कोविड में सिख सिपहसालारों को सलाम

2021-05-05T04:52:14.343

इस बेहद थका देने वाले समय में बाहर जाना अजूबे से कम नहीं। नई दिल्ली में उदास बादल शायद वे हैं जो छंटने का नाम ही नहीं ले रहे। न ऑक्सीजन, न अस्पतालों में बैड और यहां तक कि श्मशानघाटों पर अंतिम संस्कारों के लिए कोई जगह नहीं। इन सबके बीच किसी एक का कहना है कि यहां पर हमेशा एक उम्मीद है। ऐसे लोग जो आपकी मदद करेंगे उनके पास एक हृदय भी है।

मुझे कहना है कि जब कभी भी एक समस्या, एक आपदा, एक युद्ध या कोई भी सेवा हो तो हमारा प्रिय सिख समुदाय सेवा करने के लिए अग्रिम पंक्ति में खड़ा रहता है और जहां तक भी स भव हो सके यह समुदाय सेवा करता है। वे संसाधन जुटाते हैं और मानव जाति की सेवा करने के लिए इसका अच्छी तरह से उपयोग करते हैं। 

राजधानी में इस तरह का कार्य उन्हें फिर से सबसे आगे लाया है और वे बीमारों, निराश तथा असह्य रोगियों की देखभाल कर रहे हैं। ऐसे दिनों में हेमकुंट गुरुद्वारा एक राष्ट्रीय विषय बन गया है। वे असह्य रोगियों को कारों, आटोरिक्शा और स्कूटरों पर ऑक्सीजन सिलैंडर दे रहे है। ऑक्सीजन के लंगर लगाना उनका एक नवीन विचार है जो केवल वे ही सोच सकते हैं। दूसरी ओर चाहे सरकार ने क्वारंटाइन केन्द्र शुरू किए हों या नहीं, सिखों ने जरूरतमंदों के लिए  सुविधाओं के साथ उन परिवारों का समर्थन करने के लिए 100 बैड खोल दिए हैं। 

हम जानते हैं कि सिख समुदाय हमारे बहादुर सिपहसालार हैं और जब कभी भी उनकी जरूरत पड़ी तो उन्होंने हमारी रक्षा की। मेरा मानना है कि यह उचित समय है। फ्रंटलाइन कर्मचारियों और पुलिस को अपने राजनीतिक गठजोड़ों को छोड़ महामारी से लडऩे के लिए अपने अनुभव और प्रशिक्षण का सर्वश्रेष्ठ देना होगा। 

सभी राष्ट्रवादी लोगों ने एक साथ आकर और कदम से कदम मिलाकर अपनी आवाज बुलंद की है। स्थानीय पुलिस, जिला कलैक्टर और प्रशासन को अपने क्षेत्र के लोगों की मदद करने के लिए आगे आने की आवश्यकता है। भले ही यह उस क्षेत्र के राजनीतिक परिदृश्य के खिलाफ जाता हो। यह चुनने का समय नहीं है कि कौन से राजनेता ने निर्णय लेना है और किसके पक्ष में लेना है। वे अधिकारियों को स्थानांतरित कर सकते हैं और कुछ समय के लिए भेज सकते हैं। लेकिन कम से कम अधिकारियों को अन्र्तात्मा साफ रखनी होगी कि हमने वही किया जो ऐसे हालातों में सबसे बेहतर था। 

हम आसानी से कुम्भ मेले और कुछ हद तक चुनावी रैलियों को रोक सकते थे। इसके साथ-साथ क्रिकेट मैचों को भी रोका जा सकता था जैसा कि अब किया गया है। ऐसा प्रतीत होता है कि चुनाव आयोग बहुत देर से जागा। ऑक्सीजन सिलैंडर के लिए आर्डर, रोगियों का डाटा लेने के लिए एक कम्पयूटर खरीदने हेतु दो-तीन महीनों का इंतजार करना पड़ता है। 

निविदाएं आमंत्रित करने, उन्हें रद्द करने में जितना समय लगता है तब तक देर हो जाती है। इन सबके लिए एक आपातकाल किस्म की कागजी कार्रवाई होनी चाहिए जो एक घंटे के भीतर ही निपटाई जा सके या फिर अस्पताल के प्रमुख या डॉक्टरों की एक टीम जल्द ही एक निर्णय ले सके और कुछ ही घंटों के भीतर संयंत्रों या कोई भी आपात सामग्री पाई जा सके। उन्हें शीर्ष नेताओं से अनुमति की जरूरत ही न पड़े। हमें अपने फ्रंटलाइन कर्मियों पर भरोसा करना होगा और महामारियों और जरूरत के समय-समय पर आर्डर करने की उन्हें स्वतंत्रता देनी चाहिए। 

मिसाल के तौर पर अनेकों फ्रंटलाइन कर्मियों, अस्पतालों और नर्सों के पास उचित पी.पी.ई. किटें, दस्ताने और मास्क नहीं हैं। यही कारण है कि हमारे डॉक्टर और नर्सें अपनी जानें गंवा रहे हैं। उन्हें इन सबको लेने की अनुमति दी जानी चाहिए। मैं नई दिल्ली के निजामुद्दीन ईस्ट में रहती हूं और लोधी श्मशानघाट पर अफरा-तफरी का माहौल है। स्थानीय लोग इस गर्मी में बिना किसी उचित पी.पी.ई. किटों के शवों को जला रहे हैं। वह ऐसा इसलिए कर रहे हैं क्योंकि यह उनका कत्र्तव्य है। अंत में हमारे सिख बहादुरों तथा फ्रंटलाइन कर्मियों को सलाम। हम उन पर अपना जीवन आपूर्ति करते हैं।


Content Writer

Pardeep

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