संशोधित ई.पी.एफ. सीमा और सामाजिक सुरक्षा प्रणाली का निर्माण
punjabkesari.in Friday, Sep 25, 2026 - 05:42 AM (IST)
विश्वकर्मा जयंती पर, कामगारों और शिल्पकारों का सम्मान करने वाले इस त्यौहार के अवसर पर, सरकार ने कर्मचारी भविष्य निधि संगठन (ई.पी.एफ.ओ.) के लिए वेतन सीमा को 15,000 रुपए से बढ़ाकर 25,000 रुपए प्रति माह करने के बहुप्रतीक्षित फैसले की घोषणा की। 25,000 रुपए की यह वैधानिक वेतन सीमा अनिवार्य ई.पी.एफ., कर्मचारी पैंशन योजना (ई.पी.एस.) और कर्मचारी जमा लिक्ड बीमा (ई.डी.एल.आई.) कवरेज के लिए सीमा का काम करती है।
ये तीनों योजनाएं भारत में वेतनभोगी कर्मचारियों के लिए सामाजिक सुरक्षा ढांचे का मुख्य आधार हैं रिटायरमैंट-आपातकालीन फंड, नियोक्ता के योगदान से वित्त-पोषित पैंशन फंड, जिससे रिटायरमैंट के बाद भुगतान किया जाता है और जीवन बीमा, जो नियोक्ता के योगदान से ही वित्त-पोषित किया जाता है, जिससे कर्मचारी की मृत्यु की स्थिति में उसके परिवार को सहायता मिल सके। पूरी तरह से उचित यही है कि सामाजिक सुरक्षा को साल 2014 से स्थिर किसी आंकड़े पर आधारित न रखा जाए, जबकि इस अवधि के दौरान वेतन, न्यूनतम मजदूरी और रहन-सहन की लागत लगातार बढ़ती रही है।
पिछली वेतन सीमा के तहत, 15,000 रुपए से अधिक मासिक वेतन पर नौकरी शुरू करने वाला कोई भी नया कर्मचारी अनिवार्य ई.पी.एफ. कवरेज से बाहर हो जाता था, ई.पी.एस. के लिए पात्र नहीं होता था और ई.डी.एल.आई. की सुरक्षा से भी वंचित रहता था। किसी मौजूदा कर्मचारी का वेतन समय के साथ इस सीमा से अधिक हो जाने पर कवरेज खत्म नहीं होता था, लेकिन ई.पी.एस. के तहत पैंशन योग्य वेतन 15,000 रुपए पर ही सीमित रहता था। कोई यह तर्क दे सकता है कि अधिक वेतन पाने वाले कर्मचारी इसकी जगह स्वैच्छिक कवरेज का विकल्प चुन सकते हैं। इस तर्क में समस्या यह है कि सीमा से अधिक वेतन पर स्वैच्छिक नामांकन के लिए संयुक्त विकल्प के तहत नियोक्ता की सहमति जरूरी होती है, जिससे यह विकल्प एक निश्चित अधिकार की बजाय सौदेबाजी का विषय बन जाता है। बढ़ी हुई वेतन सीमा के साथ, यह कवरेज ‘हक’ बन जाएगी।
10,000 रुपए का इजाफा भले ही मामूली लगता हो लेकिन अब सामाजिक सुरक्षा ढांचे के दायरे में आने वाले अतिरिक्त 51 लाख कामगारों की संख्या मामूली नहीं है। और ज्यादातर अधिकारों के विपरीत, इस अधिकार का लाभ लेने के लिए कामगार को अपनी तरफ से कुछ भी करने की जरूरत नहीं है। यह बचत करने के लिए कामगार की इच्छा या इच्छा-शक्ति पर निर्भर किए बिना काम करती है। हालांकि, इस संशोधन के साथ नियोक्ताओं के लिए एक लागत भी जुड़ी हुई है। अनिवार्य वेतन सीमा अब बढ़ाकर 25,000 रुपए किए जाने के साथ, नियोक्ताओं को काफी अधिक संख्या में कर्मचारियों को वैधानिक ई.पी.एफ. कवरेज प्रदान करना होगा और उनके मासिक योगदान से संबंधित जिम्मेदारियां भी बढ़ जाएंगी। उदाहरण के लिए, 22,000 रुपए प्रति माह कमाने वाला ऐसा कर्मचारी, जो पहले अनिवार्य कवरेज से बाहर था, अब वैधानिक रूप से ई.पी.एफ. कवरेज के दायरे में आएगा और नियोक्ता के लिए इस कर्मचारी को ई.पी.एफ. कवरेज देना अनिवार्य होगा।
अब नियोक्ता को वेतन का 12 प्रतिशत योगदान देना होगा, जो ई.पी.एस. पैंशन योजना और कर्मचारी के अपने ई.पी.एफ. खाते के बीच विभाजित होगा। यह राशि प्रति कर्मचारी प्रति माह 2,640 रुपए या सालाना 31,680 रुपए होगी। ऐसे 20 कर्मचारियों के मामले में, यह अतिरिक्त पेरोल लागत के रूप में प्रति वर्ष 6,33,600 रुपए होगी। इसके अलावा, ई.डी.एल.आई. बीमा योगदान भी होगा, जो राशि में भले ही छोटा है लेकिन अब इसकी गणना भी अधिक वेतन के आधार पर की जाएगी।
सामाजिक सुरक्षा की अवधारणा यह है कि यह ट्रैम्पोलिन की तरह न केवल आपको संभालती है, बल्कि पुन: उछल कर आगे बढऩे में भी सक्षम बनाती है। इस व्यवस्था का मूल उद्देश्य वर्करों को ऐसा फंड उपलब्ध कराना है, जिससे वे आपात स्थिति के समय या रिटायरमैंट के बाद जरूरत पडऩे पर धन प्राप्त कर सकें। आयुष्मान भारत प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना जैसी पहल, जिन्होंने स्वास्थ्य सेवाओं को अधिक किफायती और सुलभ बनाया है, इस सुरक्षा प्रणाली को और मजबूत करती हैं। बदलते रोजगार के स्वरूप के लिए तैयारी करने के लिए मजबूत औद्योगिक संपर्कों के साथ, कौशल सुधार, री-स्किलिंग और नए कौशल विकास के लिए एक कौशल विकास ईकोसिस्टम का निर्माण किया जा रहा है। अटल पैंशन योजना कंट्रीब्यूटरी पैंशन कवरेज को कम आय वाले वर्ग के उन लोगों तक और आगे बढ़ाती है, जो निवेश जोखिम उठाने और आॢथक तथा बाजार की वृद्धि के लाभों में भागीदार बनने के इच्छुक हैं। (वी. अनंत नागेश्वरन भारत सरकार के मुख्य आॢथक सलाहकार हैं और श्रुति भारतीय आॢथक सेवा की एक अधिकारी हैं।)-वी. अनंत नागेश्वरन और श्रुति सिंह
