कुछ दिनों के भीतर पता चल जाएगा पूरा खेल

2021-04-06T02:00:04.86

क्या कोई एक्स-फैक्टर है जो चार राज्यों तथा एक केंद्र शासित प्रदेश के विधानसभा चुनावों में अपना खेल खेल सकता है। एक्स-फैक्टर हमेशा ही अप्रत्याशित होते हैं और कभी-कभी सकारात्मक और नकारात्मक भूमिका निभा सकते हैं। कुछ दिनों के भीतर हमें पता चल जाएगा कि असम, पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, केरल और पुड्डुचेरी में विधानसभा चुनावों में इन एक्स-फैक्टर ने किस तरह अपना खेल खेला है। जहां पर लगातार मुख्यमंत्री अपने पांच साल के शासन का बचाव कर रहे हैं। जैसा कि अतीत में रहा है एक्स-फैक्टर उन्हें बाहर का रास्ता दिखा सकते हैं या उन्हें बनाए रख सकते हैं। 

पश्चिम बंगाल जहां पर मुख्यमंत्री और तृणमूल कांग्रेस अध्यक्ष ममता बनर्जी के साथ भाजपा एक भयंकर चुनावी युद्ध लड़ रही है, इससे पहले तृणमूल कांग्रेस वामदलों या कांग्रेस से 2011 से लड़ती आई है। ममता ने उन्हें वहां शून्य कर दिया है। ममता को अब पछतावा हो रहा है क्योंकि उन पार्टियों द्वारा छोड़े गए स्थानों पर भाजपा का कब्जा है। ये मुस्लिम वोट हैं जो ममता के लिए मायने रखते हैं। इस बार भाजपा के प्रभाव का मुकाबला करने के लिए ममता हिन्दू मतदाताओं को भी लुभाने में लगी हैं। उन्हें प्रभावशाली धर्मगुरु अब्बास सिद्दीकी की नई पार्टी इंडियन सैकुलर फ्रंट के बारे में भी चिंतित होना चाहिए। कांग्रेस-माकपा गठबंधन ममता की संभावनाओं को नुक्सान पहुंचा सकता है। इससे भाजपा को फायदा हो सकता है। 

मुस्लिम मतदाता महत्वपूर्ण हैं। नया गठबंधन ममता की उम्मीदों पर पानी फेर सकता है क्योंकि भाजपा उनके वोटों की उम्मीद नहीं कर रही है तो यह नुक्सान तृणमूल कांग्रेस को ही होगा। हालांकि ऐसी भविष्यवाणियां हैं कि ममता बनर्जी जीतेंगी लेकिन संकीर्ण बहुमत के साथ। असम में एक्स-फैक्टर ए.आई.यू.डी.एफ. हो सकता है। पूर्वोत्तर में असम भाजपा के उदय की महत्वपूर्ण कुंजी है।

सी-वोटर, टाइम्स नाऊ के सर्वेक्षण के आंकड़े असम विधानसभा चुनावों में कड़ी टक्कर का संकेत देते हैं। सर्वेक्षण के आंकड़ों के अनुसार एन.डी.ए. के 42.9 प्रतिशत वोट शेयर की सम्भावना है। यू.पी.ए. 40.7 प्रतिशत मतों को हासिल कर सकता है। ए.आई.यू.डी.एफ. हिन्दू-मुस्लिम लाइन पर मतदाताओं का धुव्रीकरण कर सकता है। विशेषकर ऊपरी असम में भाजपा को फायदा होगा। 

कांग्रेस-ए.आई.यू.डी.एफ. को निचले असम में बढ़त मिल सकती है। इसके अलावा कांग्रेस के नेतृत्व वाले गठबंधन के पास राज्य में कोई बड़ा नेता नहीं है। जबकि भाजपा के पास मुख्यमंत्री सर्बानंद सोनोवाल और पूर्व कांग्रेसी नेता हेमंत विस्ब शर्मा हैं जो भगवा पार्टी के पूर्वोत्तर रणनीतिकार रहे हैं। इसलिए फिर से ये मुस्लिम वोट हैं जो असम में मायने रखते हैं। तमिलनाडु एक क्लासिक मामला है जहां द्रमुक और अन्नाद्रमुक गठबंधन ने सत्ता पर बारी-बारी शासन किया। मगर ऐसा तब हुआ जब दो प्रतिष्ठित नेता जे. जयललिता (अन्नाद्रमुक) और करुणानिधि (द्रमुक) अपनी पार्टियों का नेतृत्व कर रहे थे। 

ये पहले चुनाव होंगे जब गैर-करिश्माई नेता चुनावी स्टेज पर नजर आएंगे। हालांकि वर्तमान मुख्यमंत्री ई. पलानीस्वामी ने बुरा प्रदर्शन नहीं किया है। द्रमुक का नेतृत्व स्टालिन कर रहे हैं जिन्होंने अपने पिता एम. करुणानिधि से राजनीतिक शिक्षा ग्रहण की है। इस बार द्रमुक गठबंधन की बारी है। अन्नाद्रमुक सत्ता विरोधी कई नुक्सानों से ग्रस्त है। भाजपा के साथ उसका गठबंधन द्रविड़ मतदाताओं के भरोसे चलता है। पार्टी के भीतर भी सत्ता संघर्ष चल रहा है।

जयललिता की निकट सहयोगी शशिकला की वापसी कुछ भूमिका अदा कर सकती है हालांकि उन्होंने घोषणा कर रखी है कि अब वह राजनीति से बाहर हैं। अन्य राज्यों में आक्रामक रहने वाली भाजपा एक मामूली खिलाड़ी रह सकती है। दो एक्स-फैक्टर रजनीकांत और शशिकला चुनावी दृश्य से बाहर हो गए हैं। छोटे दलों में फिल्म अभिनेता कमल हासन जैसे खिलाड़ी हैं। इसलिए उस समय तक एक्स-फैक्टर कोई भूमिका अदा नहीं सकता जब तक अन्नाद्रमुक के नेतृत्व वाला गठबंधन अन्य कई क्षेत्रों से अप्रत्याशित समर्थन हासिल नहीं कर लेता।

केरल ने भी वामपंथी नेतृत्व वाले एल.डी.एफ. और कांग्रेस के नेतृत्व वाले यू.डी.एफ. के बीच बारी-बारी से सत्ता में रहने की प्रवृत्ति का अनुसरण किया है। अब यू.डी.एफ. की बारी है। लेकिन वर्तमान मुख्यमंत्री पिनराई विजयन ने भी गठबंधन में केरल कांग्रेस (मणि) को लुभाकर अपनी स्थिति मजबूत की है। यह यू.डी.एफ. को नुक्सान दे सकता है। इसके अलावा विजयन ने अपनी स्थिति सुदृढ़ की है। अगर केरल कांग्रेस (मणि) ईसाइयों के बीच काम करती है तो यह एक बड़ा कारक हो सकता है। शीर्ष पद के लिए कांग्रेस के उम्मीदवारों में कड़ी प्रतिस्पर्धा है।-कल्याणी शंकर
 


Content Writer

Pardeep

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