शॉर्ट कट अक्सर गलत फैसले करवा देता है

punjabkesari.in Saturday, Mar 30, 2024 - 05:17 AM (IST)

डेनियल काहनेमन का 90 वर्ष की आयु में 27 मार्च को निधन हो गया। उन्हें अर्थव्यवस्था के उस पहलू को उजागर करने पर सन् 2002 में नोबल पुरस्कार मिला जिसका संबंध व्यक्ति द्वारा प्रतिदिन लिए जाने वाले आॢथक फैसलों से है। वे एक मनोवैज्ञानिक थे और उन्होंने सिद्ध किया कि हमारे दिमाग के सोचने के तरीके पर ही सही या गलत, उचित या अनुचित फैसले लेने की जिम्मेदारी है। उनके योगदान को वर्तमान आॢथक और सामाजिक परिप्रेक्ष्य में समझना जरूरी है, विशेषकर भारत के लिए जो अभी विकास पथ पर है और आर्थिक संपन्नता के रास्ते खोज रहा है। 

दिमाग की परेशानी क्या है? : किसी भी परिस्थिति में हमारा दिमाग 2 तरह से काम करता है। एक हिस्सा तेजी से काम करता है, जो होगा उसका अनुमान लगा लेता है, अपना नफा नुकसान सोचता है, तुरंत निर्णय कर लेता है और फिर कर गुजरता है। ऐसी सोच वाला दिमाग जिनका होता है उन्हें खतरों का खिलाड़ी कह सकते हैं। वे अपने निर्णय पर न तो दोबारा सोचते हैं और न ही मनमुताबिक परिणाम न मिलने पर घबराते हैं। किसी की परवाह नहीं करते। उनके लिए कर्म करना और आगे बढ़ जाना ही महत्वपूर्ण है। दिमाग का दूसरा हिस्सा बहुत सुस्त, ढीलाढाला, टालमटोल करने वाला होता है। बाल की खाल निकालने जैसा व्यवहार करता है, अनगिनत काल्पनिक परेशानियों के बारे में अनुमान लगाता रहता है, बहुत संभलकर कोई भी कदम उठाने का निर्णय करता है। इस प्रक्रिया में चाहे कितना भी समय लगे, उसे अर्थात् ऐसी सोच रखने वाले व्यक्ति को कोई फर्क नहीं पड़ता। ऐसा व्यक्ति जो है उसी में मस्त रहता है, उसके व्यवहार में बदलाव करना बहुत मुश्किल होता है। 

अब हम आते हैं इस बात पर कि किस प्रकार कोई व्यक्ति हमारे दिमाग पर अपना असर डालने में कामयाब हो जाता है। यह व्यवहार परिवर्तन कैसे होता है? यहां तक कि हमें किस से क्या बात कहनी है, इसका निर्णय कैसे हम दूसरों की मर्जी से करने लगते हैं। कहां और कैसे कोई वस्तु खरीदनी है, इसका निर्णय भी हम नहीं कर पाते बल्कि वही करता है, जैसे कि मानो कोई हमारे दिमाग से खेल रहा हो। अक्सर ऐसे अवसर आते हैं जिनमें दिमाग दुविधा में फंस कर सही ढंग से सोच नहीं पाता।  यही देख लीजिए कि हम घर के लिए सब्जी, राशन जैसी चीजें दूर के बाजार में लेने चले जाते हैं क्योंकि वहां कम दाम देने पड़ेंगे। इस बात का विचार तक नहीं करते कि वहां तक आने-जाने में सवारी का इस्तेमाल होगा, सस्ते के चक्कर में अपनी जरूरत से ज्यादा और एक दो दिन की बजाय हफ्ते भर का सामान ले लेंगे। बाद में चाहे वह सड़ जाए, खराब होने पर फैंकना पड़ जाए या इस्तेमाल ही न हो। दिमाग का यह हिस्सा दूसरे पर हावी हो जाता है। दिमाग का दूसरा हिस्सा कितना भी कहता रहे कि अपनी जरूरत और सुविधा तथा समय की बचत करते हुए खरीदारी करेंगे तो यह निर्णय सही होगा, आप उसकी एक नहीं चलने देते। 

आर्थिक मनोविज्ञान : यही व्यवहार का अर्थशास्त्र है। यदि हम यह सोचकर निर्णय लेते हैं कि हम अपने साथ कोई छल-फरेब या धोखाधड़ी तो नहीं होने दे रहे, ऐसे उत्पाद तो नहीं खरीद रहे जो मिलावटी, घटिया और स्वास्थ्य से खिलवाड़ कर सकते हैं। किसी वस्तु के प्रति अपने मन में पहले से बनी किसी धारणा के आधार पर तो फैसले नहीं ले रहे। हमारे दिमाग के एक हिस्से से यह बात निकल ही नहीं रही कि कल मुझे अगर हजार रुपए का लाभ हुआ था तो आज भी होना चाहिए। नहीं हुआ तो अब कल मुझे 2 हजार का लाभ होना ही चाहिए। हम दिमागी तौर पर अशांत हो जाते हैं, इसी उधेड़ बुन में रहते हैं कि कैसे नुकसान की भरपाई हो। मतलब यह कि हजार रुपए की हानि हजार रुपए के लाभ पर हावी हो जाती है। हम पैसे गिनते रहते हैं और जो लाभ प्राप्त होने का सुख है उससे वंचित रह जाते हैं। मनोविज्ञान का अर्थशास्त्र से गहरा संबंध है। काहनेमन का सिद्धांत हमारी सोच को बदलने में मदद करता है। आज जो देश विकसित हैं वे इस पर चलकर ही पूरी दुनिया को अपने इशारों पर चला रहे हैं। अर्थशास्त्र को सही मायने में व्यवहार के विज्ञान से जोड़कर ही समझा जाना चाहिए। यह कोई गणित का फार्मूला नहीं है जिसमें दो और दो चार ही होंगे। इसमें यह बाईस भी हो सकते हैं। 

शॉर्ट कट लेना मतलब दूसरों को अपनी जरूरतों पर हावी होने देना अक्सर गलत फैसले करवा देता है। अपने बारे में पहले से यह धारणा बना लेना कि हमारे वश में यह नहीं है, हम कर ही नहीं सकते, साधन कहां हैं, संसाधन कैसे जुटाए जाएंगे और फिर जब आसानी से दूसरों से मिल सकता है तो क्यों इतना दिमाग खपाएं, यही सब हमें स्वयं पर विश्वास न करने और दूसरों पर निर्भर रहने की तरफ ले जाता है। इसके विपरीत अपने बलबूते तथा कठिन समय में अडिग रहने की योग्यता और अपनी प्रतिभा को कुंठित न होने देने से बचाए रखने से हम अपने लक्ष्य तक पहुंच सकते हैं। थोड़े से लाभ के लिए भविष्य को दांव पर लगा देना कोई व्यावहारिक अर्थशास्त्र नहीं है। ताजा उदाहरण यह है कि एक उभरते राजनीतिक दल ने अपनी एक ही नीति की बदौलत हमेशा के लिए अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मार ली और एक-दूसरे दल ने छुटपुट स्वार्थ की पूर्ति के लिए अपने को बेनकाब कर दिया। 

इससे अलग एक तीसरे दल ने वही सब काम किए जो और दल कर रहे थे लेकिन दिमाग के उस हिस्से पर असर डालने में सफल रहे जो तर्क के आधार पर नहीं, बल्कि भावनाओं के वश में रहता है। उसकी गलतियों पर ध्यान ही नहीं जाता क्योंकि उसने सब कुछ डंके की चोट पर किया, छिपाने की न नीति बनाई न जरूरत समझी। निष्कर्ष यही कि जिसने समझ लिया कि निर्णय करते समय दिमाग के किस हिस्से से कब काम लेना है और किस भाग की बात पर गौर तक नहीं करना, वही मुकद्दर का सिकंदर है।-पूरन चंद सरीन
 


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