डिजिटल मीडिया के लिए प्रस्तावित कानून और चुनौतियां

punjabkesari.in Monday, Nov 28, 2022 - 05:48 AM (IST)

केन्द्रीय सूचना एवं प्रसारण मंत्री अनुराग ठाकुर ने कहा है कि डिजिटल मीडिया को रैगुलेट करने के लिए केन्द्र सरकार एक नया कानून बना रही है। इसके तहत समाचार पत्रों के रजिस्ट्रेशन की प्रक्रिया को भी आसान बनाया जाएगा। प्रिंट मीडिया के रजिस्ट्रेशन और नियमन को आसान बनाने के लिए तीन साल पहले नवम्बर 2019 में सरकार ने प्रैस एंड पीरियोडिकल्स रजिस्ट्रेशन बिल का ड्राफ्ट पेश किया था लेकिन उस पर ज्यादा काम नहीं हो सका। 

कोई भी कानून बनाने के पहले यह समझना जरूरी है कि संविधान के अनुच्छेद-19 के तहत जनता के साथ मीडिया को भी अभिव्यक्ति की आजादी हासिल है। लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहलाने वाले मीडिया के चार प्रमुख माध्यम हैं। पिं्रट, टी.वी., डिजिटल और सोशल मीडिया। प्रिंट मीडिया यानी अखबार, मैगजीन और किताबों के लिए अंग्रेजों के समय सन् 1867 में कानून बना था। 

करीब दो शताब्दी पुराना यह कानून जटिल होने के साथ सरकारी हस्तक्षेप को बढ़ावा देता है। एमरजैंसी के दौरान मीडिया का जो दमन हुआ, उसे भविष्य में दोहराने से रोकने के लिए जनता सरकार ने प्रैस कौंसिल का कानून बनाया। राजीव गांधी के पी.एम. काल में देश में टी.वी. का आगमन हुआ। उसके बाद टैलीविजन मीडिया के नियमन के लिए 1995 में केबल टी.वी. का कानून बना। 21वीं सदी में डिजिटल जगत के लिए सन 2000 में आई.टी. एक्ट बनाया गया। उसके तहत डिजिटल मीडिया के नियमन के लिए सन् 2021 में एथिक्स कोड बनाए गए हैं। 

डिजिटल मीडिया में अफवाह और दुष्प्रचार रोकने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने भी सख्त रैगुलेटर का कानून लाने का सुझाव दिया। लेकिन सभी प्रकार के मीडिया को कानून के एक डंडे से हांकना मुश्किल है। ऐसे अनेक असमंजस की वजह से मीडिया के सभी प्लेटफाम्र्स के लिए कॉमन रैगुलेटर की नियुक्ति नहीं हो पाई। लेकिन प्रिंट मीडिया के लिए कानूनों की सख्त जकडऩ और डिजिटल मीडिया के लिए खुला आसमान रखना संविधान की समानता के सिद्धांत के खिलाफ है। इन संवैधानिक बिन्दुओं पर विचार करते हुए ही डिजिटल मीडिया के लिए नया कानून बनाने की जरूरत है। 

डिजिटल मीडिया के लिए एथिक्स कोड : केंद्र सरकार ने डाटा सुरक्षा कानून का जो नया मसौदा जारी किया है, उसमें डिजिटल मीडिया के नियमन के लिए विशेष प्रावधान नहीं है। डिजिटल कंपनियों का नियमन केन्द्र सरकार का आई.टी. मंत्रालय करता है। लेकिन डिजिटल मीडिया के नियमन के लिए सूचना और प्रसारण (I&K) मंत्रालय को अधिकार दिए गए हैं। मंत्रालय की नई सुपरवाइजरी व्यवस्था को लागू करने के लिए सरकारी कामकाज के नियमों में बदलाव पहले ही किए जा चुके हैं। उसके बाद पिछले साल फरवरी 2021 में इंटरमीडियरी कम्पनियों के लिए आईटी रुल्स नोटिफाई किए थे। इन नियमों के तीसरे खंड में डिजिटल मीडिया के लिए एथिक्स कोड और नियमावली बनाई गई है। एथिक्स कोड में प्रकाशकों के लिए स्व:नियमन की व्यवस्था के साथ केन्द्र सरकार की भी भूमिका का निर्धारण है। आपत्तिजनक कंटैंट को हटाने और शिकायत निवारण के लिए भी नियमावली बनाई गई है। 

डिजिटल मीडिया के ऊपर अभी कोई भी कानूनी व्यवस्था लागू नहीं है? इसलिए इन नियमों और एथिक्स कोड को मीडिया की आजादी का उल्लंघन माना जा रहा है। इस नियमन को संविधान विरुद्ध मानते हुए अदालतों में चुनौती भी दी गई है, जिन पर कई हाईकोर्टों में सुनवाई हो रही है। इसकी वजह से एथिक्स कोड के सभी पहलुओं को अभी तक प्रभावी तौर लागू नहीं किया जा सका है। 

विदेशी टेक कम्पनियों के साथ ऐड आमदनी का बंटवारा : बिजनैस स्टैंडर्ड की नई रिपोर्ट के अनुसार विज्ञापन की आमदनी के लिहाज से मेटा कम्पनी भारत में सबसे बड़ा मीडिया प्लेटफार्म है। मेटा की पैंरेंट कम्पनी के दायरे में फेसबुक, इंस्टाग्राम और व्हाट्सअप जैसे लोकप्रिय प्लेटफार्म आते हैं। यू-ट्यूब की मालिकाना हक वाली गूगल कंपनी इस लिस्ट में चौथे पायदान पर है। खुद को सोशल मीडिया कहलाने वाली ये कम्पनियां ई-कॉमर्स, मीडिया और बैंकिंग समेत सभी सैक्टर्स में कारोबार कर रही हैं। पिं्रट और टी.वी. मीडिया को कंटैंट क्रिएटर माना जा सकता है।

वहां मेहनत और लगन से कुशल पत्रकारों और संपादकों की टीम बेहतरीन कंटैंट को क्रिएट करती हैं। मीडिया के समाचारों, रिपोर्टों और वीडियोज को शेयर करके बड़ी टेक कम्पनियां भारी आमदनी और मुनाफा कमा रही हैं। मीडिया को आजाद और मजबूत रखने के लिए सरकारी विज्ञापन से मुक्ति मिले, जिसके लिए उनकी आमदनी बढऩा जरूरी है। प्रिंट, टी.वी. और डिजिटल मीडिया की लम्बे अर्से से यह मांग है कि मेटा और गूगल जैसी कंपनियों की भारत से हो रही आमदनी में मीडिया कंपनियों की शेयरिंग हो। लेकिन बड़ी टेक कम्पनियां सरकारों को टैक्स भुगतान और मीडिया के साथ रेवन्यू शेयरिंग से बचना चाहती हैं। 

टेक कंपनियों की माया और मकडज़ाल में पूरी दुनिया आ गई है। इन कम्पनियों को कानून के दायरे में लाने के लिए आस्ट्रेलिया, जर्मनी, फ्रांस और कनाडा जैसे कई देशों में सख्त कानून बनाने के साथ प्रभावी रैगुलेटर की नियुक्ति भी हो रही है। लेकिन भारत में इस बारे में पिछले कई सालों से सिर्फ बहस ही हो रही है। प्रस्तावित कानून में इन सभी पहलुओं पर प्रभावी प्रावधान हों तो सही अर्थों में मीडिया की आजादी सुनिश्चित हो सकेगी।-विराग गुप्ता(एडवोकेट, सुप्रीम कोर्ट)
 


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