कनाडा में रिहायशी स्कूलों की आड़ में नस्लघात

2021-06-19T05:24:59.617

दुनिया में शायद ही कोई ऐसा देश हो जहां शासकों, बस्तीवादियों, तानाशाहों तथा पूंजीपतियों द्वारा नागरिकों पर अमानवीय बर्बरतापूर्ण जुल्म न किए गए हों। मानव स यता के लिए इससे बड़ी शर्मनाक तथा अमानवीय बात क्या हो सकती है कि आज भी यह कार्य खुद को संख्य, मानवाधिकारों के रक्षक, विकसित तथा महाशक्ति कहलाते राष्ट्रों में जारी है, विकासशील तथा पिछड़े अथवा गरीब देशों की बात ही छोड़ो। हद तो तब होती है जब लोकतंत्र का पालना कहलाते देश में ऐसा होता है। 

पिछले दिनों नागरिकों को बढिय़ा सुविधापूर्ण जीवन देने में नंबर-1 स्थान पर आने वाले लोकतांत्रिक देश कनाडा में इसके अतीत के शासकों का सांस्कृतिक तथा नस्लघाती चेहरा बेनकाब होने की अमानवीय तथा बर्बरतापूर्ण घटना ने वैश्विक भाईचारे के दिलों को छेद कर रख दिया है। 

इस देश के ब्रिटिश कोलबिंया राज्य के आदिवासी रिहायशी स्कूल केमलूप से 215 विद्यार्थियों के कंकाल मिले हैं जो इस स्कूल के पूर्व कैथोलिक प्रबंधकों की बर्बरतापूर्ण अमानवीय ज्यादतियों का शिकार होने से मारे गए थे, जिन्हें गुपचुप तरीके से दफना दिया गया था। 

इस बारे आदिवासी फस्र्ट नेशन्स प्रमुख पैरी बैलेगार्ड का कहना था कि केमलूप सिर्फ एक स्कूल है। कभी सारे देश में 130 रिहायशी स्कूल चलते थे। वह पहले भी कह चुके हैं कि ये स्थानीय लोगों की नस्लघात करने वाले स्कूल थे। सैंकड़ों वर्षों से (1831 से) ऐसे स्कूलों के विद्याॢथयों के रिश्तेदार अपने लापता बहन-भाइयों, मित्रों की दास्तानें अक्सर बयां करते रहे हैं।
शायद इन कंकालों की अमानवीय बस्तीवादी नृशंस दास्तां आधुनिक मानव जाति के सामने न आती यदि राडार तकनीक से इसकी खोज न की जाती। 

गुनाह का पर्दाफाश : पैरी बैलेगार्ड में विभिन्न क्षेत्रों के आदिवासी समुदायों के मुखियों, कौंसिल तथा जो लोग इन स्कूलों से जिंदा बच निकले, के साथ बैठक करके सारे देश की सभी रिहायशी कब्रों की पहचान तथा नई राडार तकनीक से खुदाई करके ऐसे आपराधिक गुनाह को बेनकाब करने के लिए कहा है। 

ओंटारियो विधानसभा में एन.डी.पी. नेता  ने कनाडाई समुदाय के बखिए उधेड़ते हुए कहा कि हमारे बच्चों की यह मौत मानवता के विरुद्ध अपराध है, जिसमें इस देश की सब सरकारों को अपनी भूमिका स्वीकारनी पड़ेगी। अलबर्टा से एक बंद रिहायशी स्कूल तथा सस्कैचवन रिहायशी स्कूल लस्टाक से ऐसे कंकाल मिले जिनमें 3 साल के नन्हे बच्चों के भी पिंजर शामिल हैं। 

स्थापना : धार्मिक संस्थाओं द्वारा स्कूल चलाने की प्रथा लगभग 1831 ईस्वी से शुरू हुई मगर विधिवत तौर पर इसकी शुरूआत कनाडा की पहली बस्तीवादी सरकार के प्रधानमंत्री जॉन ए मैकडॉनल्ड ने इंडियन एक्ट के अधीन की। वह आदिवासियों को ‘जंगली लोग’ मानता था जो सुधर नहीं सकते थे। उनकी भाषा, संस्कृति, प्रारंभिक राष्ट्रीय तथा स्थानीय अधिकारों को खत्म करने, उन जंगलियों की भविष्य की नस्लों को खत्म करने के लिए उनको बस्तीवादी राष्ट्रीय मुख्य धारा में लाने के नकाब के अंतर्गत यह विधेयक सांस्कृतिक सुधार विधेयक लाया गया।

कार्यशैली : आदिवासियों के नन्हे बच्चे उनसे जबरदस्ती या सहमति से छीन लिए जाते जिन्हें इन रिहायशी स्कूलों में लाया जाता। शिक्षा प्रदान करने की आड़ में उन पर अमानवीय जुल्म शुरू हो जाते। उनको घटिया खाना-पीना, पहरावा दिया जाता। पिटाई, मानसिक तथा शारीरिक शोषण किया जाता। इन लगभग 130 स्कूलों में आदिवासी लोगों से छीन कर करीब डेढ़ लाख बच्चे बर्बाद किए गए। यह जानलेवा नीति एक के बाद दूसरे प्रधानमंत्री ने जारी रखी। 20वीं शताब्दी के शुरू में चीफ मैडीकल ऑफिसर पीटर ब्राइस ने इन बच्चों की बीमारियों, शोषण, मौतों, शारीरिक यातनाओं का सनसनीखेज भेद खोला। इसके बावजूद गुनाह जारी रहे। 1975 तक ऐसे स्कूल खुलते रहे। 1996 में आखिरी स्कूल पिनाइची सस्कैचवन बंद हुआ।

सच तथा सुलह कमिशन : जब ऐसे स्कूलों में बच्चों के अत्यंत शोषण तथा मौतों के केस मीडिया तथा अन्य जानकारियों के माध्यम से सामने आने लगे तो कनाडा सरकार ने अंतर्राष्ट्रीय बदनामी के डर से 2008 में एक सच तथा सुलह कमिशन गठित किया। 6 साल जारी जांच में इस तीन सदस्यीय कमिशन के सामने गवाहियों के लिए 6500 लोग पेश हुए। 2015 में 266 पृष्ठों की रिपोर्ट ने करीब 6000 बच्चे मारे गए बताए। एक सदस्य के अनुसार यह गिनती 15000 हो सकती है। मगर यह तो केवल बर्फ के तोदे जैसी केवल थोड़ी-सी चोटी की तरह है। इस समस्या के समाधान हेतु 94 सिफारिशें की गईं जिनमें से अब तक केवल लगभग 8 लागू की गई हैं।-दरबारा सिंह काहलों


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Content Writer

Pardeep

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