पहले सत्ता लोगों से डरती थी, अब लोग सत्ता से

punjabkesari.in Monday, Feb 02, 2026 - 03:47 AM (IST)

एक समय था, ज्यादा पुरानी बात नहीं, जब राजनेता बिना किसी चेतावनी के बाजारों में चले आते थे। जब एक जिला कलैक्टर बस स्टैंड पर खड़ा होता था। जब किसी मंत्री की गाड़ी लाल बत्ती पर बाकी सब की तरह इंतजार करती थी। सत्ता का अस्तित्व था, लेकिन उसे अपनी मौजूदगी का ऐलान करने के लिए सायरन की जरूरत नहीं थी। लोग उस समय को सिर्फ पुरानी यादों के तौर पर नहीं, बल्कि एक चाहत के साथ याद करते हैं। क्योंकि तब सत्ता करीब महसूस होती थी, ज्यादा मानवीय और कम डराने वाली।

जब कोविड आया, तो कई लोगों को लगा कि वह पल फिर से लौट आया है। सड़कें खाली थीं। सायरन खामोश हो गए। लाल बत्तियां हटा दी गईं। काफिले गायब हो गए। नेताओं ने सादगी, समानता और सांझा दुख की बात की। वादे किए गए-कि कोई सड़क नहीं रोकी जाएगी, कोई वी.आई.पी. कल्चर नहीं होगा, सुरक्षा का कोई नाटक नहीं होगा।  और फिर, धीरे-धीरे और उम्मीद के मुताबिक, वह सब वापस आ गया। आज, वह नजारा फिर से जाना-पहचाना है-पायलट कारें, पुलिस के वाहन, चमकती लाइटें, अचानक सड़कों का बंद होना और मामूली पदाधिकारियों के लिए भी लंबे काफिले। नौकरशाह, जो कभी खुद गाड़ी चलाते थे, अब अंगरक्षकों के साथ चलते हैं। सादगी की बात करने वाले राजनेता 10 गाडिय़ों के साथ आते हैं। कोविड ने वी.आई.पी. कल्चर का इलाज नहीं किया, बस उसे कुछ देर के लिए रोक दिया था।
असहज करने वाला सवाल यह है-क्या वह पुराना, सरल समय कभी लौटेगा? ईमानदार जवाब यह है कि सत्ता, जिसका स्वाद एक बार चख लिया जाए, वह खुद से कभी विनम्र नहीं होती। सुरक्षा सिर्फ इसलिए नहीं बढ़ी क्योंकि खतरे बढ़ गए। यह इसलिए बढ़ी क्योंकि ‘हक जताने’ की भावना बढ़ गई। सत्ता की हर परत यह मानने लगी कि वह सुरक्षा, प्राथमिकता और रास्ता साफ पाने की हकदार है। जब एक व्यक्ति के लिए सड़कें रोकी जाती हैं, तो हजारों लोगों को पदानुक्रम में उनकी जगह याद दिलाई जाती है। जब काफिले को निकालने के लिए एम्बुलैंस फंस जाती है, तो जनता का गुस्सा चुपचाप पनपता है। जब राजनेता बिना सुरक्षा परतों के लोगों के बीच नहीं चल सकते, तो विश्वास कम हो जाता है। सिस्टम नागरिकों से कहता है कि वह समानता में विश्वास रखता है लेकिन उसके कार्य कुछ और ही कहते हैं।

क्या यह कभी बदलेगा? यह बदल सकता है लेकिन केवल दबाव में, सद्भावना से नहीं। बदलाव इसलिए नहीं आएगा कि नेता अचानक विनम्र हो जाएंगे। यह केवल तभी आएगा जब मतदाता लगातार फिजूलखर्ची को दंडित करेंगे, जब अदालतें सुरक्षा श्रेणियों को सख्ती से सीमित करेंगी, जब मीडिया काफिलों का महिमामंडन करना बंद कर देगा, और जब नागरिक वी.आई.पी. आवाजाही के कारण होने वाली असुविधा को सामान्य मानना बंद कर देंगे। कुछ राज्यों ने सुरक्षा सूचियों में कटौती करने की कोशिश की है। कुछ नेताओं ने जानबूझकर अपने तामझाम को कम किया है। लेकिन ये  अपवाद हैं, नियम नहीं। 

सच्चाई कड़वी है : वी.आई.पी. कल्चर इसलिए जीवित है क्योंकि समाज इसे सहन करता है। हम निजी तौर पर शिकायत करते हैं लेकिन सार्वजनिक रूप से पालन करते हैं। हम अपने जीवन को ढाल लेते हैं और सिस्टम इस खामोशी को सहमति मान लेता है। अकेले चलते हुए राजनेता की पुरानी छवि इसलिए काम करती थी क्योंकि तब सत्ता लोगों से डरती थी। आज, लोग सत्ता से डरते हैं। यही असली बदलाव है। क्या इसे बदला जा सकता है? शायद, लेकिन केवल तभी, जब सत्ता को सायरन और बैरिकेड्स के माध्यम से मांग करने की बजाय फिर से सम्मान अर्जित करने के लिए मजबूर किया जाए। केवल तभी, जब सार्वजनिक सेवा फिर से सेवा लगे, राजशाही नहीं। साथ ही, इन नए ‘बनने की चाह रखने वाले’ राजनेताओं की असुरक्षा भी है, जिन्हें तभी पहचाना जाएगा जब उनके साथ 6 बॉडीगार्ड हों। यह तब होता है, जब आप एक हलचल पैदा करना चाहते हैं कि ‘मैं आ गया हूं।’ यह अद्भुत है कि कुछ शक्तिशाली और सरल मंत्री अभी भी अपने साथ किसी को लेकर नहीं चलते।
तब तक, काफिले लंबे होते रहेंगे, लाल 
बत्तियां चमकती रहेंगी और सड़कें रुकती रहेंगी 
और हम चुपचाप पूछते रहेंगे-शासकों ने हमारे 
बीच चलना कब बंद कर दिया और हमारे ऊपर 
से गुजरना कब शुरू कर दिया?

वह सवाल, किसी भी सायरन से ज्यादा, सत्ता में बैठे लोगों को चिंतित करना चाहिए। 2014 में जब नई सरकार ने शपथ ली थी, तो हमने सुना था कि कोई सायरन नहीं होगा, कोई लाल बत्ती नहीं होगी, सुरक्षा गार्ड नहीं होंगे लेकिन कहीं न कहीं कुछ गलत हो गया है। असली राजनेता के लिए असली खतरा समझ में आता था लेकिन अब यह ‘अराइव्ड सिंड्रोम’ (पहुंच जाने का भ्रम) बन गया है-बॉडीगार्ड लो, बिजनैस एस्टैब्लिशमैंट और वी.आई.पी. सिंड्रोम दरअसल आम आदमी के लिए एक उत्पीडऩ है। सबसे बढ़कर, हम अक्सर ऐसे धोखेबाजों और व्यक्तियों को देखते हैं, जो अभी-अभी जेल से बाहर आए हैं और इन निजी सुरक्षा गार्डों के साथ घूमते हैं। यह एक बहुत ही दुखद मजाक है।-देवी एम. चेरियन


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