दूसरे दौर ने खोल दी एस.आई.आर. की पोल
punjabkesari.in Wednesday, Jan 07, 2026 - 05:49 AM (IST)
प्रशासन से शिकायत करो। प्रशासन? वे भ्रष्ट हैं, हम उन्हें पैसा देते हैं, हम प्रशासन हैं। यह मेरे भारत महान की कटु वास्तविकता है। चाहे देश की राजधानी दिल्ली हो, इन्दौर, गांधीनगर, बेंगलूर या गोवा, कहानी एक जैसी है-मानवीय उदासीनता, जिसमें विभिन्न राज्य सरकारों का प्रशासन पूर्णत: असंवेदनशील और उदासीन बना हुआ है। ऐसे शासक जो विशेषज्ञों की राय को नजरअंदाज करते हैं। इन भूलों के कारण मानव जीवन को भारी नुकसान उठाना पड़ता है क्योंकि सरकारी रिकार्ड में आम आदमी केवल एक संख्या है। दिल्ली के लक्ष्मीनगर में एक व्यक्ति की पिटाई की गई, उसकी पत्नी के बाल खीेंचे गए, थप्पड़ मारे गए और छेड़छाड़ की गई। उसके बेटे को नंगा किया गया तथा लोहे की छड़ों से पीटा गया। यह सब कार्य 4 व्यक्तियों ने उनके घर के बाहर किया और पुलिस वाले देखते रहे। उनका अपराध था कि उन्होंने कल एक जिम संचालक को अपना परिसर खाली करने के लिए कहा था।
नोएडा में एक महिला ने अपने लिव इन पार्टनर की हत्या की। भिवानी मेें एक सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर ने स्वीकार किया कि उसने अपने दुपट्टे से अपने पति का गला दबाया। हंपी में दो महिलाओं के साथ बलात्कार किया गया और 3 व्यक्तियों को नहर में फैंक दिया गया। एक 80 वर्षीय व्यक्ति ने एक 5 वर्षीय बालिका के साथ बलात्कार किया। फिर मुद्दा क्या है? क्या ये कभी-कभी होने वाली घटनाएं हैं? नहीं। आप किसी कार पर थोड़ी-सी खरोंच मार दो, आपको गोली मारी जा सकती है। इस सघन जनसंख्या वाले देश में कुछ खून बह भी जाता है तो क्या फर्क पड़ता है। दिल्ली में गैंगवार जारी है। गैंग जेल से कार्य कर रहे हैं। क्या जेल अधिकारी उनसे मिले हुए हैं? कोई कार्रवाई क्यों नहीं की जा रही?
देश के सबसे स्वच्छ शहर इन्दौर में नव वर्ष की शुरुआत अच्छी नहीं रही, जहां प्रदूषित जल पीने के चलते 16 लोगों की मौत हुई और 200 से अधिक भर्ती करने पड़े तथा इसका कारण यह है कि सीवर का पानी पेयजल के साथ मिल गया था। वहां के निवासी 2 माह से गंदे पानी आने की शिकायत कर रहे थे, किंतु उनकी बात किसी ने नहीं सुनी और अंतत: यह त्रासदी हुई। वर्ष 2019 में नियंत्रक महालेखा परीक्षक की रिपोर्ट में कहा गया था कि भोपाल और इन्दौर में जल प्रदूषण है और वर्ष 2013 से 2018 के बीच वहां पर पानी के 4881 नमूने पीने के योग्य नहीं पाए गए और जल जनित बीमारियों के 4.45 लाख मामले सामने आए, किंतु हमेशा की तरह इस रिपोर्ट को रद्दी की टोकरी में डाल दिया गया। गोवा में हाल ही में एक नाइट क्लब में आग की दुर्घटना के बारे में सबको पता होगा और पंजाब में एक सरपंच की जघन्य हत्या से सब परिचित हैं। प्रश्न उठता है कि सरकार केवल तब प्रतिक्रिया क्यों व्यक्त करती है, जब त्रासदी घट चुकी होती है? किसे जिम्मेदार ठहराया जाएगा और किसे दंडित किया जाएगा? किसी को नहीं, क्योंकि राजनेता, नौकरशाह और पुलिस इस त्रिकोण के तीनों कोण हैं। हमारे देश में व्यापारियों को गिरफ्तार किया जाता है किंतु उन नौकरशाहों और प्रशासन के अधिकारियों को क्यों नहीं, जो रिश्वत लेकर अनियमितताओं की अनुमति देते हैं?
हमारे यहां पर सब कुछ कामचलाऊ है। राजनेता आरंभ में सतही तौर पर इन चीजों को लेते हैं और जब बाद मेें संकट पैदा होता है तो दुख व्यक्त करते हैं। संकट प्रबंधन दलों का गठन किया जाता है और जब तक यह प्रकरण सुर्खियों से बाहर नहीं हो जाता, तब तक अधिकारियों का निलंबन किया जाता है और ये समझते हैं कि उन्होंने अपना कत्र्तव्य पूरा कर दिया है। आज प्रशासन और सरकार दीर्घकाल में लोगों की सुरक्षा के बारे में नहीं सोचते। नियमित रखरखाव नहीं होता और अवसरंचना में निवेश नहीं किया जाता। प्रतिक्रियात्मकवादी दृष्टिकोण के चलते जन-धन का अधिक नुकसान होता है क्योंकि ऐसे संकटों के लिए संस्थागत तैयारी नहीं की जाती है। फलत: हमें पूरे भारत में विकृतियां, उदासीनता और धब्बे देखने को मिलते हैं। फलत: लोक स्वास्थ्य संकट पैदा होता है, बीमारियां फैलती हैं, वातावरण को नुकसान पहुंचता है, झुग्गी-झोंपड़ी बस्तियों का विस्तार होता है।
सच्चाई यह है कि हमने राजनीतिक और आॢथक स्वतंत्रता प्राप्त कर ली है किंतु अभी भी हम समाज में भूल करने वाले तत्वों के बंधक बने हुए हैं और यह त्वरित न्याय के विचार की बढ़ती सामाजिक स्वीकार्यता को दर्शाता है। आप यह कह सकते हैं कि इसका कारण हमारी दांडिक न्याय प्रणाली की विफलता और पुलिस की जोर जबरदस्ती का परिणाम है। शायद लोगों द्वारा कानून अपने हाथ में लेने का मुख्य कारण यह है कि न्यायालय त्वरित न्याय नहीं देते, फलत: कानूनों का पालन नहीं होता है और अराजकता फैलती है।
फिर इस स्थिति का समाधान क्या है? ऐसे वातावरण में, जहां पर अपना हिस्सा और अपना हक प्राप्त करने के लिए जोर-जबरदस्ती हमारा स्वभाव बन गया हो, समय आ गया है कि इस बढ़ती विकृति पर अंकुश लगाया जाए और इस बात पर बल दिया जाए कि सुशासन और जवाबदेही सरकार के मुख्य दायित्व हैं। हमारे राजनेताओं को अल्पकालिक नियोजन की बजाय दीर्घकालिक नियोजन पर ध्यान देना होगा। हम लोगों को मिलकर इसका विरोध करना होगा। कुप्रशासन, शासन का अभाव, ढुलमुल रवैया और ‘की फरक पैंदा है’ दृष्टिकोण अस्वीकार्य है। जीवन केवल संख्या नहीं है, अपितु यह हाड़-मांस और धड़कने वाले दिल से बनता है।-पूनम आई. कौशिश
