भारतीय नवाचार का वास्तविक हृदयस्थल : अनुसंधान प्रयोगशालाओं से ‘विकसित भारत’ की कक्षाओं तक
punjabkesari.in Sunday, Sep 06, 2026 - 06:06 AM (IST)
राष्ट्रीय शिक्षक पुरस्कार केवल व्यक्तिगत उत्कृष्टता की पहचान नहीं, ये हमारे देश के भविष्य को आकार देने वाले प्रमुख शिल्पकारों का सम्मान करते हैं। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के विजन के मार्गदर्शन में तथा ‘विकसित भारत 2047’ की दिशा में भारत की सामूहिक यात्रा में, नवाचार को अक्सर वैश्विक सूचकांक और वित्तीय खर्च जैसे तकनीकी नजरिए से देखा जाता है। फिर भी, नवाचार मूल रूप से एक मानवीय प्रयास है-यह छात्र की आंखों में जिज्ञासा की चमक और उस शिक्षक का अटूट समर्पण है, जो यह सुनिश्चित करता है कि कोई भी बच्चा पीछे न छूट जाए।
भारत में शिक्षा के मौजूदा विकास की सबसे खास बात यह है कि उच्च-स्तरीय प्रयोगशाला अनुसंधान और कक्षा की रोजमर्रा की हकीकत के बीच सोच-समझकर एक पुल बनाया जा रहा है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति (एन.ई.पी.) 2020 के तहत, नवाचार की परिकल्पना सामाजिक न्याय और आर्थिक सशक्तिकरण को बढ़ावा देने वाले एक उत्प्रेरक के तौर पर की गई है। यह विजन इस बात पर जोर देता है कि देश की वास्तविक प्रगति तभी हो सकती है, जब हमारे सबसे बेहतरीन शोध का फायदा आखिरी कतार में बैठे आखिरी बच्चे तक पहुंचे।
21वीं सदी में अपनी संप्रभुता और आर्थिक नेतृत्व को मजबूत करने की कोशिश कर रहे देश के लिए, एक मजबूत अनुसंधान और विकास (आर एंड डी) ईकोसिस्टम बहुत जरूरी है। भारत में एक मौलिक बदलाव आया है, देश अब मुख्य रूप से वैश्विक तकनीक को अपनाने की बजाय, वैश्विक चुनौतियों के लिए समाधान विकसित करने की ओर तेजी से बढ़ रहा है। यह बदलाव वैश्विक नवाचार सूचकांक में भारत की बढ़ती रैंकिंग में प्रतिङ्क्षबबित होता है, जहां देश 2014के 76वें स्थान से ऊपर उठकर 2025 में 38वें स्थान पर पहुंच गया है। हालांकि, असली कहानी भारत की कार्यक्षमता में छिपी है। नवाचार इनपुट के 52वें स्थान की तुलना में, भारत नवाचार आऊटपुट में अब दुनिया भर में 32वें स्थान पर है। यह दिखाता है कि देश में नवाचार इनपुट को बड़े प्रभाव वाले नतीजों में बदलने की क्षमता, कई दूसरे देशों के मुकाबले ज्यादा बेहतर है। इस संस्कृति को 6,000 से ज्यादा उच्च शिक्षा संस्थानों (एच.ई.आई.) में आर. एंड डी. प्रकोष्ठ बनाकर और 59,300 अनुसंधान सहयोग स्थापित करके संस्थागत रूप दिया गया है।
प्रधानमंत्री अनुसंधान फैलोशिप (पी.एम.आर.एफ.) द्वारा समर्थित भारत का प्रतिभा समूह भी अनुसंधान ईकोसिस्टम के एक महत्वपूर्ण स्तंभ के रूप में उभरा है। पी.एम.आर.एफ. ने 3,688 विद्वानों का समर्थन किया है, जिसके परिणामस्वरूप 10,300 शैक्षिक पत्रिका प्रकाशन, 7,966 सम्मेलन पत्र, 834 पेटैंट दाखिले और 221 पेटैंट स्वीकृत हुए हैं। पी.एम.आर.एफ. 2.0 10,000 फैलोशिप का समर्थन करने के लिए तैयार है और प्रधानमंत्री अनुसंधान प्रभाग (पी.एम.आर.सी.) को पहले ही 3,600 से अधिक फैलोशिप आवेदन प्राप्त हो चुके हैं। इस प्रकार भारत की बौद्धिक अवसंरचना का विस्तार जारी है। इसे उच्च शिक्षा वित्तपोषण एजैंसी (एच.ई.एफ.) ने और बढ़ावा दिया है, जिसने 111 संस्थानों में 281 परियोजनाओं के लिए 47,000 करोड़ रुपए से अधिक की मंजूरी दी है। ‘भारत में ए.आई. निर्माण’ के विजन को आगे बढ़ाने के लिए, कृत्रिम बुद्धिमत्ता में 4 समर्पित उत्कृष्टता केंद्र स्थापित किए गए हैं, जिनमें 1,490 करोड़ रुपए का संचयी निवेश किया जाएगा। जहां यह अवसंरचना भारत की प्रगति का आधार प्रदान करती है, वहीं ज्ञान का लोकतंत्रीकरण इसे जीवंत बनाता है।
ज्ञान तक पहुंच का यह विस्तार भारत के बौद्धिक संपदा ईकोसिस्टम में आए बड़े बदलाव के साथ-साथ हुआ है। घरेलू पेटैंट दाखिला 2014-15 के 42,763 से बढ़कर 2024-25 में 1,10,375 हो गया, जो 158 प्रतिशत की भारी वृद्धि को रेखांकित करता है। महत्वपूर्ण बात यह है कि 2021-22 के बाद से इन दाखिलों में शिक्षा क्षेत्र की हिस्सेदारी 3 गुना बढ़ गई है, जो 11.15 प्रतिशत से बढ़कर 34.13 प्रतिशत हो गई है। सबसे अहम बदलावों में से एक है ‘किताब एक, पढ़ें अनेक’ (के.ई.पी.ए.) पहल। ‘शिक्षा-प्राप्ति के लिए सार्वभौमिक डिजाइन’ (यू.डी.एल.) पर आधारित इन भौतिक-सह-डिजिटल किताबों में छूकर महसूस किए जा सकने वाले डॉट्स, प्रिंट-से-ऑडियो तकनीक और आई.एस.एल. वीडियो से जुड़े क्यू.आर. कोड होते हैं। जब इस्तेमाल में आसान, मजबूत और रिचार्ज-योग्य उपकरण के साथ इनका उपयोग किया जाता है, तो ये किताबें ज्ञान तक पहुंचने का एक बहु संवेदी जरिया बन जाती हैं।
हर आधुनिक भौतिक-सह-डिजिटल टूल को सही दिशा देने के लिए मानवीय मदद की जरूरत होती है। आज, दीक्षा जैसे प्लेटफॉर्म के जरिए इस परंपरा को और मजबूत किया जा रहा है। यह आधुनिक आचार्य के लिए एक डिजिटल साथी की तरह है। दिव्यांगता से जुड़े मुद्दों पर हर महीने होने वाले 5 दिन के मुफ्त उन्मुखीकरण कार्यक्रम के जरिए, शिक्षकों को ऐसी नई और समावेशी रणनीतियां सिखाई जा रही हैं, जिनसे वे अपनी कक्षा को भविष्य के लिए तैयार कर सकें। शिक्षक इस नवाचार की कहानी के वास्तविक हृदयस्थल हैं। वे ही कागज पर बनी नीति को बच्चों के लिए संभावनाओं में बदलते हैं। वे ही ‘विकसित भारत’ के निर्माता हैं। जब भी कोई शिक्षक किसी संघर्ष कर रहे छात्र तक पहुंचने का नया तरीका ढूंढते हैं, तो वह काम न सिर्फ उस छात्र के भविष्य को बेहतर बनाता है, बल्कि देश की बौद्धिक शक्ति और नैतिक चरित्र को भी मजबूत करता है।-डा. सुकांत मजूमदार
