अलग ‘रेल बजट’ फिर हो बहाल

punjabkesari.in Sunday, Jan 23, 2022 - 05:50 AM (IST)

भारत में होते दर्दनाक रेल हादसों ने हमारे पुराने रेल तंत्र में सुधार करने की जरूरत को और महसूस करा दिया है। रेल पटरियां, पुराने सिस्टम के डिब्बे, इंजन आदि को बदलने की जरूरत है। बिना देर किए विद्युतीकरण और आधुनिकीकरण की ओर मुडऩा होगा। इस दिशा में कुछ वर्ष पूर्व एक समानांतर बदलाव रूपी प्रयोग की आहट सुनाई भी दी थी।

केंद्र सरकार ने रेल बजट का आम बजट में विलय किया था। मकसद था भारतीय रेल नैटवर्क को मजबूत करना और उसे आधुनिक जामा पहनाना। मगर उससे कोई खास परिणाम नहीं निकला। कमोबेश रेलवे की स्थिति पहले जैसी ही बनी हुई है। हादसे रुके नहीं, बल्कि लगातार होते जा रहे हैं। 

गत दिवस एक और बड़ा रेल हादसा हो गया। पश्चिम बंगाल में जलपाईगुड़ी के नजदीक रेल बेपटरी हो गई। बीकानेर-गुवाहाटी एक्सप्रैस की कई बोगियां एक साथ पटरी से उतर गईं। कई लोग मारे गए। हादसे के शुरूआती कारण वही पुराने बताए गए हैं, कि मौसम खराब था, पटरी खराब थी, चालक समझ नहीं पाया, वगैरा-वगैरा। लेकिन कायदे से देखें तो ये कारण न तो बुनियादी हैं और न ही मौलिक। मूल कारण तो सबके सामने है, कराहता पुराना रेल सिस्टम। घटना को बेशक पुरानी घटनाओं की तरह मृतकों के परिजनों को मुआवजे देकर शांत कर दिया जाएगा, लेकिन इससे सरकारी खामियां नहीं छिप पाएंगी। 

हादसे में हताहत होने वालों की चीखें लगातार खोखले रेल तंत्र की कमियों को उजागर कर रही हैं। इसमें हम सीधे हुकूमतों को भी दोषी नहीं ठहरा सकते, क्योंकि काम तो रेल अधिकारियों को ही करना होता है। हादसों के वक्त उनकी घोर लापरवाही कई तरह के सवाल खड़े करती है। पटरियों का रखरखाव भी वे अच्छे से नहीं करवाते। सर्दी के वक्त बेलदार पटरियों से नदारद रहते हैं। जबकि, नियमानुसार प्रत्येक रेल के गुजरने के बाद पटरी का मुआयना करना होता है, लेकिन ऐसा किया नहीं जाता। 

बीकानेर-गुवाहाटी एक्सप्रैस 5 राज्यों, 34 रेलवे स्टेशनों से गुजर कर अपने गंतव्य पर पहुंचती है। वह रूट व्यस्त माना जाता है। पटरी में दरार की भी बात कही जा रही है। अगर हादसे का कारण खराब पटरियां होंगी तो अधिकारियों की ही प्रथम दृष्टया लापरवाही कही जाएगी। 

भारत में रोजाना करोड़ों यात्री सफर करते हैं। हमारे यहां रेल की अहमियत कभी कम नहीं होगी, क्योंकि वह प्रत्येक नागरिक के जीवन से वास्ता रखती है और रखती रहेगी। लेकिन रेल बजट के खात्मे के बाद ऐसा प्रतीत होता है, जैसे रेलवे विभाग बेसहारा हो गया है। रेलवे की दशा को दुरुस्त करने के लिए अलग बजट की फिर से जरूरत महसूस होने लगी है। हम देश में बुलेट ट्रेन चलाने की बात कर रहे हैं, अच्छी बात, चलनी चाहिए, पर मौजूदा रेल नैटवर्क की अव्यवस्थाओं के चलते पूरा महकमा हांफ रहा है। उस पर ध्यान देने की स त आवश्यकता है। 

सवाल उठता है कि हमारा रेल तंत्र सबक क्यों नहीं लेता। मौजूदा रेल हादसे का जिम्मेदार किसे माना जाए, सरकार को या प्रशासन को? लेकिन मरने वाले परिजनों की चीखें सिस्टम को जरूर ललकार रही हैं। हादसे में किसी ने अपना भाई खोया, किसी ने पति तो किसी ने अपना दोस्त। उन चीखों का जवाब शायद ही कोई दे पाए। 

हादसे में मारे गए यात्रियों के परिजनों को मुआवजा देने की घोषणा हुई है। पर मुआवजे का यह मरहम हादसों को रोकने का शायद विकल्प नहीं हो सकता। मुआवजों का खेल खेल कर सरकार/प्रशासन अपना पल्ला झाड़ लेते हैं, लेकिन असल सच्चाई पर पर्दा नहीं डाला जा सकता। सवाल यह है कि हादसों को रोकने के मुक मल इंतजाम क्यों नहीं किए जाते? रेल हादसे में जो यात्री जान गंवाते हैं उनके परिजनों का दुख हम महसूस कर सकते हैं, पर दर्द का अंदाजा नहीं लगा सकते। हादसे का ज म उनको ताउम्र झकझोरता है। फिर इसके प्रति इतनी घोर लापरवाही क्यों?-डा. रमेश ठाकुर


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