मोदी से राजनीति के गुर सीख रहा विपक्ष

2021-06-13T05:16:29.073

मोदी सरकार डायरैक्ट बैनिफिट ट्रांसफर यानी डी.बी.टी. यानी जनता के बैंक खातों में सीधे पैसा डालने की बात बहुत करती है। इसका सियासी फायदा यही है कि डी.बी.टी. का जनता की तरफ से रिटर्न गिफ्त मिलता है डी.वी.टी. के रूप में यानी डायरैक्ट वोट ट्रांसफर। 

लेकिन अब केजरीवाल से लेकर ममता बनर्जी और भूपेश बघेल से लेकर अशोक गहलोत तक डी.बी.टी. डी.वी.टी. खेलने लगे हैं। यानी विपक्षी दल अब बीजेपी के ही हथियार से बीजेपी पर वार भी कर रहे हैं और अपनी पार्टी का विस्तार भी कर रहे हैं। ठीक ऐसा ही बीजेपी भी करती रही है। इसके सबसे बड़े उदाहरण हैं दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल। 

केजरीवाल राशन लोगों के घर- घर तक पहुंचाना चाहते हैं ताकि आप घर-घर तक सीधे दस्तक दे सके। दिल्ली में एक करोड़ 47 लाख वोटर हैं और केजरीवाल 73 लाख  घरों तक राशन पहुंचाना चाहते हैं। यानी पेट के जरिए आधे वोटरों के वोट तक पहुंचना चाहते हैं। 

बीजेपी इसे समझ रही है लेकिन चाह कर भी उस स्तर का विरोध नहीं कर रही है क्योंकि आखिर में सवाल गरीब जनता के पेट का है। केजरीवाल ने अपनी योजना को प्रधानमंत्री की तर्ज पर मुख्यमंत्री घर-घर राशन योजना से जोड़ा था। बीजेपी ने इस पर एतराज किया तो केजरीवाल ने मु यमंत्री  शब्द हटा दिया। क्योंकि वह समझ गए थे बीजेपी ने हो हल्ला मचाकर घर-घर तक राशन योजना को पहुंचा दिया और सबको अब पता ही चल गया है कि योजना केजरीवाल की है केन्द्र की नहीं । 

छत्तीसगढ़ में मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने 18 से 44 आयु वर्ग को लगने वाले कोरोना टीके के सर्टीफिकेट पर अपनी तस्वीर लगानी शुरू की ताकि जनता को बता सकें कि 44 प्लस को अगर प्रधानमंत्री मोदी मु त में टीका दे रहे हैं तो 18-44 आयु वर्ग को वह यानी भूपेश बघेल मु त में टीका दे रहे हैं। यही काम बंगाल में ममता बनर्जी ने भी किया। राजस्थान में मु यमंत्री अशोक गहलोत ने प्रधानमंत्री मोदी की आयुष्मान योजना के साथ राज्य सरकार की भामाशाह योजना को मिला दिया। नाम दिया चिरंजीव योजना ताकि आयुष्मान योजना का सारा सियासी लाभ अकेले मोदी सरकार न ले उड़े। 

प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना का नाम बदलकर प्रधानमंत्री मुख्यमंत्री फसल बीमा योजना करने की बात बिहार के मु यमंत्री नीतीश कुमार कर चुके हैं। नरेन्द्र  मोदी ने मु यमंत्री रहते हुए राज्यों की यूनियन बनाने की बात कही थी ताकि तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को राज्यों के मसलों पर घेरा जा सके। अब ममता बनर्जी ने राज्यों की यूनियन बनाने की बात कही है ताकि वर्तमान प्रधानमंत्री मोदी को राज्यों के मसलों पर घेरा जा सके। 

पिछले दिनों ममता बनर्जी ने किसान आंदोलन के नेता राकेश टिकैत से मुलाकात की और उसके बाद कहा कि किसानों के आंदोलन के बारे में वह दूसरे राज्यों के मु यमंत्रियों से बात करेंगी। किसानों की मांग का समर्थन करने वाले मु यमंत्रियों को एक सांझा मंच पर लाने की कोशिश होगी और एक तरह से ट्रेड यूनियन की तर्ज पर राज्यों की यूनियन बनाई जाएगी।

यह आइडिया ममता बनर्जी को प्रधानमंत्री मोदी से ही मिला क्योंकि मोदी ने गुजरात के मुख्यमंत्री रहते हुए राज्यों का संघ या यूनियन बनाने की मांग की थी। इससे साफ है कि मोदी सरकार की राजनीति के गुर विपक्ष भी धीरे-धीरे सीख रहा है और उन्हें आजमा भी रहा है। आपको याद होगा कि गुजरात के मु यमंत्री रहते हुए नरेन्द्र मोदी बार-बार केन्द्र की दादागीरी की बात करते थे। 

वह कहते थे योजना आयोग में मु यमंत्रियों को जाना पड़ता है, अफसरशाहों के आगे झोली फैलानी पड़ती है, राज्य की योजनाओं पर योजना आयोग के हिसाब से अमल करना पड़ता है जबकि हर राज्य की परिस्थितियां अलग अलग होती हैं। सूखा, अकाल, तूफान आदि प्राकृतिक आपदा के समय केन्द्र से मिलने वाली राहत पर भी सवाल उठाते रहे थे। तब उन्होंने कहा था कि राज्यों को अपना संघ बनाना चाहिए। ऐसा कहकर मोदी ने  बड़ी वाहवाही लूटी थी। सत्ता में आने के बाद भी वह कुछ सालों तक कार्पोरेटिव फैडरेलिज्म की बात करते रहे थे। बाद में सिरा टूट गया। मोदी भी वही करने लगे जो पूर्व की केन्द्रीय सरकारें करती रही थीं और ऐसा लगता है कि ममता बनर्जी ने टूटे सिरे को पकड़ लिया है। 

खास बात यह रही कि ज्यादातर योजनाएं प्रधानमंत्री के नाम से जोड़ी गईं और हर योजना के पोस्टर पर प्रधानमंत्री की तस्वीर चस्पा की गई। ऐसा देश में पहली बार नहीं हो रहा था। कांग्रेस ने अपने शासन में न जाने कितनी योजनाएं  नेहरू, इंदिरा गांधी या राजीव गांधी के नाम पर चालू की थीं लेकिन बीजेपी ने सही अर्थों में पहली बार बाकायदा लाभार्थियों की सूची तैयार की, लाभार्थियों के सम्मेलन करवाए, लाभाॢथयों से मोदी वीडियो कांफ्रैंसिंग से जुड़े और सोशल मीडिया का भी सहारा लिया गया। 

चुनाव के समय ऐसे लाभाॢथयों को फोन किए गए और याद दिलाया गया कि इन सभी योजनाओं के जरिए उनकी जिंदगी बदलने की कोशिश प्रधानमंत्री कर रहे हैं। उसमें एक अलग रंग की साड़ी उन महिलाओं ने पहन रखी थी जिन्हें गैस कनैक्शन मिला, एक दूसरे अलग रंग की साड़ी उन महिलाओं ने पहन रखी थी जिन्हें प्रधानमंत्री आवास योजना में घर मिला। एक अलग रंग की साड़ी उन महिलाओं ने पहन रखी थी जिनके जन धन योजना में खाते खोले गए। 

इसी तरह एक अन्य योजना है प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना। इस योजना में प्रीमियम की राशि का आधा केन्द्र देती है तो आधा राज्य लेकिन योजना प्रधानमंत्री के नाम पर है। इस योजना से देश के करीब चार करोड़ किसान जुड़े हुए हैं। फसल बीमा के तहत किसान प्रीमियम का एक से डेढ़ फीसदी देते हैं। बाकी की राशि का आधा मोदी सरकार देती है और आधा राज्य। कहा जाता है कि किसी की मदद करो तो दाएं हाथ को पता नहीं चले कि बाएं हाथ ने क्या दिया है। लेकिन सियासत इसे नहीं मानती। सियासत तो दाएं और बाएं यानी दोनों हाथों से वोट बटोरना चाहती है।-विजय विद्रोही


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Content Writer

Pardeep

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