आर.टी.आई. एक्ट ने अपनी ‘चमक खो दी’

2020-10-15T02:28:24.78

ठीक 15 वर्ष पूर्व भारतीय नागरिकों को एक ऐसा कानून उपहार में मिला जिसने उनको आर.टी.आई. एक्ट के तहत सरकार से सूचना प्राप्त करने के लिए सशक्त बनाया। इसके पास एक नियत कार्यकाल तथा मुख्य सूचना आयुक्तों तथा सूचना आयुक्तों के लिए सुरक्षित सेवा का प्रावधान है। इसके पास उन सरकारी अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई का प्रावधान भी है जो मांगी गई सूचना के साथ जुडऩा नहीं चाहते। 

एक दशक तक इस कानून ने बेहद अच्छा कार्य किया मगर नरेन्द्र मोदी सरकार के आगमन के साथ इसने अपनी चमक को खोना शुरू कर दिया। पिछले वर्ष जुलाई में कानून में लाए गए संशोधन के तहत सरकार सूचना को बांटना या फिर सवालों के जवाब देना नापसंद करती है। इसने सरकार के साथ एक दांत रहित टाइगर को प्रस्तुत किया जिसकी इस पर पकड़ मजबूत थी। आम लोगों के जीवन में पारदर्शिता लाने के लिए कार्य कर रहे कुछ स्वतंत्र संगठनों ने इस सप्ताह कुछ रिपोर्टें जारी की हैं। उनके अनुसार देश में एक तिहाई सूचना आयोग बिना सिर-पैर के हैं तथा सूचना आयुक्तों के एक चौथाई से भी ज्यादा पद देश में अभी भी खाली पड़े हैं। झारखंड तथा त्रिपुरा में 2 सूचना आयोग निर्जीव हो चुके हैं क्योंकि वहां पर कोई भी सूचना आयुक्त नहीं है। 

9 राज्यों के पास कोई भी प्रमुख सूचना आयुक्त नहीं है। यहां तक कि केंद्र सरकार के लिए प्रमुख सूचना आयुक्त का पद खाली पड़ा है। इन सभी बातों ने सूचना आयोगों के कार्य को धीमा कर रखा है तथा ये आम नागरिक हैं जो विपत्तियां झेलने के लिए बैठे हैं। आर.टी.आई. की प्रसिद्धि इस बात से भी साबित होती है कि इसकी शुरूआत के बाद विभिन्न राज्य आयोगों तथा केंद्रीय सूचना आयोग में 33 मिलियन आवेदन दर्ज किए गए हैं। इनमें से 90 प्रतिशत आवेदनों में अपील नहीं की गई। यह बात प्रकट करती है कि वे लोग अपने पहले आवेदन से संतुष्ट थे। 

विडम्बना देखिए कि भाजपा ने सरकार से सूचना प्राप्त करने के लिए आर.टी.आई. के प्रावधान का बहुत ज्यादा इस्तेमाल किया तथा 2014 के लोकसभा चुनावों के दौरान इसका जमकर इस्तेमाल किया। सत्ता में आने के बाद आर.टी.आई. को भाजपा ने हतोत्साहित करना शुरू कर दिया। मोदी सरकार द्वारा एक्ट में लाए गए संशोधन के कारण प्रक्रिया और ज्यादा आगे धीमी पड़ गई। संशोधित एक्ट ने आर.टी.आई. एक्ट के खंड 13 और 16 में संशोधन किया। मूल एक्ट का खंड 13 केंद्रीय मुख्य सूचना आयुक्त तथा सूचना आयुक्तों का कार्यकाल 5 वर्षों के लिए तय करता है (या फिर 65 साल की आयु प्राप्त करने तक), जो भी पहले हो। अब इसे केंद्र सरकार द्वारा निर्धारित कार्यकाल में बदलाव किया गया है। 

खंड 13 यह भी कहता है मुख्य सूचना आयुक्त के वेतन, भत्ते तथा अन्य सेवा की शर्तें सूचना आयुक्त की तरह ही रहेंगे तथा सूचना आयुक्तों के सेवाकाल की शर्तें चुनाव आयुक्त की तरह रहेंगी। संशोधन के साथ वेतन, भत्ते तथा सेवा की शर्तें (मुख्य सूचना आयुक्त तथा सूचना आयुक्तों की) केंद्र सरकार द्वारा निर्धारित जैसी ही रहेंगी। स्पष्ट तौर पर सरकार ने मूल रूप से कार्यकाल पर नियंत्रण कर सूचना आयुक्तों की भूमिकाओं में बदलाव किया है तथा वेतन, भत्ते तथा सेवा की अन्य शर्तों को तय करने के लिए अधिकार प्राप्त किया है। 

यही नहीं संशोधनों ने निर्देष्ट किया है कि ये शर्तें केंद्र सरकार द्वारा सभी राज्यों के लिए तय की जाएंगी तथा उनकी नियुक्तियां तक केंद्र सरकार द्वारा होंगी। राज्यों की लागत पर केंद्र ने इस प्रावधान को लाकर सरकार के उपायों का विस्तार कर इसे और सुदृढ़ किया है। कृषि क्षेत्र से संबंधित हाल ही के संशोधन से केंद्र ने राज्यों से कई शक्तियां छीन ली हैं। यह मोदी सरकार के सहकारी संघवाद के सिद्धांत के खिलाफ उठाए गए कदम हैं। आंकड़े बताते हैं कि नियुक्तियों के आंकड़ों का बढऩा तथा आवेदनों की गिनती में गिरावट आना एक चमकदार लोकतंत्र के अच्छे संकेत नहीं हैं। चुनाव आयोग, आर.बी.आई., सी.बी.आई., न्यायपालिका, मीडिया और यहां तक कि संसद जैसे संस्थानों की अनदेखी कर सरकार ने आर.टी.आई. एक्ट को एक तगड़ा झटका दिया है।-विपिन पब्बी
 


Pardeep

Related News