मिथ्या चेतना का दर्शनशास्त्र

punjabkesari.in Friday, Jan 09, 2026 - 05:57 AM (IST)

कुल 1.4 अरब की आबादी वाले गणराज्य को निराशावाद से नहीं सुधारा जा सकता। रोजगार, उत्पादकता, निर्यात और समावेशन सबसे अच्छे समय में भी आसान नहीं होते। प्रगति डिजाइन, क्रियान्वयन, सुधार और परिमापन के नीरस मेल से आती है। नया साल निराशावाद को संशयवाद से अलग करने का भी क्षण है। आलोचनाओं का स्वागत है। मगर ये साक्ष्य तथा एक जटिल और विविधतापूर्ण लोकतंत्र का शासन चलाने की ज्वलंत बाधाओं से आबद्ध होनी चाहिएं। 

पिछले वर्षों में टिप्पणी की एक नई विधा सामने आई है। यह सुधार के कार्य को मजाक में तबदील कर देती है। यह एक चिरपरिचित सांत्वना पेश करती है: भारत कदाचित अपने ही नीति निर्माताओं से अभिशप्त है। इस दृष्टिकोण के अपने नतीजे हैं। यह आंकड़ों और बाजारों में विश्वास को घटाता है। यह उद्यमियों और निवेशकों में नियतिवाद को प्रोत्साहित करता है। साथ ही यह बाहरी ताकतों को वार्ताओं में भारत को दबाव में लाने के लिए तैयार कथानक भी प्रदान करता है। मजबूत पेशेवर और शैक्षिक पृष्ठभूमि का दंभ भरने वाले कुछ टिप्पणीकारों का इस तरह की भंगिमा का सहारा लेना ङ्क्षचता की बात है। लेकिन वे संभवत: ध्यानाकर्षण या अब सरकार का हिस्सा नहीं होने के बावजूद प्रासंगिकता बनाए रखने के लिए देश के खिलाफ अनाप-शनाप बोल कर अपना करियर बनाने की कोशिश में लगे हैं। 

उनका यह आरोप कि भारत के आंकड़े विशिष्ट तौर पर अविश्वसनीय हैं, हमारी विकास की दिशा के साथ मेल नहीं खाते। माल और सेवा कर (जी.एस.टी.) के अंतर्गत टैक्स संग्रह में जो वृद्धि हुई और इसने अनुपालन की जिस संस्कृति को पैदा किया है, वह एक दशक पहले नहीं थी। वर्ष 2024-25 में सकल जी.एस.टी. संग्रह 22 लाख करोड़ रुपए से ज्यादा रहा। यानी औसतन प्रति माह 1.8 लाख करोड़ रुपए। डिजिटल भुगतान ने वित्तीय प्रदर्शन का एक और निशान छोड़ा है। नवम्बर, 2025 में यू.पी.आई. के जरिए 26 लाख करोड़ रुपए से ज्यादा रकम के 20 अरब लेन-देन किए गए। 

नीति आयोग के राष्ट्रीय बहुआयामी निर्धनता सूचकांक के अनुसार 2013-14 और 2022-23 के बीच लगभग 24 करोड़ भारतीय बहुआयामी गरीबी से बाहर आ गए। अब बहुआयामी निर्धनता लगभग 30 प्रतिशत से घट कर तकरीबन 11 प्रतिशत रह गई है। प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण (डी.बी.टी.) से डिलीवरी दुरुस्त हुई है। वर्ष 2025 में 45 लाख करोड़ रुपए से ज्यादा का प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण हुआ। डी.बी.टी. काल में धन के अपव्यय में कमी के जरिए 3.5 लाख करोड़ रुपए से ज्यादा रकम की बचत हुई। वित्तीय अनुशासन में सुधार के प्रभाव अब दिखाई देने लगे हैं। अनुसूचित वाणिज्यिक बैंकों की सकल गैरनिष्पादित परिसंपत्ति (एन.पी.ए.) 2018 में 11.2 प्रतिशत से घट कर 2025 में 2.1 प्रतिशत रह गई है। यह सिर्फ ख्याली पुलाव बनाने से नहीं हुआ। भारत बड़े पैमाने पर निर्माण नहीं कर सकता, यह आरोप लगाने वाले मैन्युफैक्चरिंग परिवेश में हुए बदलावों को नजरअंदाज करते हैं। उत्पादन से जुड़े प्रोत्साहन (पी.एल.आई.) कार्यक्रम के तहत, 14 क्षेत्रों में 2 लाख करोड़ रुपए से ज्यादा का निवेश हुआ है, जिससे 18 लाख करोड़ रुपए से ज्यादा का अतिरिक्त उत्पादन और बिक्री हुई और 12 लाख से ज्यादा लोगों को रोजगार मिला है। 2024-25 में सामान और सेवाओं का कुल निर्यात  825 अरब अमरीकी डॉलर के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया। 

किसी भी देश की प्रतिस्पर्धात्मक शक्ति केवल एक योजना या एक मंत्रालय से नहीं आती, बल्कि यह बुनियादी ढांचे, लॉजिस्टिक्स और प्रशासनिक सुधारों के मिले-जुले प्रभाव का परिणाम होती है। भारत में यह सुधार औद्योगिक गलियारों, मालगाडिय़ों की बेहतर कनैक्टिविटी, बंदरगाहों के बेहतर जुड़ाव और एक साथ काम करने वाले डिजिटल प्लेटफॉम्र्स के रूप में स्पष्ट रूप से दिखाई दे रहे हैं, जिससे समय की बचत होती है। कृषि और ग्रामीण क्षेत्र में कमियां गिनाना और यह मान लेना आसान है कि कुछ भी ठीक नहीं हो सकता। अब नीति का रुख बदल गया है। अब सरकार का ध्यान सीधे तौर पर मदद पहुंचाने और ऐसी संपदा बनाने पर है, जो उत्पादकता और सम्मान दोनों बढ़ाती है। इसका सबसे बड़ा उदाहरण जल जीवन मिशन है, आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार 12.5 करोड़ से ज्यादा ग्रामीण घरों में नल से पानी का कनैक्शन पहुंचाया गया है। 

आयुष्मान भारत ने प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना के तहत 42 करोड़ से ज्यादा कार्ड जारी किए हैं, जिससे परिवारों को गंभीर बीमारियों के भारी खर्च नहीं करने पर आॢथक सुरक्षा प्राप्त हुई है। प्रधानमंत्री आवास योजना के अंतर्गत लगभग 3 करोड़ घर बनकर तैयार हो चुके हैं, जिससे परिवारों को न केवल अपनी संपत्ति मिली है, बल्कि जीवन में आगे बढऩे का एक ठोस आधार भी दिया है। इसी तरह प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना के माध्यम से 10 करोड़ से ज्यादा एल.पी.जी. कनैक्शन दिए गए हैं। सबसे ज्यादा निराशा अक्सर राज्यों की स्थिति को लेकर जताई जाती है, जैसे कि एक अरब से ज्यादा लोगों के देश को एक ही तरीके से चलाया जा सकता हो। लेकिन उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश और राजस्थान जैसे कई राज्यों ने यह दिखा दिया है कि बेहतर कानून व्यवस्था, परियोजनाओं की शीघ्र मंजूरी और अवसंरचना के निर्माण में निरंतर काम से निवेश और बेहतर नौकरियां मिल सकती हैं। 

भारत की प्रगति की कहानी अभी पूरी नहीं हुई, इस पर हमेशा बहस होती रहेगी। सवाल यह है कि नए साल की शुरुआत में हम किस तरह की बहस चुनते हैं। जब बड़े-बड़े पेशेवर लोग केवल अनुमानों या इशारों को ही ‘गहन विश्लेषण’ मान लेते हैं, तो वे उन संस्थाओं को कमजोर करते हैं, जो सुधारों को मुमकिन बनाते हैं। ये नतीजे ही हैं, जो आंकड़ों में भी दिखते हैं और महसूस भी किए जाते हैं। यह किसी भी तरह की निराशा पर भारी पड़ेंगे और लंबे समय तक बने रहेंगे।-हरदीप सिंह पुरी(केंद्रीय पैट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्री)


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