भीषण गर्मी : पुराने उपाय ही प्रभावी

punjabkesari.in Monday, May 25, 2026 - 05:04 AM (IST)

पिछले कुछ समय से मौसम वैज्ञानिकों के हवाले से यह खबर आ रही है कि इस साल भीषण गर्मी पडऩे वाली है। इस खबर से सबसे ज़्यादा चिंता कृषि वैज्ञानिकों और किसानों को है। ऐसी भविष्यवाणियां की जा रही हैं कि इस साल भी गर्मी विकराल रूप ले लेगी, जिससे सूखे जैसे हालात पैदा हो सकते हैं। खरीफ की फसल पर तो इसका बुरा असर पड़ेगा ही, रबी की उपज पर भी विपरीत प्रभाव पड़ सकता है। अमरीका और ईरान युद्ध के चलते पहले ही ऊर्जा संसाधनों पर महंगाई का असर दिखने लगा है और यदि गर्मी ने भी अपना असर दिखाया तो हालात बेकाबू हो सकते हैं।

वैज्ञानिकों का मानना है कि इस बढ़ती गर्मी के कारण गेहूं का उत्पादन काफी कम रहेगा। इसके साथ ही फलों और सब्जियों के उत्पादन पर भी विपरीत प्रभाव पड़ेगा। नतीजतन खाद्य पदार्थों के दामों में काफी बढ़ौतरी होने की संभावना है। कितना असर होगा यह तो आने वाले समय पर ही पता चल पाएगा। दरअसल गर्मी बढऩे का एक प्रमुख कारण सर्दियों में होने वाली बारिश का लगातार कम होते जाना है। मौसम वैज्ञानिकों के अनुसार दिसंबर, जनवरी और फरवरी में औसत तापमान से एक या दो डिग्री ज़्यादा दर्ज किया गया है। इतना सा तापमान बढऩे से बारिश की मात्रा घट गई है। 

यह तो रही कृषि उत्पादों की बात, लेकिन अगर शहरी जीवन को देखें तो यह समस्या और भी बड़ा विकराल रूप धारण करने जा रही है। हमारा अनुभव है कि गर्मियों में जब ताल-तलैये सूख जाते हैं और नदियों में भी जल की आवक घट जाती है तो सिंचाई के अलावा सामान्य जन-जीवन में भी पानी का संकट गहरा जाता है। नगर पालिकाएं आवश्यकता के अनुरूप जल की आपूर्ति नहीं कर पातीं। इसलिए निर्बल वर्ग की बस्तियों में अक्सर सार्वजनिक नलों पर संग्राम छिड़ते हुए देखे जाते हैं। नलों में पानी बहुत कम देर के लिए आता है। 

मध्यम वर्गीय परिवारों को भी अपनी आवश्यकताओं के अनुरूप पानी एकत्र करने के लिए काफी मशक्कत करनी पड़ती है। राजनेताओं, अधिकारियों और संपन्न लोगों को इन विपरीत परिस्थितियों में भी जल संकट का सामना नहीं करना पड़ता। क्योंकि ये लोग आवश्यकता से कई गुना ज़्यादा जल जमा कर लेते हैं। असली मार तो आम लोगों पर पड़ती है। भीषण गर्मी पडऩे के साथ लोग कूलर या एयर कंडीशनर की तरफ भागते हैं। इससे जल और विद्युत दोनों का संकट बढ़ जाता है। हाइड्रो पावर प्लांट में जल आपूर्ति की मात्रा घटने से विद्युत उत्पादन गिरने लगता है। जैसे-जैसे समाज पारंपरिक तरीक़ों को छोड़ कर बिजली से चलने वाले उपकरणों की तरफ बढ़ रहा है वैसे-वैसे वातावरण और भी गर्म होता जा रहा है। 

एयर कंडीशनरों से निकलने वाली गर्म हवा भी वातावरण को प्रदूषित करने और गर्मी बढ़ाने का काम कर रही है। 1974-76 के बीच मैं एक स्वयंसेवक के रूप में मुरादाबाद के निकट अमरपुर काशी गांव में समाज सेवा की भावना से काफी समय तक रहा। इस दौरान हर मौसम में गांव के जीवन को जिया। मुझे याद है कि मई-जून की तपती गर्मी और लू के बावजूद हम सब स्वयंसेवक दोपहर में खुले दालान पर नीम के पेड़ की छाया में सोया करते थे। तब वह छाया ही काफी ठण्डी लगती थी। गर्म लू जब पसीना सुखाती थी तो शरीर में ठंडक महसूस होती थी। इसी तरह रात में छत पर पानी छिड़क कर सब सो जाते थे। रात के ग्यारह-बारह बजे तक तो गर्म हवा चलती थी, फिर धरती की तपिश खत्म होने के बाद ठण्डी हवा चलने लगती थी। 

सूर्योदय के समय की बयार तो इतनी स्फूर्तिदायक होती थी कि पूरा शरीर नई ऊर्जा से भर जाता था। वहां न तो फ्रिज का ठण्डा पानी था, न कोई और इंतजाम, लेकिन हैंडपम्प का पानी या मिट्टी के घड़े का पानी शीतलता के साथ सोंधापन लिए शरीर के लिए भी गुणकारी होता था जबकि आज आर.ओ. के पानी ने हम सबको बीमार बना दिया है। आर.ओ. की मशीन जल के सभी प्राकृतिक गुणों को नष्ट कर देती है। कुएं से एक डोल पानी खींच कर सिर पर उंडेलते ही सारे बदन में फुरफुरी आ जाती थी। जिस से दिन भर के श्रमदान की सारी थकावट क्षणों में दूर हो जाती थी।  आजकल हर व्यक्ति चाहे उसकी हैसियत हो या न हो शरीर को कृत्रिम तरीके से ठण्डा रखने के उपकरणों को खरीदने की चाहत रखता है। हम सब इसके शिकार बन चुके हैं और इसका खामियाजा मौसम के बदले मिजाज और बढ़ती गर्मी को झेल कर भुगत रहे हैं। इस आधुनिक दिनचर्या का बहुत बुरा प्रभाव हमारे शरीर पर पड़ रहा है। हर शहर में लगातार बढ़ते अस्पताल और दवा की दुकानें इस बात का प्रमाण हैं कि सुजलाम् सुफलाम् मलयज शीतलाम शस्यश्यामला वाले देश के हम सब नागरिक बीमारियों से घिरते जा रहे हैं। न तो हमें अपने भविष्य की ङ्क्षचता है और न ही सरकारों को। समस्याएं दिन प्रतिदिन सुलझने की बजाय उलझती जा रही हैं।

दूसरी ओर  हर पर्यावरणविद् मानता है कि पारंपरिक जलाशयों को सुधार कर उनकी जल संचय क्षमता को बढ़ा कर और सघन वृक्षावली तैयार करके मौसम के मिजाज को कुछ हद तक बदला भी जा सकता है। प्रधानमंत्री मोदी का जल शक्ति अभियान और बरसों से चले आ रहे वृक्षारोपण के सरकारी अभियान अगर ईमानदारी से चलाए जाते तो देश के पर्यावरण की हालत आज इतनी दयनीय न होती। सभी जानते हैं कि सरकार द्वारा जहां एक ओर तो वृक्षारोपण व तालाब खोदने को बढ़ावा दिया जा रहा है, वहीं जमीनी स्तर पर कथनी और करनी में काफी अंतर है। मिसाल के तौर पर जालौन क्षेत्र में 400 छोटे बांध बनाए गए थे। इनमें से आधे से अधिक तबाह हो चुके हैं। ललितपुर जिले में जल संरक्षण के लिए तीन करोड़ रुपए से चल रहा काम निरर्थक हो चुका है। इसी इलाके में बादहा और रसिन बांध के नाम पर करोड़ों रुपए खर्च हुए लेकिन इनका भी नतीजा शून्य ही रहा। इसलिए यदि हम पारंपरिक तरीकों पर ध्यान नहीं देंगे तो ऐसे संकट आते ही रहेंगे।-विनीत नारायण     


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