सत्ता के फाइनल की मोर्चाबंदी में जुटे राजनीतिक दल

punjabkesari.in Saturday, Dec 23, 2023 - 06:10 AM (IST)

सैमीफाइनल समाप्त होते ही सत्ता के खिलाड़ी फाइनल की तैयारी में जुट गए हैं। शीतकालीन सत्र में रिकॉर्ड संख्या में विपक्षी सांसदों के निलंबन से गरमाई राजनीति के बीच ही 28 दलों के विपक्षी गठबंधन ‘इंडिया’ की बैठक हो चुकी है तो कांग्रेस कार्य समिति भी आगामी लोकसभा चुनावों पर चिंतन कर चुकी है। सत्तारुढ़ एन.डी.ए. गठबंधन की अग्रणी भाजपा तो हमेशा चुनावी मोड में रहती ही है। जाहिर है, हिंदीभाषी तीन बड़े राज्यों-राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ के विधानसभा चुनावों में जीत के बाद भाजपा के हौसले आसमान छू रहे हैं, लेकिन विपक्ष के पास भी हताशा से उबर कर हार की समीक्षा करते हुए और बड़ी चुनावी जंग के लिए तैयार होने के अलावा कोई विकल्प नहीं है। 

19 दिसंबर की बैठक में तृणमूल कांग्रेस अध्यक्ष ममता बनर्जी ने तो कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे को आगामी लोकसभा चुनाव में पी.एम. फेस बनाने का सुझाव भी दे दिया।  ‘आप’ के संयोजक अरविंद केजरीवाल और शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे ने इसका समर्थन भी किया, पर समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव और बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार चुप ही रहे। इस चुप्पी के अपने-अपने नजरिए से अर्थ निकाले जा रहे हैं, पर खुद खरगे ने बाद में पत्रकारों से कहा कि प्रधानमंत्री का फैसला चुनाव के बाद होगा, जब विपक्ष के पास बहुमत का आंकड़ा होगा। बेशक तकनीकी रूप से खरगे सही हैं।

विपक्ष को बहुमत मिलेगा, तभी तो प्रधानमंत्री चुनने की जरूरत होगी, लेकिन नरेंद्र मोदी का चेहरा जिस तरह भाजपा की सबसे बड़ी चुनावी ताकत बना हुआ है, उसे चुनौती देना भी विपक्ष की चुनावी रणनीति की प्राथमिकताओं में होना चाहिए। दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल यह समझ रहे हैं, तो उसके भी अपने कारण हैं। लोकसभा में फिलहाल ‘आप’ का मात्र एक सांसद है। जिस दिल्ली और पंजाब में आप सत्ता में है, वहां से कुल मिला कर 20 ही सांसद चुने जाते हैं।

गठबंधन के बावजूद ‘आप’ वहां से उससे तो कम ही सीटें जीत पाएगी? फिर शराब घोटाले में कसते शिकंजे के चलते मुख्यमंत्री पद पर ही खतरे के बादल मंडरा रहे हैं। जाहिर है, केजरीवाल प्रधानमंत्री पद के दावेदार नहीं हो सकते। उनके समर्थन का दूसरा कारण चुनावी रणनीति भी है। केजरीवाल समझ रहे हैं कि हाल के विधानसभा चुनावों के बाद मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में नई सरकार गठन के जरिए भाजपा ने सामाजिक समीकरणों की जैसी चुनावी बिसात बिछाई है, उसकी काट किए बिना उसे चुनौती दे पाना संभव नहीं होगा।

दक्षिण भारत से आने वाले दलित वर्ग के अनुभवी नेता खरगे को पी.एम. फेस बना कर भाजपा को वह चुनौती देने की कोशिश की जा सकती है। इससे दक्षिण भारत और दलित वर्ग को प्रधानमंत्री पद मिलने का संदेश जाएगा। दक्षिण भारत से लोकसभा के 130 सांसद चुने जाते हैं, जबकि दलित वर्ग से अभी तक कोई प्रधानमंत्री नहीं बना है। अगर भाजपा को पहले दलित और फिर आदिवासी समुदाय से राष्ट्रपति बनाने का चुनावी लाभ मिल सकता है तो विपक्ष देश को पहला दलित प्रधानमंत्री देने का चुनावी दांव क्यों नहीं चल सकता? देश में दलित आबादी लगभग 20 प्रतिशत है। जाहिर है, ‘इंडिया’ और एन.डी.ए. से समान दूरी की बात करने वाली बहुजन समाज पार्टी की प्रमुख मायावती को भी, दलित प्रधानमंत्री के दांव के बाद अपनी रणनीति पर पुर्नविचार करना पड़ेगा।

हाल के विधानसभा चुनाव बताते हैं कि दलीय लोकतंत्र में भी तमाम मुद्दों पर मोदी का चेहरा भारी पड़ रहा है। ऐसे में उस चेहरे को चुनावी चुनौती देने का साहस विपक्ष को जुटाना ही चाहिए। इसमें दो राय नहीं कि विपक्षी गठबंधन में अनेक अनुभवी नेता हैं, जिनकी प्रधानमंत्री बनने की महत्वाकांक्षा भी हो सकती है, लेकिन यह एक व्यावहारिक सच है कि इस बुरे वक्त में भी कांग्रेस 50 से ज्यादा लोकसभा सांसदों के साथ सबसे बड़ा विपक्षी दल है। अगले चुनाव में उसके सांसद घटने की आशंका का  कोई आधार नजर नहीं आता।

ऐसे में अगर खुद कांग्रेस दुविधा की शिकार न हो, तो गठबंधन को खरगे को पी.एम. फेस बनाने पर गंभीरता से विचार करना चाहिए। परस्पर शह-मात के खेल में ‘इंडिया’ गठबंधन के घटक दल तीन महीने बर्बाद कर चुके हैं। अगले लोकसभा चुनाव तय समय पर भी हों, तो उनमें 3 महीने से ज्यादा समय नहीं बचा है। शीतकालीन सत्र में रिकार्ड संख्या में विपक्षी सांसदों के निलंबन से साफ है कि लोकसभा चुनाव बेहद टकरावपूर्ण माहौल में आक्रामक प्रचार के साथ लड़ा जाएगा। ऐसे में विपक्षी गठबंधन को बिना वक्त गंवाए संयोजक, सीट बंटवारा, संयुक्त चुनावी रणनीति और न्यूनतम सांझा कार्यक्रम जैसे मुद्दों पर सहमति बना कर आगे बढऩा चाहिए।

पिछले लोकसभा चुनाव में भाजपा को 45 प्रतिशत के आसपास ही वोट मिला था। इसलिए विपक्ष जितनी ज्यादा सीटों पर उसके विरुद्ध सांझा उम्मीदवार उतार पाएगा, उतनी ही उसकी चुनावी संभावनाएं बेहतर हो जाएंगी। बेशक कांग्रेस के अलावा भी सभी क्षेत्रीय दलों के अपने-अपने राजनीतिक हित हैं, पर उन्हें यह समझना पड़ेगा कि वे लगातार तीसरा लोकसभा चुनाव एकतरफा हारने का जोखिम मोल नहीं ले सकते। इसलिए जीत ही एकमात्र लक्ष्य होनी चाहिए फिर भले ही उसके लिए  उन्हें परस्पर कितना ही राजनीतिक त्याग क्यों न करना पड़े। -राज कुमार सिंह


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