सिस्टम ऐसा हो, जो यह साबित करे कि कोई भी कानून से ऊपर नहीं

punjabkesari.in Monday, Jun 08, 2026 - 05:31 AM (IST)

दिल्ली में एक युवा छात्र की हत्या ने नागरिकों को गुस्से में, परेशान और दुखी कर दिया है। मैं उस लड़के या उसके परिवार को नहीं जानती, लेकिन मेरी संवेदनाएं उसके परिवार और ऐसे कई अन्य परिवारों के साथ हैं, जिन्होंने अहंकारी, बिगड़े हुए और बेखौफ व्यक्तियों के गुस्से के कारण अपने बच्चों को खो दिया है। अगला शिकार कल कोई भी हो सकता है। एक किशोर जिसे अपने भविष्य की योजना बनानी, अपनी शिक्षा पूरी करनी चाहिए थी और युवावस्था के बेफिक्र दिन जीने चाहिए थे, वह चला गया है। उसके माता-पिता ने एक बेटा खोया है, उसके दोस्तों ने एक साथी और समाज ने वादों से भरा एक युवा जीवन खोया है।

जैसे-जैसे शुरुआती सदमे का असर कम होने लगता है, एक बड़ा सवाल बचा रह जाता है। क्या यह महज कुछ व्यक्तियों की करतूत थी, या हमारे समाज और हमारी संस्थाओं के भीतर की गहरी विफलताओं का प्रतिङ्क्षबब है? सच्चाई असहज करने वाली है। इस तरह के अपराध अकेले में नहीं होते। वे ऐसे माहौल में पनपते हैं, जहां डर को सहन किया जाता है, जहां असामाजिक व्यवहार को नजरअंदाज किया जाता है, जहां कानून प्रवर्तन असंगत होता है और जहां लोग यह मानने लगते हैं कि न्याय से ज्यादा ताकतवर रसूख है। कई मोहल्लों में, निवासी अक्सर जानते हैं कि उपद्रवी कौन हैं। वे जानते हैं कि कौन दूसरों को डराता है, कौन डर पैदा करता है और कौन ऐसा व्यवहार करता है, जैसे कानून उन पर लागू ही नहीं होता। फिर भी लोग चुप रहते हैं क्योंकि उन्हें बदले की कार्रवाई का डर होता है या क्योंकि उनका मानना होता है कि शिकायत करने से कुछ हासिल नहीं होगा।

विश्वास का वह खो जाना शायद किसी भी समाज में सबसे खतरनाक घटनाक्रमों में से एक है। जब आम नागरिक यह सोचने लगते हैं कि गलत काम की रिपोर्ट करना बेकार है, तो कानून का शासन कमजोर होने लगता है। पीछे बची जगह पर बहुत जल्द ही धमकी, डर और कानूनहीनता का कब्जा हो जाता है। यही वह जगह है, जहां भ्रष्टाचार के मुद्दे को नजरअंदाज करना असंभव हो जाता है। नागरिकों को यह विश्वास होना चाहिए कि पुलिस, प्रशासन और न्याय प्रणाली स्वतंत्र और निष्पक्ष रूप से काम करती है। जिस क्षण लोग यह मानने लगते हैं कि सत्ता और रसूख न्याय में हस्तक्षेप कर सकते हैं, संस्थाओं में विश्वास टूटने लगता है। भारत में हर बड़ा अपराध अंतत: यही सवाल उठाता है-क्या इस त्रासदी को रोका जा सकता था अगर सिस्टम ने पहले कार्रवाई की होती? कई नागरिकों को लगता है कि भारत में कानून अक्सर कागजों पर मजबूत होते हैं लेकिन कार्यान्वयन में कमजोर होते हैं। शिकायतों को कभी-कभी नजरअंदाज कर दिया जाता है। चेतावनियों की अनदेखी की जाती है। डराने-धमकाने की छोटी-मोटी हरकतों को तब तक खारिज किया जाता है, जब तक कि वे बड़े अपराध नहीं बन जाते। जब संस्थाएं सही समय पर कार्रवाई करने में विफल रहती हैं, तो निर्दोष लोगों को इसकी कीमत चुकानी पड़ती है।

अधिकांश पुलिस अधिकारी ईमानदारी से और अत्यधिक दबाव में कठिन कत्र्तव्यों का पालन करते हैं। वे इसके लिए पहचान के पात्र हैं। हालांकि, जब सिस्टम के भीतर भ्रष्टाचार मौजूद होता है तो ईमानदार अधिकारी खुद भुगतते हैं। कुछ बुरे तत्व पूरी संस्था में जनता के विश्वास को नष्ट कर सकते हैं। नागरिक एक ऐसा पुलिस बल चाहते हैं जिससे अपराधी डरें और कानून का पालन करने वाले लोग उस पर भरोसा करें। अवैध हथियारों का सवाल भी उतना ही महत्वपूर्ण है। नौजवानों की पहुंच हथियारों तक कैसे हो रही है? उन्हें कौन सप्लाई कर रहा है? इन नैटवर्कों को कौन बचा रहा है? जब तक अधिकारी इन नैटवर्कों को आक्रामक रूप से ध्वस्त नहीं करते, समाज को इसी तरह की त्रासदियों का सामना करना पड़ता रहेगा। सीधे तौर पर जिम्मेदार लोगों को गिरफ्तार करना आवश्यक है, लेकिन भविष्य के अपराधों को रोकने के लिए पूरी शृंखला के पीछे पडऩा जरूरी है। माता-पिता की भी एक भूमिका होती है।

मूल्य, अनुशासन, दूसरों के लिए सम्मान और कानून के प्रति सम्मान घर से ही शुरू होते हैं। इसके साथ ही, बच्चों की परवरिश करने वाले माता-पिता को राज्य से सुरक्षा की उम्मीद करने का पूरा अधिकार है। किसी भी मां या पिता को यह डर नहीं होना चाहिए कि गलत काम के खिलाफ खड़े होने के कारण उनके बच्चे की जान जा सकती है। यह युवा लड़का साऊथ दिल्ली के एक भीड़भाड़ वाले कैफे में छेडख़ानी के मामले में केवल एक लड़की को बचा रहा था। राजनीतिक नेताओं को भी जिम्मेदारी स्वीकार करनी चाहिए। नेतृत्व का असली पैमाना यह नहीं है कि किसी त्रासदी के बाद नेता कितनी जल्दी बयान जारी करते हैं। यह इस बात पर निर्भर करता है कि क्या वे ऐसे सिस्टम का निर्माण करते हैं, जो ऐसी त्रासदियों को होने से रोकते हैं?

ऐसे क्षणों में मीडिया की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाती है। एक स्वतंत्र और जिम्मेदार मीडिया जनता की आंख और कान के रूप में कार्य करता है। मीडिया के पास यह सुनिश्चित करने की शक्ति है कि कठिन प्रश्न पूछे जाते रहें। क्या प्रक्रियाओं का पालन किया गया था? क्या कोई लापरवाही हुई थी? क्या जांच आगे बढ़ रही है? क्या अधिकारी पारदॢशता से काम कर रहे हैं? लोकतंत्र में ये सवाल बेहद जरूरी हैं। इस युवा के माता-पिता न्याय के हकदार हैं लेकिन वे यह जानने के हकदार हैं कि नागरिकों की सुरक्षा के लिए जिम्मेदार हर संस्था ने बिना किसी डर, पक्षपात, भ्रष्टाचार या राजनीतिक दबाव के अपना कत्र्तव्य निभाया है। इस मामले में न्याय केवल जिम्मेदार लोगों को सजा देने के बारे में नहीं है। यह सिस्टम में जनता के विश्वास को बहाल करने के बारे में है।

पुलिस को गहनता से जांच करनी चाहिए। अभियोजन पक्ष को लगातार मामले की पैरवी करनी चाहिए। अदालतों को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि बिना किसी अनावश्यक देरी के न्याय मिले। यदि भ्रष्टाचार, रसूख या लापरवाही को न्याय की राह को कमजोर करने की अनुमति दी जाती है, तो सिस्टम उस युवा लड़के के साथ 2 बार विफल होगा-पहले उसकी रक्षा न करके और फिर उसकी मृत्यु के बाद उसके परिवार को विफल करके। उसके लिए सबसे बड़ी श्रद्धांजलि एक ऐसा सिस्टम होगा जो यह साबित करे कि कोई भी व्यक्ति कानून से ऊपर नहीं है, कोई भी रसूख न्याय से मजबूत नहीं है और भारत में हर युवा जीवन रक्षा के योग्य है। तभी नागरिकों को लगेगा कि इस त्रासदी को भुलाया नहीं गया और इस असहनीय क्षति से कुछ सार्थक सबक सामने आया।-देवी एम. चेरियन
 


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