वरिष्ठ अधिकारियों के पास फोन कॉल टैप करने के आदेश देने की ताकत होती है। 

मगर मैं यह नहीं समझ सकता कि क्यों, यदि यह सच है कि अश्विनी वैष्णव, जिन्हें मंत्री के तौर पर शामिल किया गया तथा प्रह्लाद पटेल जो पहले ही राज्य मंत्री थे, और 2014-15 से स्मृति ईरानी के ओ.एस.डी. संजय काचरू व प्रदीप अवस्थी, राजस्थान की पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे के निजी सचिव को जासूसी के दायरे में रखा गया? इसका असल उद्देश्य क्या था?

चुनिंदा सूची में विश्व हिंदू परिषद के पूर्व अंतर्राष्ट्रीय अध्यक्ष प्रवीण तोगडिय़ा को रखना समझ में आता है। 2002 के गुजरात दंगों के बाद से मोदी जी तथा वह अलग हो गए थे जब मारकाट एक दिन से अधिक चली थी। वह महिला जिसने तत्कालीन सी.जे.आई. पर छेड़छाड़ का आरोप लगाया था वह भी सूची में शामिल थी। यह भी हैरानीजनक नहीं है। कोई भी सरकार अपने हितों के समय जरूरत पड़ने पर शीर्ष न्यायिक अधिकारियों आदि के साथ तोल-मोल करने के लिए इस तरह के हथकंडे अपनाती है। 

विपक्ष तथा सिविल सोसाइटी के कुछ वर्ग लगातार सरकार से इस बात का खुलासा करने के लिए कह रहे हैं कि क्या उसने पेगासस खरीदा है और यदि ऐसा है तो इसके लिए धन कहां से आया? हालांकि उन्हें सरकारी स्रोतों अथवा आपूर्तिकत्र्ताओं की ओर से यह जानकारी नहीं मिलेगी। आवश्यक तौर पर वे सभी होंठ सिले हुए हैं।-जूलियो रिबैरो(पूर्व डी.जी.पी.पंजाब व पूर्व आई.पी.एस. अधिकारी)
 


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Content Writer

Pardeep

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