तथाकथित वी.आई.पीज. को आम लोगों की आवाज सुननी चाहिए

punjabkesari.in Thursday, Apr 30, 2026 - 05:53 AM (IST)

पिछले हफ्ते मुंबई में महाराष्ट्र के जल संसाधन मंत्री गिरीश महाजन और पुलिस कर्मियों का सामना करती एक नाराज महिला का वीडियो वायरल हो गया, जिसे लाखों लोगों का समर्थन मिला और उसकी बोलने की हिम्मत की तारीफ हुई। मंत्री के नेतृत्व में भाजपा कार्यकत्र्ता संसद में नारी शक्ति वंदन (संशोधन) विधेयक की हार के विरोध में सार्वजनिक विरोध प्रदर्शन कर रहे थे। स्थानीय पुलिस को पहले से सूचित कर दिया गया था और पर्याप्त पुलिस उपस्थिति के बावजूद, इस जमावड़े के कारण ट्रैफिक जाम लग गया। इसकी वजह से उस महिला का स्वत: स्फूर्त विरोध प्रदर्शन हुआ, जो अपने बच्चे को स्कूल से लेने जा रही थी।

मुंबई की वह महिला (एक अखबार ने उनके वाहन के रजिस्ट्रेशन नंबर से उनकी पहचान श्रीमती ग्रेवाल के रूप में की है) सार्वजनिक सुविधा की पूरी तरह उपेक्षा पर अपना गुस्सा नियंत्रित नहीं कर पाई और विरोध प्रदर्शन का नेतृत्व कर रहे मंत्री तथा यह सुनिश्चित करने के लिए तैनात पुलिस कर्मियों से भिडऩे का फैसला किया कि कोई अप्रिय घटना न हो। भाजपा कार्यकत्र्ताओं का विरोध प्रदर्शन, जो शायद पार्टी के इशारे पर मंचित किया गया था, के विपरीत यह महिला का एक सहज विरोध था। उसने मंत्री से पूछा कि वह विरोध प्रदर्शन किसी सार्वजनिक पार्क या किसी अन्य जगह पर क्यों नहीं कर सकते थे, ताकि आम जनता को असुविधा न हो। मंत्री के पास स्पष्ट रूप से कोई जवाब नहीं था। उसने हस्तक्षेप करने की कोशिश कर रहे पुलिस कर्मियों पर भी गुस्सा निकाला। हालांकि, उनके द्वारा अपशब्दों का प्रयोग उचित नहीं ठहराया जा सकता, लेकिन ये गुस्से की गर्मी में बोले गए थे। उनकी निराशा और गुस्सा उन आम लोगों के साथ प्रतिध्वनित हुआ, जिन्हें तथाकथित वी.आई.पी. मूवमैंट या सरकार के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे लोगों या शादी और धार्मिक जुलूसों के कारण लगभग रोजाना असुविधा का सामना करना पड़ता है। लगभग ऐसे सभी मामलों में, आम आदमी गुस्से से सुलगते हुए भी चुपचाप सहता है।

हम में से हर कोई वी.आई.पी. मूवमैंट के कारण लगने वाले ट्रैफिक जाम में फंसने का शिकार हुआ है। कुछ अजीब कारणों से, सायरन लगी पुलिस गाडिय़ों से एस्कॉर्ट किए जा रहे तथाकथित वी.आई.पी. हमेशा जल्दी में दिखाई देते हैं। यहां तक कि मंत्रियों, न्यायाधीशों, नौकरशाहों और वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों को ले जाने वाले वाहन भी सायरन बजाते हुए रास्ते के अधिकार का दावा करते हैं। शायद ऐसा विशेषाधिकार केवल उनके अहंकार को संतुष्ट करता है। अक्सर बड़े काफिले होते हैं। शीर्ष मंत्रियों और यहां तक कि राज्यपालों के काफिले में एंबुलैंस, फायर टैंडर और यहां तक कि बुलडोजर के अलावा दर्जनों वाहन शामिल होते हैं! अगर एंबुलैंस या फायर टैंडर अन्य यात्रियों को सतर्क करने के लिए सायरन बजा रहे हों या यहां तक कि राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, गृह मंत्री या मुख्यमंत्रियों को सुरक्षा की जरूरत हो, तो समझा जा सकता है, लेकिन जूनियर मंत्रियों और अधिकारियों को भी आम जनता को क्यों असुविधा देनी चाहिए, जो केवल उनके लिए मन ही मन में अपशब्दों का इस्तेमाल करती है। ये ‘विशेषाधिकार प्राप्त’ व्यक्ति यह महसूस नहीं करते कि ट्रैफिक में गंभीर मरीजों वाली एंबुलैंस फंसी हो सकती है, माता-पिता अपने बच्चों को लेने जा रहे हो सकते हैं, लोग ट्रेन या अन्य सार्वजनिक परिवहन पकडऩे जा रहे हो सकते हैं, अन्य लोग किसी आपात स्थिति में शामिल होने या महत्वपूर्ण नियुक्तियों में भाग लेने की जल्दी में हो सकते हैं। ‘राजा से ज्यादा वफादार’ पुलिस सोचती है कि इन वी.आई.पी. के सुरक्षित मार्ग के लिए ट्रैफिक रोकना उनका प्राथमिक कर्तव्य है। अक्सर काफिले के गुजरने से 10 से 15 मिनट पहले ट्रैफिक रोक दिया जाता है।

पुलिस को यह सीखना चाहिए कि अमरीका या यूरोप में पुलिस ऐसी ही स्थिति से कैसे निपटती है। वहां राष्ट्रपति और प्रधानमंत्रियों के लिए भी शायद ही कभी ट्रैफिक रोका जाता है। आम जनता को कम से कम असुविधा पहुंचाने के लिए वाहनों के गुजरने से बमुश्किल एक मिनट या उससे कम समय पहले ट्रैफिक रोका जाता है। लोगों ने बार-बार ट्रैफिक जाम को एक आवश्यक बुराई के रूप में स्वीकार कर लिया है, लेकिन ये व्यवधान आम व्यक्ति के स्वास्थ्य, काम और पर्यावरण पर बुरा असर डालते हैं। हमें विरोध प्रदर्शनों, रैलियों या सार्वजनिक कार्यक्रमों के लिए क्षेत्रों को नामित करने सहित ट्रैफिक जाम को रोकने के तरीके खोजने की जरूरत है। लेकिन इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि राजनेताओं और नौकरशाहों को अपना रवैया और व्यवहार बदलने की जरूरत है। उन्हें आम जनता के प्रति सहानुभूति रखने की जरूरत है, जिन्हें उनके अनावश्यक कार्यों से परेशानी होती है। उन्हें यह महसूस करना चाहिए कि वे पीड़ित जनता से केवल श्राप ही मांग रहे हैं। मुंबई की महिला ने वही व्यक्त किया जो भारत की सड़कों पर लाखों अन्य लोग अक्सर महसूस करते हैं।-विपिन पब्बी
 


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