स. तेजा सिंह समुंद्री : सिख लोकतांत्रिक जागृति के पीछे एक शांत शक्ति
punjabkesari.in Friday, Feb 20, 2026 - 05:15 AM (IST)
सरदार तेजा सिंह समुंद्री का सिख और भारतीय इतिहास, दोनों में एक विशिष्ट और गहरा सम्मानजनक स्थान है। उन्हें ‘गुरुद्वारा सुधार आंदोलन’ के दौरान उनके नेतृत्व और सिख जन-राजनीति को भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की मुख्यधारा से जोडऩे के लिए जाना जाता है। एक ऐसे समय में, जब सिख अभिजात वर्ग के उन वर्गों के प्रति रोष बढ़ रहा था, जो औपनिवेशिक सत्ता के पक्षधर माने जाते थे, समुंद्री एक नैतिक मार्गदर्शक और संगठनात्मक रणनीतिकार के रूप में उभरे। उन्होंने जनता के गुस्से को अनुशासित, सैद्धांतिक और सामूहिक कार्रवाई में बदल दिया। श्री हरिमंदिर साहिब के पवित्र परिसर के भीतर ‘तेजा सिंह समुंद्री हॉल’ की उपस्थिति उनकी विनम्रता, नैतिक स्पष्टता, संगठनात्मक प्रतिभा और उनके जीवनपर्यंत त्याग की भावना के प्रति एक स्थायी श्रद्धांजलि है।
1882 में वर्तमान तरनतारन जिले के राय का बुर्ज गांव में जन्मे समुंद्री ने एक साधारण ग्रामीण पृष्ठभूमि से उठकर 1920 से 1926 तक चले सिख गुरुद्वारा सुधार आंदोलन के प्रमुख स्तंभों में से एक के रूप में पहचान बनाई। उनकी नेतृत्व शैली वाकपटुता या दिखावे पर नहीं, बल्कि नैतिक दृढ़ विश्वास को एक व्यवस्थित सार्वजनिक लामबंदी में बदलने की दुर्लभ क्षमता पर आधारित थी। उन्होंने रकाब गंज, गुरु का बाग, चाबियों का मोर्चा, जैतो और नाभा जैसे ऐतिहासिक मोर्चों को रणनीतिक और नैतिक दिशा प्रदान की। इनमें से, ‘गुरु का बाग’ मोर्चा भारत के स्वतंत्रता संग्राम में एक महत्वपूर्ण मोड़ साबित हुआ। सिख स्वयंसेवकों ने बिना किसी जवाबी कार्रवाई के गिरफ्तारियां दीं और क्रूर दमन को सहा, जिसने औपनिवेशिक अधिकारियों को चकित कर दिया और भारतीय जनता को प्रेरित किया। महात्मा गांधी, मदन मोहन मालवीय, स्वामी श्रद्धानंद और सी.एफ. एंड्रयूज जैसे राष्ट्रीय नेताओं ने इस अङ्क्षहसक प्रतिरोध की नैतिक शक्ति की खुलकर प्रशंसा की।
अपने प्रभाव के बावजूद, समुंद्री ने बार-बार आधिकारिक पदों को ठुकराया क्योंकि उनका मानना था कि जब व्यक्ति संस्थानों पर हावी होने लगते हैं, तो आंदोलन कमजोर हो जाते हैं। फिर भी, उनकी सलाह और दूरदृष्टि शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी (एस.जी.पी.सी.) और अकाली दल के गठन में सहायक सिद्ध हुई, जिससे सिख धार्मिक और राजनीतिक निकायों के भीतर लोकतांत्रिक कामकाज की नींव पड़ी। उनकी सबसे बड़ी विशेषता उनके निजी आचरण और सार्वजनिक नेतृत्व के बीच का सामंजस्य था। मास्टर तारा सिंह ने उन्हें ‘एक पूर्ण गुरुसिख’ के रूप में वॢणत किया, इस बात पर जोर देते हुए कि समुंद्री के लिए विश्वसनीयता आत्म-अनुशासन से और नेतृत्व व्यक्तिगत उदाहरण से शुरू होता था। समानता के प्रति उनकी प्रतिबद्धता केवल शब्दों तक सीमित नहीं थी, बल्कि व्यावहारिक थी। अमृतसर और तरनतारन के गांवों में उन्होंने दलितों को सांझे कुओं से पानी भरने के लिए आमंत्रित करके और सार्वजनिक रूप से उनकी सेवा स्वीकार करके जातिगत बाधाओं को चुनौती दी-ये ऐसे कार्य थे जिन्होंने 20वीं सदी की शुरुआत के पंजाब में गहरी सामाजिक रूढिय़ों का डटकर मुकाबला किया। 1917 की शुरुआत में ही, उन्होंने सरहाली और लायलपुर में शैक्षणिक संस्थानों की स्थापना के माध्यम से युवाओं और महिलाओं के सशक्तिकरण को बढ़ावा दिया था।
उनकी ईमानदारी उनके भौतिक त्याग के समान ही अटूट थी। जब एस.जी.पी.सी. को वित्तीय संकट का सामना करना पड़ा और प्रिवी काऊंसिल के समक्ष कानूनी अपील दायर करने के लिए 1.5 लाख रुपए की आवश्यकता थी, तब केवल आधी राशि ही एकत्र हो सकी थी। समुंद्री ने शेष 75,000 रुपए जुटाने के लिए अपनी दो मुरब्बा (लगभग 50 एकड़) जमीन गिरवी रख दी। उनके निधन के बाद, जब अंतत: मुकद्दमा जीत लिया गया, तो उनके परिवार ने पुनर्भुगतान (पैसे वापस लेने) से इंकार कर दिया। किसी भी युग में, ऐसा कार्य निजी लाभ से संचालित सार्वजनिक जीवन के बिल्कुल विपरीत और प्रेरणादायक है।
औपनिवेशिक प्रशासन उस नैतिक अधिकार को पहचानता था जो उनके पास था। 1923 में उन्हें और उनके सहयोगियों को गिरफ्तार कर लाहौर किले और सैंट्रल जेल में कैद कर दिया गया (जो बाद में भगत सिंह से भी जुड़ी), ताकि उन्हें एक साजिश के मामले में फंसाया जा सके। 1926 में, जब कैदियों पर सशर्त रिहाई स्वीकार करने का दबाव डाला गया, तो समुंद्री ने मास्टर तारा सिंह सहित 11 कैदियों का नेतृत्व करते हुए दमनकारी शर्तों के तहत आजादी लेने से इंकार कर दिया। इस प्रकार जेल भी सैद्धांतिक प्रतिरोध का एक अखाड़ा बन गई। जुलाई, 1926 में ब्रिटिश हिरासत में मात्र 43 वर्ष की आयु में रहस्यमय परिस्थितियों में उनका निधन हो गया। जनता के आक्रोश ने सरकार को शेष कैदियों को बिना शर्त रिहा करने के लिए मजबूर कर दिया। सिखों को विभाजित करने की कोशिश में, औपनिवेशिक अधिकारियों ने तुरंत एस.जी.पी.सी. चुनावों की घोषणा कर दी। इसके विपरीत, पूरे पंजाब में सार्वजनिक सहानुभूति की एक लहर फैल गई और समुंद्री के सहयोगियों ने भारी बहुमत हासिल किया। इसने साबित कर दिया कि नैतिक अधिकार अक्सर राजनीतिक बल की तुलना में अधिक समय तक टिके रहते हैं।
बाद में ‘अकाली ते परदेसी’ में लिखते हुए, मास्टर तारा सिंह ने उल्लेख किया कि समुंद्री केवल मृत्यु के बाद शहीद नहीं हुए, बल्कि उनका पूरा जीवन ही शहादत का प्रतीक था। उन्होंने उन्हें एक ऐसे व्यक्ति के रूप में चित्रित किया, जो सेवा, भक्ति, ज्ञान, प्रेम और निर्भयता की प्रतिमूर्ति थे-एक ऐसा व्यक्ति, जिसमें कोई द्वेष नहीं था और जिसने अपने लिए कुछ भी रखने से पहले दूसरों को दिया। समुंद्री के लिए, बलिदान कोई एक घटना नहीं, बल्कि जीवन की एक स्थायी स्थिति थी।1923 तक उनका कद इतना बढ़ चुका था कि उन्हें 1842 के बाद पहली बार स्वर्ण मंदिर के सरोवर की कार सेवा शुरू करने के लिए ‘पांच प्यारों’ में से एक के रूप में चुना गया था। उनकी शहादत के बाद, दरबार साहिब परिसर के भीतर ‘तेजा सिंह समुंद्री हॉल’ का नामकरण इस बात की सामूहिक स्वीकृति थी कि कुछ जीवन बिना किसी प्रसिद्धि की चाह के इतिहास को नया आकार देते हैं।-तरणजीत सिंह संधू (अमरीका में पूर्व भारतीय राजदूत)
