देश यूं ही नहीं हुआ नक्सलवाद से मुक्त

punjabkesari.in Wednesday, Apr 01, 2026 - 05:04 AM (IST)

गृह मंत्री अमित शाह ने लोकसभा में घोषणा की कि लाल आतंक की परछाई हट गई है। यह ऐसी घोषणा है जिसकी कल्पना किसी ने नहीं की होगी। जब गृह मंत्री ने पिछले वर्ष घोषित किया था कि 31 मार्च, 2026 तक देश नक्सली आतंक से मुक्त हो जाएगा तो एक्टिविस्टों, पत्रकारों, नेताओं, एन.जी.ओ. चलाने वालों, बुद्धिजीवियों आदि की बड़ी फौज ने अलग-अलग तरीकों से उनका निशाना बनाना, उपहास उड़ाना और प्रच्छन्न तरीके से विरोध आरंभ कर दिया था। 

गृह मंत्री ने घोषणा की कि 2024 तक नक्सलियों की शीर्ष केंद्रीय कमेटी और पुलिस ब्यूरो में 21 मुख्य कैडर थे जो पूरे नैटवर्क को चलाते थे। इनमें से एक पकड़ा गया, 7 ने आत्मसमर्पण किया और 12 मारे गए तथा एक फरार है। उसके साथ भी आत्मसमर्पण के लिए बातचीत चल रही है। वस्तुत: वह मिसिर बेसरा है जो झारखंड के सारंडा जंगलों में अपने 50 साथियों के साथ छिपा है। वह आत्मसमर्पण करता है या मारा जाता है, तो हथियारों के बल पर संघर्ष करने वालों की सूची समाप्त हो जाएगी।  जरा सोचिए, 2014 में जो नक्सल प्रभावित जिले 126 थे, वे अब घटकर मात्र 2 रह गए हैं। वे भी केवल नाम मात्र के। रैड कॉरिडोर या लाल गलियारा के नाम से पहचाने जाने वाले पूरे क्षेत्र में 12 राज्य और 70 प्रतिशत भूभाग शामिल था। आप यू.पी.ए. शासनकाल को याद करिए, जब भी आंतरिक सुरक्षा का सम्मेलन होता था, राज्यों के पुलिस प्रमुखों, गृह सचिवों की उपस्थिति में प्रधानमंत्री डा. मनमोहन सिंह के भाषण में यह पंक्ति रहती ही थी कि आंतरिक सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा खतरा माओवाद है। 

पिछले लगभग 12 वर्ष की नक्सलवाद या माओवाद विरुद्ध मोदी सरकार की नीति का मूल्यांकन करेंगे तो एक निष्कर्ष यह आएगा कि राजनीतिक नेतृत्व के अंदर समस्याओं को लेकर संवेदनशीलता व सही समझ हो, उसके अंत करने के उपाय के प्रति दृष्टि साफ और संकल्पबद्धता हो तो परिणाम ऐसा आ सकता है। इस सुखद स्थिति के पीछे कई स्तरीय रणनीति थी। सख्त सुरक्षा कार्रवाई, माओवादियों से संपर्क कर उन्हें आत्मसमर्पण और सामान्य जीवन में आने के लिए प्रेरित करने का सतत अभियान, उनका आॢथक ढांचा तोडऩा, क्षेत्र की विकास गतिविधियों के साथ स्थानीय लोगों से संपर्क एवं उनके अंदर सुरक्षा मिलने का आश्वासन पैदा करना। 

सुरक्षा एजैंसियों ने आतंकवाद बन चुके बड़े नक्सली नामों को संघर्ष में समाप्त किया। सुरक्षा कार्रवाइयों के दबाव में हजारों का आत्मसमर्पण हुआ। आर्थिक कमर तोडऩे के लिए राष्ट्रीय जांच एजैंसी (एन.आई.ए.) और प्रवर्तन निदेशालय को दायित्व दिया गया, जिससे नक्सलियों से अवैध करोड़ों रुपए जब्त किए गए। धन शोधन निवारण अधिनियम (पी.एम.एल.ए.) के तहत मामले दर्ज हुए और नक्सलियों को धन देने वालों को गिरफ्तार किया गया। इसके समानांतर नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में विकास के लिए बजट आबंटन में 300 प्रतिशत की वृद्धि की गई। प्रभावित क्षेत्रों में मोबाइल नैटवर्क लगे, सड़कें बनीं, राशन की दुकानें खुलीं, स्कूल चलाने की कोशिश हुई, स्वास्थ्य सेवाएं पहुंचाई गईं, बैंक, ए.टी.एम. और डाकघर खोले गए। रोजगार प्रशिक्षण के लिए आई.टी.आई. और कौशल केंद्र बनाए गए। सुरक्षा बलों के साए में सांस्कृतिक-धार्मिक-सामाजिक गतिविधियों में लोगों को शामिल करने की कोशिश हुई और उनके अंदर का भय मिटता गया तथा उनका भी सहयोग मिलने लगा। आत्मसमर्पण नीति लागू की गई, जिसमें आत्मसमर्पण करने वालों को आर्थिक मदद और पुनर्वास दिया गया। सरकार ने हर गांव तक पहुंच बनाई।

क्रूरता, निर्दयता और दमन करने के आरोप लगाने वालों के सामने गृह मंत्री ने लोकसभा में आंकड़ा देते हुए कहा कि सन् 2024 से अब तक 706 नक्सली मारे गए जबकि उनकी तुलना में 2218 गिरफ्तार किए गए तथा 4849 ने आत्मसमर्पण किया। बात सीधी है और जैसा गृह मंत्री ने कहा कि मैं 50 बार कह चुका हूं कि हथियार डाल दो सरकार पुनर्वास की व्यवस्था करेगी। हथियार नहीं डाले तो जो गोली चलाएगा उसका जवाब गोली से मिलेगा यही सरकार की नीति है। ईमानदारी से विश्लेषण करेंगे तो निष्कर्ष यही आएगा कि गरीबी के कारण नक्सलवाद या माओवाद नहीं बढ़ा बल्कि लोगों को भड़का कर बरगला कर हथियार थमाए गए। उन्होंने अस्पताल, स्कूल जला दिए, सड़कें तोड़ दीं, खदान बंद कराए, जंगलों में मछली पालन से लेकर अन्य काम बंद हो गए, लोगों का बाहर जाना बंद कर दिया तो उनके सामने गरीबी और तंगहाली में आंसू बहाकर जीने के अलावा कोई चारा नहीं बचा। करीब 30 हजार लोगों की जान चली गई, जिनमें 5000 सुरक्षा कर्मी भी शामिल थे। 

1967 में बंगाल के नक्सलबाड़ी से आरंभ आंदोलन आखिर इतना भयानक कैसे हो गया कि सरकार की पहुंच उन क्षेत्रों में समाप्त हो गई? सरकार की नीतियां सही होतीं तो तिरुपति से पशुपतिनाथ तक इतना बड़ा रैड कॉरिडोर कैसे बन सकता था? अगर सत्ता का समर्थन था ही नहीं तो 5 जुलाई, 2011 को नंदिनी सुंदर और अन्य लोगों द्वारा दायर एक याचिका के बाद उच्चतम न्यायालय के न्यायमूर्ति सुदर्शन रेड्डी की अध्यक्षता वाली पीठ ने सलवा जुडूम के बारे में फैसला देते हुए कहा कि माओवादियों के विरुद्ध लड़ाई गैर कानूनी थी। परिणाम यह निकला कि माओवादियों ने सलवा जुडूम से जुड़े लोगों की हत्या कर दी और कांग्रेस ने सुदर्शन रेड्डी को उपराष्ट्रपति का उम्मीदवार बनाया। इसका मतलब क्या हुआ? यह बात तो सत्य है कि राहुल गांधी ने 2018 में हैदराबाद में माओवादी घुमांडी वि_ल राव से मुलाकात की। 2025 में कोऑॢडनेशन कमेटी ऑफ पीस के साथ मुलाकात की। हिडमा जब मारा गया, तब इंडिया गेट पर ‘कितने हिडमा मारोगे, हर घर से हिडमा निकलेगा’ के नारे लगे जिसका वीडियो राहुल गांधी ने पोस्ट किया। बहरहाल, गृह मंत्री की इस घोषणा को आश्वासन माना जाना चाहिए कि सरकार मुद्दों के प्रति संवेदनशील है, वह सभी शिकायतें सुनने के लिए तैयार और हल करने के लिए प्रतिबद्ध है। किंतु देश में माओवादी ङ्क्षहसा करने वालों के दिन अब खत्म हो गए हैं, हथियार उठाने वालों को हिसाब देना होगा।- अवधेश कुमार


सबसे ज्यादा पढ़े गए

Related News