प्रस्तावित आई.टी. नियमों के गंभीर परिणाम हो सकते हैं
punjabkesari.in Thursday, Apr 09, 2026 - 04:22 AM (IST)
दुनिया में कहीं भी, कोई भी सरकार अपने कामकाज या अपने नेताओं की आलोचना पसंद नहीं करती। सहिष्णुता की सीमा देश-दर-देश अलग होती है, यह इस बात पर निर्भर करता है कि उस विशेष अवधि में कौन सत्ता की बागडोर संभाल रहा है। सूचना प्रौद्योगिकी के माध्यम से सोशल मीडिया के बढ़ते प्रभाव के साथ, केंद्र सरकार भी ऐसी सामग्री को विनियमित करने या हटाने के लिए अपनी शक्तियों को मजबूत करने की कोशिश कर रही थी, जो उसे पसंद नहीं है। इलैक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय द्वारा सूचना प्रौद्योगिकी नियम, 2021 में संशोधन करने का नवीनतम कदम उसी दिशा में है और यदि इसे लागू किया जाता है तो इसके गंभीर परिणाम हो सकते हैं।
प्रस्तावित संशोधनों में डिजिटल समाचार मीडिया प्लेटफॉर्म पर सैंसरशिप शक्तियों का विस्तार किसी भी सोशल मीडिया उपयोगकत्र्ता तक करना शामिल है, जो समसामयिक मामलों या राजनीति पर टिप्पणी करता है। इसका मतलब यह होगा कि कोई भी व्यक्ति, जो समसामयिक मामलों या राजनीति पर अपने विचार व्यक्त करता है, जो सरकार को पसंद नहीं है, उसे उठाया जा सकता है। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर पोस्ट की गई सामग्री को हटाना ही नहीं पड़ेगा, बल्कि संबंधित व्यक्ति पर बहुत भारी जुर्माना भी लगाया जा सकता है। मसौदा नियम, जो 14 अप्रैल से लागू होंगे, जब तक कि अदालतों द्वारा उन पर रोक नहीं लगाई जाती, ऑनलाइन सामग्री पर सरकारी निगरानी का काफी विस्तार करते हैं, विशेष रूप से स्वतंत्र रचनाकारों को लक्षित करते हैं, जिनमें यूट्यूबर्स, इंस्टाग्राम रील्स बनाने वाले, एक्स (पूर्व में ट्विटर) उपयोगकत्र्ता और महत्वपूर्ण फॉलोअर्स वाले अन्य प्रभावशाली लोग शामिल हैं।
इलैक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना तकनीक मंत्रालय की अधिसूचना में कहा गया है कि ‘भारत सरकार इंटरनैट-सक्षम सेवाओं के सभी उपयोगकत्र्ताओं के लिए एक खुला, सुरक्षित, विश्वसनीय और जवाबदेह इंटरनैट सुनिश्चित करने के लिए प्रतिबद्ध है। प्रस्तावित संशोधन भाग II के तहत मंत्रालय द्वारा जारी स्पष्टीकरणों, सलाहों और निर्देशों के अनुपालन को मजबूत करने और आई.टी. नियम, 2021 के भाग III (डिजिटल मीडिया से संबंधित आचार संहिता) के तहत सामग्री विनियमन तंत्र की नियामक निगरानी की प्रभावशीलता को बढ़ाने का प्रयास करते हैं।’ इंटरनैट फ्रीडम फाऊंडेशन (आई.एफ.एफ.) सहित डिजिटल अधिकार कार्यकत्र्ताओं ने मसौदा नियमों को ‘डिजिटल अधिनायकवाद’ करार दिया है। प्रस्तावित संशोधनों को ‘ऑनलाइन भाषण पर कार्यकारी शक्ति का खतरनाक विस्तार’ बताते हुए, आई.एफ.एफ. ने मांग की है कि उन्हें तुरंत वापस लिया जाए।
द एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया ने मसौदा नियमों के पीछे की सामग्री और अंतॢनहित इरादे दोनों पर गहरी चिंता व्यक्त की है। एक बयान में, गिल्ड ने कहा कि ‘‘प्रथम दृष्टया, संशोधित नियम और दिशानिर्देश, जिनका घोषित उद्देश्य ‘अनुपालन को मजबूत करना’ और सामग्री विनियमन तंत्र की नियामक निगरानी की प्रभावशीलता को बढ़ाना है, मंत्रालय को सामग्री विनियमन की व्यापक शक्तियां प्रदान करते हुए प्रतीत होते हैं, डिजिटल मध्यस्थों पर अनुपालन का बोझ तेजी से बढ़ाते हैं और कार्यकारी को ‘गैर-समाचार प्रकाशकों’ और मध्यस्थों द्वारा उत्पन्न सामग्री को ब्लॉक करने या हटाने की व्यापक शक्तियां देते हैं। यह संविधान के तहत सभी नागरिकों को गारंटीकृत मौलिक अधिकार का सीधे तौर पर उल्लंघन करेगा और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और विपरीत विचारों को प्रसारित करने पर एक भयावह प्रभाव डालेगा, जो एक खुले और कार्यात्मक लोकतंत्र के लिए मौलिक है।’’ इसने सरकार से मसौदा नियमों की तत्काल समीक्षा करने या उन्हें वापस लेने और हितधारकों के सभी वर्गों के साथ अधिक रचनात्मक परामर्श में शामिल होने और वैध चिंताओं और आपत्तियों को ध्यान में रखने का आह्वान किया है।
बोस्टन कंसल्टिंग ग्रुप के अनुसार, भारत लगभग 2.5 मिलियन सक्रिय डिजिटल रचनाकारों का घर है। भारत की क्रिएटर इकोनॉमी के 2026 तक 18 प्रतिशत की चक्रवृद्धि वाॢषक वृद्धि दर से बढ़कर 34 बिलियन रुपए तक पहुंचने का अनुमान है। सामग्री रचनाकारों द्वारा प्रसारित समाचारों की व्यापक पहुंच है और रॉयटर्स की एक रिपोर्ट के अनुसार, 34 प्रतिशत भारतीय ऐसे स्रोतों से समाचारों का उपभोग करते हैं। डिजिटल सामग्री बाजार तेजी से बढ़ रहा है और इसे निश्चित रूप से एक मजबूत नियामक ढांचे की आवश्यकता है। हालांकि, सरकार जो करने का प्रस्ताव कर रही है, वह एक ही समय में अभियोजक, न्यायाधीश और जल्लाद बनना है। जाहिर है, नौकरशाहों का एक समूह मनमाने ढंग से यह तय करेगा कि सोशल मीडिया पर किस सामग्री या किस विचार की अनुमति दी जानी चाहिए। आदर्श रूप से, सरकार को एक समिति का गठन करना चाहिए, जिसकी अध्यक्षता अधिमानत: एक वरिष्ठ न्यायिक अधिकारी द्वारा की जानी चाहिए और जिसमें सामग्री की जांच करने और यदि आवश्यक हो तो उसे हटाने का आदेश देने के लिए स्वतंत्र विश्वसनीय पेशेवर शामिल होने चाहिएं। सरकार की किसी भी आलोचना को रोकने के लिए प्रस्तावित नियमों के किसी भी संभावित दुरुपयोग को रोकने के लिए पर्याप्त सावधानी बरती जानी चाहिए।-विपिन पब्बी
