समान नागरिक संहिता की ओर बढ़ते कदम

punjabkesari.in Wednesday, Mar 25, 2026 - 05:11 AM (IST)

अमरीका -इसराईल और ईरान के बीच चल रहे विनाशक युद्ध के बीच सारा विश्व आपदाग्रस्त है। हमारे देश में 5 राज्यों में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं और प्रधानमंत्री मोदी ने लोगों को शांत करने का प्रयास किया है, तो दूसरी ओर उच्चतम न्यायालय ने तब बिल्ली के गले में घंटी बांधी, जब उसने हाल ही में एक समान नागरिक संहिता की वकालत की। 

संविधान में वर्णित समानता के अधिकार पर प्रकाश डालते हुए न्यायालय की 3 सदस्यीय खंडपीठ ने कहा कि यह उत्तराधिकार कानूनों में समानता लाने का सर्वाधिक प्रभावी समाधान है। न्यायालय ने मुस्लिम पर्सनल लॉ शरीयत एप्लीकेशन एक्ट 1937 के प्रावधानों को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई करते हुए कहा कि इस कानून के अंतर्गत उत्तराधिकार में मुस्लिम महिलाओं के साथ भेदभाव किया गया है और उन्हें अन्य धर्मों के समान संपत्ति के अधिकारों से वंचित रखा गया है। न्यायालय ने कहा, जब तक हम न्यायिक निर्णयों के माध्यम से उत्तराधिकार अधिकारों सहित असमान संपत्ति अधिकारों के मामले में समानता स्थापित करते हैं और पर्सनल कानूनों को संविधान के विपरीत घोषित करते हैं तो इससे अनावश्यक रिक्ति पैदा होती है। इस स्थिति में बेहतर है कि हम इस कार्य को विधायिका पर छोड़ दें कि वह राज्य के नीति निदेशक तत्वों में एक-एक मूल तत्व को प्रभावी बनाएं जिसमें एक समान नागरिक संहिता की पहले से सिफारिश की गई है। 

प्रधानमंत्री मोदी के लिए एक समान नागरिक संहिता समय की मांग है क्योंकि विद्यमान कानून सांप्रदायिक है, जो लोगों को धार्मिक आधार पर विभाजित करता है और भेदभावपूर्ण है। समानता के मूल सिद्धान्त को रेखांकित करते हुए और महिलाओं को गरिमा प्रदान करने के वायदे के साथ उनका मानना है कि प्रत्येक नागरिक कानून की नजर में समान है। सहयोगी जनता दल (यू) और तेदेपा इस विचार से सहमत हैं किंतु उनका मानना है कि यह कदम आम सहमति से उठाया जाए। कानूनी रूप से यह जटिल है क्योंकि यह धर्म आधारित कानूनों में हस्तक्षेप करता है और देश धर्मनिरपेक्ष कानूनों के आधार पर चलता है। किंतु भाजपा शासित राज्यों का कहना है कि वे उत्तराखंड की एक समान नागरिक संहिता का अनुसरण करेंगे और इससे स्पष्ट होता है कि इससे इस समस्या का एक समाधान मिल गया है क्योंकि इससे भाजपा कानूनी और सामाजिक उलझनों से दूर होती है और अपनी विचारधारा को भी आगे बढ़ाती है। 

स्वाभाविक रूप से विपक्ष मोदी सरकार पर हमला करता है कि वह भारत की विविधता का सम्मान नहीं करती और उसका कहना है कि लोकतंत्र का उद्देश्य सुशासन होना चाहिए न कि एक समान नागरिक संहिता। एक समान नागरिक संहिता धार्मिक स्वतंत्रता, अल्पसंख्यकों के अधिकार, उनकी पहचान, उनके पर्सनल कानूनों में हस्तक्षेप होगा, जब तक कि धार्मिक समूह बदलाव के लिए तैयार न हों। यह अल्पसंख्यक बनाम बहुसंख्यक मुद्दा है और भारत में रह रहे मुसलमानों के लिए हिन्दुत्व ब्रिगेड की नीति है।  यदि हिन्दू पर्सनल लॉ का आधुनिकीकरण किया जा सकता है और परंपरागत ईसाई रीति रिवाजों को असंवैधानिक घोषित किया जा सकता है तो मुस्लिम पर्सनल लॉ को धर्मनिरपेक्षता की खातिर पवित्र क्यों माना जाता है?

दुखद तथ्य यह है कि गत वर्षों में धर्म को व्यक्तिगत और राजनीतिक हितों के लिए विकृत किया गया और इसे वोट बैंक की राजनीति का साधन बनाया गया है, जिसके चलते एक समान नागरिक संहिता पर चर्चा कानूनी की बजाय राजनीतिक बनती रही और इसे सुधार के एजैंडा की बजाय अक्सर ध्रुवीकरण का साधन बनाया गया। संविधान के अनुच्छेद 25 में धार्मिक स्वतंत्रता की गारंटी दी गई है और एक समान नागरिक संहिता को राज्य का हस्तक्षेप और अपनी पसंद के धर्म को मानने की स्वतंत्रता के अतिक्रमण के रूप में देखा गया, जिसके अंतर्गत विभिन्न समुदायों को अपने पर्सनल कानूनों को मानने की अनुमति दी गई है। इसके साथ ही अनुच्छेद 29 में उन्हें अपनी अलग संस्कृति का संरक्षण करने का अधिकार दिया गया है। अनेक अल्पसंख्यक समुदायों का मानना है कि एक समान नागरिक संहिता बहुसंख्यक हिन्दुओं के मानदंडों को परिलक्षित करेगी और यह वास्तविक अर्थों में तटस्थ नहीं होगी, जिससे विशेषकर मुसलमानों और ईसाइयों में विश्वास का अभाव पैदा होगा। कुछ इस बात से चिंतित हैं कि एक समान नागरिक संहिता के माध्यम से सभी पर हिन्दू कोड थोपा जाएगा क्योंकि इसमें विवाह, विवाह विच्छेद, संपत्ति अधिकार आदि के बारे में व्यक्तिगत मुद्दों को शामिल किया जाएगा और वे हिन्दू रीति-रिवाजों के अनुरूप बनाए जाएंगे। 

एक समान नागरिक संहिता के पक्षधर लोगों का मानना है कि इससे समानता और न्याय की भावना को बढ़ावा मिलेगा क्योंकि यह स्वैच्छिक होगी और इसमें किसी विचार या जीवन शैली को किसी पर मनमाने ढंग से नहीं थोपा जाएगा। यह विभिन्न कानूनों के प्रति निष्ठा को समाप्त कर राष्ट्रीय एकता को बढ़ावा देगा क्योंकि एक समान  नागरिक कानून के माध्यम से कानूनी मतभेद समाप्त होंगे और यह एक राष्ट्र, एक कानून के विचार को बढ़ावा देगा। आधुनिक भारतीय समाज धीरे-धीरे एक समान बनता जा रहा है और धर्म, समुदाय और जातीय परंपरागत दीवारें धीरे-धीरे धराशायी हो रही हैं, इसलिए एक समान नागरिक संहिता ऐसे वर्गों तथा धार्मिक अल्पसंख्यकों को संरक्षण और एकता के माध्यम से राष्ट्रीय भावना को प्रोत्साहन देगा। एक समान नागरिक संहिता की आवश्यकता भेदभावपूर्ण प्रथाओं के चलते पैदा हुई और इसे सामाजिक सुधार की दिशा में महत्वपूर्ण पाया गया। इससे असमानता समाप्त हो सकती है।  

समय आ गया है कि लोगों में आम सहमति बनाई जाए, ताकि एक समान नागरिक संहिता को अधिनियमित करने से पूर्व उनकी गलतफहमी और चिंताएं दूर हों। यह कानूनों में अलग-अलग निष्ठाओं को समाप्त कर लैंगिक न्याय के उद्देश्य को प्राप्त करने का आधुनिक तरीका है। इसलिए भारत और उसके धर्मनिरपेक्ष स्वरूप में स्वैच्छिक एक समान नागरिक संहिता की आवश्यकता है ताकि धीरे-धीरे उसकी स्वीकार्यता बढ़े, जिससे मुस्लिम समाज में एक बौद्धिक वर्ग के पास एक विकल्प होगा और वह एक समान नागरिक संहिता को अपनाएगा।-पूनम आई. कौशिश


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