तेजा सिंह समुंदरी : गुरुद्वारा सुधार आंदोलन के नैतिक पथ-प्रदर्शक
punjabkesari.in Friday, Jul 17, 2026 - 04:11 AM (IST)
सिख इतिहास में सरदार तेजा सिंह समुंदरी का स्थान उन महान नेताओं में है, जिन्होंने अपने लिए नहीं, बल्कि पंथ, संस्थाओं और सिद्धांतों के लिए अपना जीवन समॢपत किया। 17 जुलाई, 2026 को उनकी शहादत के 100 वर्ष पूर्ण हो रहे हैं। यह केवल एक ऐतिहासिक वर्षगांठ नहीं, बल्कि आत्ममंथन का भी अवसर है कि क्या हमने उनके जीवन से प्राप्त शिक्षाओं को अपने आचरण में उतारा है? ‘तेजा सिंह समुंदरी हॉल’ केवल एक भवन नहीं, बल्कि उस महान व्यक्तित्व की विरासत का प्रतीक है, जिसने सिद्ध किया कि संस्थाएं व्यक्तियों से कहीं बड़ी होती हैं। यदि बाबा खड़क सिंह गुरुद्वारा सुधार आंदोलन की बुलंद आवाज थे, तो तेजा सिंह समुंदरी उस आंदोलन के नैतिक स्तंभ और अनुशासित रणनीतिकार थे। 20 फरवरी, 1882 को बुरज राय का (तरनतारन) में जन्मे समुंदरी जी ने ब्रिटिश सेना से प्राप्त अनुशासन और संगठन-कौशल को पंथ की सेवा के लिए समॢपत कर दिया। उनका विश्वास था कि कोई भी आंदोलन तभी सफल हो सकता है, जब वह नैतिकता, अनुशासन और गुरमत के सिद्धांतों पर आधारित हो।
गुरुद्वारा सुधार आंदोलन के प्रत्येक महत्वपूर्ण चरण-रकाबगंज, चाबियों का मोर्चा, गुरु का बाग, जैतो तथा नाभा आंदोलन-में उनकी दूरदृष्टि स्पष्ट दिखाई देती है। रकाबगंज के प्रश्न को उन्होंने सिख स्वाभिमान और धार्मिक अधिकारों का विषय बनाया, जबकि 1921 के चाबियों के मोर्चे में उनके शांतिपूर्ण और अनुशासित नेतृत्व ने सरकार को चाबियां लौटाने के लिए विवश कर दिया। महात्मा गांधी ने इसे भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन की पहली महत्वपूर्ण नैतिक विजय कहा था। गुरु का बाग मोर्चे के दौरान भी उन्होंने हजारों अकालियों को ब्रिटिश शासन के अमानवीय अत्याचारों के बावजूद अङ्क्षहसक और अनुशासित बनाए रखा। जैतो और नाभा आंदोलनों में उन्होंने स्पष्ट किया कि सिद्धांतों से समझौता करके प्राप्त विजय वास्तविक विजय नहीं होती। 17 जुलाई, 1926 को लाहौर जेल में उनका निधन हुआ, जिसे सिख समुदाय ने शहादत के रूप में स्वीकार किया, क्योंकि उन्होंने सरकार द्वारा अकाली नेताओं को अपमानित करने के उद्देश्य से उनकी रिहाई से पहले गुरुद्वारा अधिनियम को लिखित रूप में स्वीकार करने की शर्त मानने से इंकार कर दिया और जेल में रहना स्वीकार किया।
उन्होंने शिक्षा को सामाजिक परिवर्तन का सबसे प्रभावशाली माध्यम माना। खालसा विद्यालयों के विकास, ज्ञान के प्रसार तथा महिला शिक्षा के प्रति उनकी प्रतिबद्धता इस बात का प्रमाण है कि वे शिक्षा को समाज और समुदाय की दीर्घकालिक शक्ति मानते थे। उनकी नि:स्वार्थ सेवा का सर्वोच्च उदाहरण तब सामने आया जब गुरुद्वारा सुधार आंदोलन की कानूनी लड़ाई के लिए उन्होंने अपनी भूमि गिरवी रखकर आॢथक सहायता प्रदान की और बाद में वह धन वापस लेने से भी इंकार कर दिया। 1923 में श्री हरिमंदिर साहिब की कार सेवा के लिए उन्हें पांच प्यारों में सम्मिलित किया जाना उनके चरित्र पर पंथ के विश्वास की सर्वोच्च अभिव्यक्ति थी।
गुरुद्वारा सुधार आंदोलन केवल धार्मिक प्रबंधन के सुधार का अभियान नहीं था। यह जनभागीदारी, सिद्धांतनिष्ठ नेतृत्व, संस्था-निर्माण और पंथक अधिकारों के लिए संघर्ष का आंदोलन था। इस आंदोलन में तेजा सिंह समुंदरी की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि उन्होंने कभी स्वयं को केंद्र में नहीं रखा। उनके लिए व्यक्ति नहीं, संस्था महत्वपूर्ण थी। पद नहीं, सिद्धांत सर्वोपरि थे और व्यक्तिगत प्रसिद्धि नहीं, बल्कि पंथ तथा समाज का हित सर्वोच्च था। इसी कारण उन्होंने शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक समिति को सशक्त बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। आज पंजाब की सबसे बड़ी आवश्यकता भी यही है। हमारी अनेक सार्वजनिक संस्थाएं व्यक्ति-केंद्रित होती जा रही हैं। जब संस्थाओं की पहचान किसी एक व्यक्ति से जुड़ जाती है, तब उनकी स्वतंत्रता और विश्वसनीयता कमजोर होने लगती है।
आज नेतृत्व की सफलता को प्राय: सत्ता, प्रचार और प्रभाव के आधार पर आंका जाता है। किंतु इतिहास बताता है कि स्थायी और आदर्श नेतृत्व की नींव चरित्र, सत्यनिष्ठा और जनविश्वास पर आधारित होती है। तेजा सिंह समुंदरी लोगों के हृदयों में इसलिए बसे क्योंकि उन्होंने वही जीवन जिया जिसकी वे शिक्षा देते थे। शिक्षा के प्रति उनकी दूरदॢशता आज भी अत्यंत प्रासंगिक है। उन्होंने समझ लिया था कि धार्मिक जागरूकता के साथ-साथ ज्ञान और शिक्षा के बिना कोई भी समाज लंबे समय तक प्रगति नहीं कर सकता। इसलिए उन्होंने खालसा विद्यालयों के विकास, महिला शिक्षा तथा ज्ञान के प्रसार को पंथक सेवा का अभिन्न अंग माना। आज जब पंजाब शिक्षा, कौशल विकास और युवाओं के भविष्य जैसी चुनौतियों से जूझ रहा है, तब उनका यह संदेश और भी महत्वपूर्ण हो जाता है।उनके जीवन का एक अन्य महत्वपूर्ण पक्ष सामाजिक न्याय है। दलितों और वंचित वर्गों के प्रति उनकी प्रतिबद्धता केवल सामाजिक सुधार तक सीमित नहीं थी, बल्कि यह गुरमत के ‘सरबत दा भला’ के सिद्धांत का व्यावहारिक रूप थी। वे जानते थे कि किसी भी समाज की प्रगति का वास्तविक मापदंड उसके सबसे कमजोर वर्ग की स्थिति होती है।
तेजा सिंह समुंदरी के जीवन का सबसे स्थायी संदेश सिद्धांतों के प्रति अडिग रहना है। उन्होंने कभी व्यक्तिगत लाभ के लिए अपने आदर्शों से समझौता नहीं किया। यही कारण है कि उनकी मृत्यु आज भी शहादत के रूप में स्मरण की जाती है। मास्टर तारा सिंह ने समुंदरी जी के चरित्र और अनुशासन को गुरुद्वारा सुधार आंदोलन की सबसे बड़ी शक्ति कहा। प्रो. गंडा सिंह, डा. हरबंस सिंह और खुशवंत सिंह जैसे इतिहासकारों ने भी उन्हें गुरुद्वारा सुधार आंदोलन तथा पंथक संस्थाओं के प्रमुख निर्माताओं में स्थान दिया है। शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक समिति के अभिलेख तथा समकालीन दस्तावेज भी इस तथ्य की पुष्टि करते हैं कि वह केवल संघर्ष के नेता ही नहीं, बल्कि संस्था-निर्माण के दूरदर्शी शिल्पकार भी थे। उनकी 100वीं शहादत वर्षगांठ पर सच्ची श्रद्धांजलि स्मारक बनाने या समारोह आयोजित करने से नहीं, बल्कि उनके जीवन-संदेश को व्यवहार में उतारने से होगी। यदि पंजाब को एक सशक्त, न्यायपूर्ण और आत्मविश्वासी समाज बनाना है, तो हमें सत्ता से अधिक सिद्धांतों को, व्यक्तियों से अधिक संस्थाओं को, प्रचार से अधिक सेवा को तथा पद से अधिक चरित्र को महत्व देना होगा।-मनजिंदर सिंह सिरसा तथा प्रो. (डा.) करमजीत सिंह
