देश की राजनीति जाति, समुदाय की ‘संकीर्ण रेखाओं’ पर बंट कर रह गई

2020-01-03T01:52:28.81

 

 

देश की राजनीति जाति, समुदाय की ‘संकीर्ण रेखाओं’ पर बंट कर रह गई देश की राजनीति, सीडीएस, विपिन राबत, संकीर्ण रेखाओं, जवाहर लाल नेहरू यह एक संतुष्टिदायक बात है कि जनरल बिपिन रावत को मोदी सरकार ने भारत का प्रथम चीफ ऑफ डिफैंस स्टाफ (सी.डी.एस.) नियुक्त किया है। एक ऐसा पद जिसका मतलब राजनीतिक नेतृत्व के साथ-साथ तीनों सेनाओं को दिए जाने वाले सैन्य परामर्श की गुणवत्ता को बढ़ाना है। देश के सैन्य इनपुट्स में एक बड़े अंतर को भरा जा सकेगा। हमें प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का धन्यवाद करना होगा जिन्होंने अपने 4 वर्ष पुराने वायदे को पूरा किया।

हालांकि मैं जनरल रावत के कुछ दिन पूर्व नागरिकता संशोधन कानून केखिलाफ आगजनी तथा हिंसा और विश्वविद्यालयों तथा कैम्पस के प्रदर्शनकारी छात्रों की पृष्ठभूमि में दिए गए राजनीतिक बयान से विचलित हूं। जनरल रावत का बयान यह दर्शाता है कि वह सत्ताधारी पार्टी को अपनी राजनीतिक निष्ठा दिखाना चाहते हैं।

26 दिसम्बर को रावत ने कहा था, ‘‘नेता ऐसे नहीं हैं जो लोगों का अनुचित दिशाओं में नेतृत्व करते हैं जैसा कि हम यूनिवर्सिटियों में देख रहे हैं। ये नेता लोगों की भीड़ को शहरों तथा कस्बों को आगजनी तथा हिंसा में लपेटने के लिए उनका नेतृत्व कर रहे हैं। इस बयान ने विपक्षी नेताओं को मौका दे दिया। रावत का राजनीतिक बयान स्पष्ट तौर पर प्रधानमंत्री मोदी का अपनी ओर ध्यान आकॢषत करना था। जनरल बिपिन रावत को उनको सौंपे गए नए कार्य के लिए शुभकामनाएं देते हैं। रावत 4 स्टार जनरल हैं जिन्हें तीनों सेना प्रमुखों जैसी तनख्वाह तथा अन्य भत्ते दिए जाएंगे।’’ उनके पास 3 वर्षों के लिए अपने बलों पर नियंत्रण रहेगा। 

राष्ट्रीयता की मूल भावना की कमी
मुझे एक प्रश्र विचलित करता है कि भारत एक राष्ट्र के तौर पर ज्यादा जोडऩे वाले तौर-तरीकों पर कार्य क्यों नहीं कर सकता? क्यों हमारी राजनीति जाति, समुदाय, संकीर्ण राजनीतिक रेखाओं जैसे मुद्दों पर बंटी हुई है? क्यों लोगों के पास राष्ट्रीयता की मूल भावना की कमी है? यह प्रश्र सी.ए.ए., एन.आर.सी. तथा एन.पी.आर. को लेकर है। अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में 1200 लोगों पर कार्रवाई की गई जोकि कैंडल लाइट प्रदर्शन कर रहे थे। इसके साथ-साथ केवल यू.पी. में ही 21 लोगों की गोलीबारी से मौत भी बेचैन कर देती है। इसने पुलिस की ज्यादतियों को दर्शाया है। एक स्पष्ट बात थी कि यू.पी. के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ सरकार के अधीन भरोसे का अंतर उभर कर सामने आया है। छात्रों के कष्ट, अराजकता तथा आर्थिक तबाही को भी देखा गया है। इस बात पर ध्यान देने की जरूरत है कि भारत की आर्थिक मंदी के आकार को केन्द्रीय नेताओं द्वारा गम्भीरता से लिया गया है। भारत को तीव्र गति की आर्थिक ग्रोथ की जरूरत है। युवाओं के लिए नौकरियां तलाशने की जरूरत है न कि कुछ गिने-चुने साम्प्रदायिक लोगों पर पुलिस कार्रवाई की।

मुश्किल यह है कि हम राष्ट्रवाद तथा धर्मनिरपेक्षता की बात करते हैं। हम प्रगति विरोध में शामिल हो जाते हैं। यह बात देश के सामाजिक तथा राजनीतिक जीवन पर फटकार है। मैं भारत के महान मुस्लिम नेताओं में से एक मौलाना अबुल कलाम आजाद की बात को दोहराना चाहता हूं जिन्होंने अपनी आत्मकथा ‘इंडिया विन्स फ्रीडम’ में कहा था, ‘‘यह सत्य है कि इस्लाम ने ऐसे समाज को मांगना चाहा जो जातीय बोली, आॢथक तथा राजनीतिक सीमाओं का अतिक्रमण करना चाहता है। इतिहास ने साबित किया है कि पहली सदी के बाद इस्लाम सभी मुस्लिम देशों को केवल इस्लाम के आधार पर एक राष्ट्र में पिरोने के काबिल नहीं हुआ। ऐसी हालत आज भी है।’’ 

मुसलमानों का बड़ा वर्ग असुरक्षा तथा उत्सुकता से पीड़ित
हमें यह ध्यानपूर्वक मानने की जरूरत है कि मुसलमानों का एक बड़ा वर्ग वास्तव में असुरक्षा तथा उत्सुकता से पीड़ित है। ऐसा मजहब जो उलेमा के सुर में सुर मिलाता है। किसी बदलाव के लिए यह निश्चित है कि सामाजिक तथा राजनीतिक नेता शिक्षित उदारवादी मुसलमानों के साथ मिल कर अपने समुदाय के कल्याण तथा उनके उत्थान का कार्य करें। नहीं तो हम ओसामा बिन लादेन जैसे कितने और लोग देखेंगे।

विडम्बना देखिए अल्पसंख्यक अलगाव की भावना तथा वोट बैंक का विचार ज्यादातर राजनीतिक नेताओं के मन में समाया है। यहां तक कि राष्ट्रीय सौहार्द के लक्ष्य का भी गम्भीर होकर पीछा नहीं किया जाता। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से भिन्न भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पं. जवाहर लाल नेहरू भारतीय जटिलताओं के प्रति जागरूक थे। अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के छात्रों को सम्बोधित करने के दौरान उन्होंने घोषणा की कि मैंने कहा था कि हमारी विरासत तथा हमारे पूर्वज जिन्होंने भारत को बुद्धिजीवी तथा सांस्कृतिक प्रख्यात लोग दिए उसके लिए मैं अपने आप को गौरवान्वित समझता हूं। उन्होंने छात्रों से कहा कि आप पूर्व के बारे में क्या सोचते थे। क्या आप यह सोचते हो कि आप इसका हिस्सा तथा इसके उत्तराधिकारी हो। इसलिए उस चीज के लिए गर्व महसूस करो जो आपका है उतना ही मेरा भी है या आप अपने आपको पराया या अजनबी समझते हो। यहां पर इस सवाल का कोई निश्चित जवाब नहीं।

यहां पर नेहरू के शब्दों का स्मरण करना समझने लायक है। उन्होंने कहा था कि अन्य धर्मों में परिवर्तित होना किसी एक की विरासत से वंचित होना नहीं है। ग्रीस वासियों तथा रोमन्स की मिसाल है कि उन लोगों ने ईसाई धर्म अपनाने के बाद अपने पूर्वजों की शानदार जीतों के गौरव को नहीं भुलाया। ये मुद्दे हालांकि इतने साधारण नहीं जैसा नेहरू ने उन्हें रखा था। ये जटिल हैं और यहां दिक्कत मुसलमानों की दिमागी सोच की है।

गुरु रबीन्द्रनाथ टैगोर का कहना था कि हम अन्यों की विरासत से नहीं बल्कि अपनी विरासत के साथ विश्व में एक सच्चा स्थान खरीद सकते हैं। यकीनन वर्तमान की दुविधा को देखते हुए यह मुमकिन नहीं। कुछ चुनिंदा राजनीतिज्ञों ने राजनीति में एक दिमागी अवरोध तथा दुविधा को बना रखा है। अभी भी यहां पर सांस्कृतिक संयोग की जगह है। आतंक के खिलाफ लड़ाई का एक आम मुद्दा भारतीय भावना का हिस्सा हो सकता है, जिसमें सभी समुदाय शामिल हों। वास्तव में भारतीय परम्परा के सार को धार्मिक असहिष्णुता के बिना मन में बैठाया जा सकता है। इसका राजनीतिकरण नहीं होना चाहिए।

हमारे नेतृत्व के समक्ष मुख्य चुनौती आम मुद्दों के प्रति प्रतिबद्धता के साथ-साथ धर्मनिरपेक्षता के आधार को मजबूत करने की है। इसमें आतंक के खिलाफ लड़ाई भी शामिल है। मैं खुश हूं कि नए सेना प्रमुख जनरल मनोज मुकुंद नरवाणे अपने उद्देश्यों के प्रति स्पष्ट हैं। पाकिस्तान को चेतावनी देते हुए उन्होंने कहा कि सीमा पार पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद को यदि रोका नहीं गया तो उन पर हल्ला बोलने का अधिकार उनके पास सुरक्षित है। यह भी महत्वपूर्ण बात है कि जनरल नरवाणे ने यह भी कहा कि चीन से लगती सीमाओं के साथ भारतीय सेना अपनी क्षमताओं को बढ़ाएगी। मैं जनरल की नई सोच का स्वागत करता हूं।-हरि जयसिंह


Pardeep

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