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राष्ट्रभाषा के कुछ कड़वे तथ्य

2020-09-14T00:19:06.953

15 अगस्त 2020, भारत ने अपनी स्वाधीनता के 73 वर्ष पूरे किए, और आगामी 14 सितंबर को हिंदी को हमारी राष्ट्रीय भाषा का दर्जा़ मिले हुए 71 वर्ष हो जायेंगे। देखा जाए तो भाषा के प्रचार पसार के लिए यह एक लम्बा समय है लेकिन सोचने वाली बात यह है कि क्या सच में हम दिल से हिंदी को राष्ट्रीय भाषा का दर्जा़ दे सके हैं?

देश के 77% लोग हिंदी लिखते, पढ़ते, बोलते व समझते हैं। परंतु बाकी के 33% ने ऐसा दबाव बनाया कि अधिकतर हिंदी भाषी हिंदी बोलने व लिखने पर शर्म महसूस करते हैं। हिंदी पर कुछ दबाव क्षेत्रीय भाषाओँ का है पर असली कारण है अंग्रेजी भाषा।  हिंदी की वास्तविक स्थिति अच्छी नहीं है और जो स्थान और सम्मान राष्ट्रभाषा को मिलना चाहिए उस से हिंदी कोसों दूर है। सिर्फ यही नहीं, हिंदी का घटता प्रयोग और आमजन में हिंदी के प्रति उदासीनता राष्ट्र भाषा के लिए एक गंभीर समस्या बन चुका है।

स्वदेशी वस्तुओं पर क्यों हमें गर्व  नहीं होता? हिंदी या क्षेत्रीय भाषाओँ को हीन क्यूँ समझा जाता है ? क्यों हिंदी या क्षेत्रीय भाषाओँ  वाले शिक्षण संस्थान अपना उचित स्थान नहीं पा सके हैं और अधिकतर  बंद हो रहे हैं या बंद होने के कगार पर हैं। वहीं दूसरी ओर अंग्रेजी़ माध्यम स्कूलों की संख्या बढ़ रही है? सभी क्षेत्रों में अंग्रेजी का वर्चस्व ऐसा है कि हिंदी भाषी काम में निपुण होने के बावजूद भी पिछड़ा समझा जाता है? भला क्यों?
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विडंबना ये है कि हम बिना तथ्य जाने ही किसी बात पर विश्वास कर लेते हैं। जबकि आंकड़े ये कहते हैं कि भारत में मात्र 10% ही लोग अंग्रेजी़ बोलते व समझते हैं और विश्व भर में 12% से भी कम। पर अंग्रेजी को हमने वैश्विक भाषा के रूप में स्वीकार कर लिया है। किसी भी भाषा के लिए इस से अधिक चिंता का विषय क्या हो सकता है।

आश्चर्य की बात यह है कि हिंदी का अच्छा ज्ञान रखने वाले भी होटलों,एयरर्पोट आदि जगहों पर अंग्रेजी़ बोलने में अपनी पूरी ताकत झोंक देते हैं। और तो और हिंदी की वकालत करने वाले लोग भी अंग्रेजी़ लिखने,पढ़ने,बोलने और अपने आप को पढ़ा लिखा दिखाने की जी जान से कोशिश करते हुए नज़र आयेंगे।

अधिकतर लोगों की या  दलील होती है कि भारत एक भाषिक विभिन्नता का देश है इसीलिए अंग्रेजी़ को हिंदी या अन्य क्षेत्रीय भाषा से अधिक मान्यता दी जाती है। यदि हम बात करें फ्रांस की जहां लगभग 25 भाषाएं बोली जाती हैं। उन लोगों को आप गर्व से राष्ट्रीय या अंतराष्ट्रीय स्तर पर फ्रांसीसी बोलते हुए देख सकते हैं। इसी तरह रूस, चीन व अफगानिस्तान भी उदाहरण हैं, जिन्होंने अपनी भाषा की अक्षुण्णता बनाये राखी है। इस से एक बात तय है कि मुद्दा एक देश में विभिन्न भाषाओं का नहीं बल्कि हमारी मनोवृत्ति की है।

हम सभी  पर विदेशी भाषाओं का, खासकर अंग्रेजी़ का अत्याधिक असर है और यह असर हिंदी समेत अपनी भाषाओं के विलुप्त होने का कारण भी बन सकता है। मैं यह नहीं कहती कि अंतर्राष्ट्रीय भाषा नहीं सीखनी चाहिए। बिल्कुल सीखनी चाहिए क्योंकि यह वैश्वीकृत अर्थव्यवस्था को प्रोत्साहित करती है परंतु अपनी राष्ट्रीय भाषा की आदर की कीमत पर कतई नहीं।

यह हम सभी के लिए जागने का वक्त है। हमें अपनी भाषा पर गर्व करना होगा। हमारे अंग्रेजी या विदेशी प्रेम के चलते कहीं ऐसा ना हो, हिंदी मात्र एक दिन (14 सितंबर) का उत्सव ही बनकर रह जाए।- जय हिंद।

 


Yaspal

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