बंद करो यह लड़ाई, जिसमें सारी मानवता कराह रही है

punjabkesari.in Tuesday, Apr 07, 2026 - 05:09 AM (IST)

1990 -91 तक हम मानते थे कि दुनिया सोवियत यूनियन और अमरीका के 2 शक्तिशाली गुटों में बंटी हुई है, परंतु सोवियत यूनियन के अंतिम कम्युनिस्ट राष्ट्रपति गर्बाच्योव के बाद सोवियत यूनियन जैसा शक्तिशाली देश विश्व राजनीति में कमजोर पड़ गया। दुनिया में अमरीका की चढ़त बन गई। अमरीका दुनिया भर के तेल भंडारों पर अपना एकाधिकार जमाना चाहता है। एक बहाना ढूंढ लेता है कि अमुक-अमुक देश के पास परमाणु बम है और अमरीका उस देश पर आक्रमण कर देता है। निकलता किसी भी देश से कुछ नहीं, परंतु अमरीका की विस्तारवादी राजनीति की विजय हो जाती है। 

कमाल तो तब हुआ जब वेनेजुएला जैसे प्रभुसत्ता सम्पन्न देश के राष्ट्रपति और उनकी धर्मपत्नी को सत्ताच्युत कर अमरीका की एक बहुत खतरनाक आपराधिक जेल में डाल दिया गया। उससे भी बड़ा कमाल यह था कि विश्व का कोई भी देश वेनेजुएला के राष्ट्रपति के साथ हुए अमानवीय व्यवहार के लिए ‘आह’ तक नहीं भर सका। अमरीका का इतना डर? अमरीका ने यही हाल वियतनाम का किया, परंतु शुक्र है कि वियतनाम ने लम्बे संघर्ष के बाद अमरीका को अपमानित कर वियतनाम की प्रभुसत्ता को बनाए रखा। अफगानिस्तान से रूस और अमरीका दोनों बड़ी शक्तियों को निकालना पड़ा। ईराक के लोकप्रिय राष्ट्रपति सद्दाम हुसैन को भी उसी बहाने से फांसी पर चढ़ा दिया गया, कि वह परमाणु बमों और रासायनिक विस्फोटक पदार्थों से दुनिया को खतरे में डाल रहा है। लीबिया के तानाशाह कर्नल गद्दाफी का भी यही हश्र किया गया।

वर्तमान अमरीका-इसराईल और ईरान के युद्ध ने उन इस्लामिक देशों को भी युद्ध में धकेल दिया है, जिन्होंने अमरीका को अपने हवाई अड्डों के इस्तेमाल की आज्ञा दे रखी है। खाड़ी के लगभग 20 देश आज युद्ध की लपेट में हैं। दुबई की ऊंची-ऊंची इमारतें धराशाही हो रही हैं। सीरिया, लेबनान, बेरूत, कतर जैसे बीसियों इस्लामिक देश ईरानी मिसाइलों की मार झेल रहे हैं। आखिर क्यों कोई अमरीका के आगे मुंह नहीं खोल रहा? अमरीकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प धमकी पर धमकी दे रहे हैं कि ईरान तबाह हो चुका है। खामेनेई जो ईरान के धार्मिक नेता थे, को अमरीका की गुप्तचर एजैंसियों ने निशाना बना परिवार सहित मार दिया। ईरान के बड़े-बड़े फौजी कमांडर मारे जा चुके हैं। मार्च, 2026 में अमरीका-इसराईल द्वारा ईरान पर किए गए हमले का मुख्य कारण ईरान के परमाणु कार्यक्रम को रोकना, ईरान के मिसाइल विकास को सीमित करना और क्षेत्र में अमरीकी सहयोगियों पर ईरान समर्थित समूहों के हमलों को रोकना था। यह कदम 1979 से जारी दशकों पुराने भू-राजनीतिक तनाव, होर्मुज जलडमरूमध्य की सुरक्षा और शासन परिवर्तन के उद्देश्य से शुरू हुआ था।

पाठकवृंद यह न समझें कि युद्ध में हारने वाला ही हारता है। जीतने वालों का भी कुछ नहीं बचता। युद्ध में कोख धरती मां की बांझ होती है। आपने मिसाइलों द्वारा बनाए गए गड्ढों को नहीं देखा? आकाश में धुएं के उठते गुबार को नहीं देखा? आपने दोनों ओर से मरते सैनिकों के शवों पर मंडराती चीलों को नहीं देखा? युद्ध किसी समस्या का हल नहीं। युद्ध स्वयं ही एक अनसुलझी समस्या है। युद्धों में देशों की सीमाएं बंट जाती हैं। युद्ध में विजयी हारने वाले देशों से जो व्यवहार करते हैं उससे मर जाना बेहतर है। 

जंग अमरीका ने शुरू की थी, अब अमरीका ही इसे खत्म करेगा। क्या अमरीका, इसराईल और ईरान युद्ध के प्रभावों से अनभिज्ञ हैं? टैंक जब चलते हैं तो वे अपना-पराया कुछ नहीं देखते? क्या अमरीका ने कभी सोचा है कि बच्चों, बूढ़ों और नारी जाति का युद्ध के बाद क्या हाल होता है? विधवा और बेबस मांओं के अपने पतियों या अपने बेटों के लिए क्रंदन को राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प जैसे नेता सुन पाएंगे? बंद करो यह लड़ाई, जिसमें सारी मानवता कराह रही है। युद्ध में किसी का भला नहीं परंतु एक बात सत्य है कि दुनिया में शांति स्थापित करने वाला संयुक्त राष्ट्र युद्ध रोकने में पूर्णतया असफल सिद्ध हुआ है।-मा. मोहन लाल (पूर्व परिवहन मंत्री, पंजाब)


सबसे ज्यादा पढ़े गए

Related News