ईंधन की कीमतों के मामले में विपक्ष का दोहरा चरित्र

punjabkesari.in Friday, May 20, 2022 - 05:07 AM (IST)

2020 की शुरूआत से, दुनिया भर की सरकारें कोविड-19 महामारी की चपेट में हैं और एक ऐसी उभरती हुई विश्व व्यवस्था के साथ तालमेल बनाने के लिए संघर्ष कर रही हैं, जिसका निर्माण उनके द्वारा नहीं किया गया। भारत सबसे अधिक सहनशील देशों में से एक के रूप में उभरा है। यह एक वास्तविकता है, जो आई.एम.एफ. के नवीनतम विकास अनुमानों में परिलक्षित होती है, जिसके अनुसार भारतीय अर्थव्यवस्था वर्ष 2022 के दौरान 3.6 प्रतिशत की वैश्विक दर की तुलना में 2022-23 में 8.2 प्रतिशत की विकास दर के साथ दुनिया में सबसे तेजी से बढ़ती प्रमुख अर्थव्यवस्था होगी। 

महामारी के दौरान कच्चे तेल की कीमतें कम हुई थीं। यूक्रेन में सैन्य कार्रवाइयों की अस्थिरता के कारण तेल की कीमत में 500 प्रतिशत तक की वृद्धि होने के बावजूद राज्य सरकारों को प्रदान की जाने वाली वित्तीय सहायता का उच्च स्तर जारी रहा। इन कारकों से भारत पर बोझ काफी बढ़ गया, क्योंकि देश अपनी पैट्रोलियम आवश्यकताओं का लगभग 85 प्रतिशत आयात करता है। 

विदेशी निर्भरता को दूर करने के लिए भारत अपनी अक्षय ऊर्जा क्षमताओं में तेजी से वृद्धि कर रहा है। 6 करोड़ से अधिक देशवासी प्रतिदिन खुदरा दुकानों पर पैट्रोलियम उत्पाद खरीदते हैं। देश की आर्थिक वृद्धि की गति बढ़ रही है। इसके साथ ही खपत में भी वृद्धि हो रही है। परिणामस्वरूप, मध्यावधि के सन्दर्भ में ऊर्जा की प्रति व्यक्ति मांग और भी अधिक होगी और यह तब तक जारी रहेगी जब तक भारत एक हरित अर्थव्यवस्था में परिवर्तित नहीं हो जाता। 

मोदी सरकार ने यह सुनिश्चित किया है कि उसके कार्यकाल के दौरान पैट्रोल की कीमतों में वृद्धि न्यूनतम हो। अप्रैल 2021 और अप्रैल 2022 के बीच भारत में पैट्रोल की कीमतों में 16 प्रतिशत की वृद्धि हुई, जो अमरीका (50.6 प्रतिशत), कनाडा (50.7 प्रतिशत), जर्मनी (50 प्रतिशत), यू.के. (58.9 प्रतिशत) और फ्रांस (33 प्रतिशत) की तुलना में सबसे कम थी। डीजल की मूल्यवृद्धि में भी समान अंतर देखा जा सकता है भारत में सभी प्रमुख देशों की तुलना में सबसे कम वृद्धि हुई है। 

घरेलू मूल्यवृद्धि के ऐतिहासिक विश्लेषण से पता चलता है कि 2014-2022 के दौरान पैट्रोल की कीमत में 36 प्रतिशत की वृद्धि (77 रुपए प्रति लीटर से 105 रुपए प्रति लीटर) पिछले 42 वर्षों के दौरान तुलनात्मक अवधियों में सबसे कम है। पैट्रोल की कीमत में 2007-14 के दौरान 60 प्रतिशत (48 रुपए से 77 रुपए), 2000-2007 के दौरान 70 प्रतिशत (28 रुपए से 48 रुपए), 1993-2000 के दौरान 55 प्रतिशत (18 रुपए से 28 रुपए), 1986-1993 के दौरान 125 प्रतिशत (8 रुपए से 18 रुपए), 1979-1986 के दौरान 122 प्रतिशत (3.6 रुपए से 8 रुपए) और 1973-79 के दौरान 140 प्रतिशत (1.25 रुपए से 3 रुपए) की वृद्धि दर्ज की गई थी। 

यह भी याद रखना महत्वपूर्ण है कि पैट्रोल की कीमतों को 2010 में और डीजल की कीमतों को 2014 में नियंत्रण मुक्त कर दिया गया था। इसका अर्थ है, कीमतें बाजार द्वारा निर्धारित की जाती हैं। महामारी के कारण राजस्व घाटे के बावजूद मोदी सरकार ने नवंबर 2021 में पैट्रोल पर उत्पाद शुल्क में 5 रुपए प्रति लीटर और डीजल पर 10 रुपए प्रति लीटर की कमी की। 

अधिकांश राज्य सरकारों ने मूल्य वर्धित कर (वैट) में कटौती कर कीमत में कमी की, जबकि महाराष्ट्र, तमिलनाडु और झारखंड जैसे कांग्रेस-सहयोगी राज्यों ने अत्यधिक उत्पाद शुल्क को जारी रखा। यह जानना दिलचस्प है कि विपक्ष, जो मूल्यवृद्धि का विरोध कर रहा है, पूरे भारत में ईंधन पर वैट की उच्चतम दरों को जारी रखने का विकल्प अपनाए हुए है। नीचे दिए गए आंकड़े इस असमानता को रेखांकित और स्पष्ट करते हैं : 

महाराष्ट्र : 26 प्रतिशत + 10.12 रुपए प्रति लीटर
राजस्थान : 31 प्रतिशत + 1.5 रुपए प्रति लीटर
केरल : 30 प्रतिशत + 1 रुपए प्रति लीटर
आंध्र प्रदेश : 31 प्रतिशत + 5 रुपए प्रति लीटर
तेलंगाना : 35 प्रतिशत
पश्चिम बंगाल : 25 प्रतिशत + 13 रुपए प्रति लीटर 

एविएशन टर्बाइन फ्यूल (ए.टी.एफ.) जैसे अन्य महत्वपूर्ण पैट्रोलियम उत्पाद पर महाराष्ट्र और दिल्ली द्वारा 25 प्रतिशत तक वैट लगाना जारी है, जबकि भाजपा शासित गुजरात के अहमदाबाद में वैट सिर्फ 5 प्रतिशत है। इसके परिणामस्वरूप हवाई यात्रियों पर असुविधाजनक बोझ पड़ता है। बढ़ी कीमतों का लगभग पूरा बोझ यात्रियों पर डाल दिया जाता है, क्योंकि ए.टी.एफ. लागत एयरलाइन परिचालन लागत के लगभग 40 प्रतिशत तक होती है। 

विपक्ष को यह याद रखना चाहिए कि यू.पी.ए. सरकार के शासनकाल में 2005-12 के बीच 1.44 लाख करोड़ रुपए मूल्य के दीर्घकालिक तेल बॉन्ड जारी किए गए थे। भारत सरकार पर अब यू.पी.ए. युग के इन तेल बॉन्डों का 3.2 लाख करोड़ रुपए का बोझ है। यू.पी.ए. शासन के दौरान लाइसैंस रकबे को रोक दिया गया था, जिससे तेल ई. एंड पी. का परिचालन बंद हो गया था। वर्षों की अपनी बड़ी विफलताओं, जिन्होंने भारत की ऊर्जा सुरक्षा को नुक्सान पहुंचाया है, के बाद मूल्यवृद्धि के बारे में विपक्ष द्वारा शोर-शराबा सर्वथा अनुचित है। 

राष्ट्र-निर्माण के सामूहिक मिशन में पारस्परिकता की अपेक्षा की जाती है। भारत सरकार ने प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष दोनों तरह के उपायों के साथ राज्य सरकारों का समर्थन किया है, जिसमें वित्त आयोग के अनुदान के तहत कर राजस्व का 42 प्रतिशत हिस्सा शक्ति हस्तांतरण के बाद राजस्व घाटा के लिए अधिक अनुदान और जी.एस.टी. संग्रह का बड़ा हिस्सा शामिल है। बजट के तहत राज्य सरकारों को ब्याज मुक्त ऋण के रूप में 1 लाख करोड़ रुपए से अधिक की धनराशि निर्धारित की गई है। इसके अलावा, अर्थोपाय अग्रिम राशि (डब्ल्यू.एम.ए.) और विशेष आहरण सुविधा (एस.डी.एफ.) के तहत राज्य सरकारें न्यूनतम दरों पर ऋण प्राप्त कर सकती हैं। इस मुद्दे से संबंधित एक तथ्य यह है कि पिछले 8 वर्षों में ईंधन पर टैक्स के रूप में राज्य सरकारों ने लगभग 15.16 लाख करोड़ रुपए एकत्र किए हैं। विपक्ष का यह रवैया दोहरे मापदंड और गुमराह करने वाला है। 

सरकार तेल और गैस क्षेत्र की चुनौतियों के प्रति सचेत है और घरेलू क्षमताओं के निर्माण के लिए सोच-समझकर निर्णय ले रही है। हमने इस विषय पर एक समग्र दृष्टिकोण अपनाया है, देशवासियों के सामने विजन की स्पष्टता तथा कार्य में पारदर्शिता रखी गई है एवं सभी के कल्याण का लक्ष्य निर्धारित किया गया है। देश के नागरिकों द्वारा चुनावी जनादेश लगातार हमारे पक्ष में दिया जा रहा है, जो हमारे कार्यों में उनके विश्वास को परिलक्षित करता है।-हरदीप सिंह पुरी (केंद्रीय पैट्रोलियम, प्राकृतिक गैस और आवास मंत्री)


सबसे ज्यादा पढ़े गए

Related News

Recommended News