पेगासस जासूसी कांड नया नहीं है

2021-07-24T04:56:33.003

पेगासस जासूसी को लेकर भारत सहित विश्वभर में मचा हंगामा स्वाभाविक है। वैसे पेगासस जासूसी का मामला 2019 में ही सामने आ गया था। व्हाट्सएप ने अमरीका के कैलिफोर्निया के एक न्यायालय में इस सॉफ्टवेयरको बनाने वाली इसराईली कंपनी एन.एस.ओ. के खिलाफ मुकद्दमा दायर किया था। तत्कालीन सूचना तकनीक मंत्री रविशंकर प्रसाद ने अक्तूबर 2019 में ही बाजाब्ता ट्विटर पर व्हाट्सएप से इसके बारे में जानकारी मांगी थी। यह अलग बात है कि उसके बाद आगे इस पर काम नहीं हुआ। 

इसराईली कंपनी एन.एस.ओ. का कहना है कि वह केवल सरकारी एजैंसियों, सशस्त्र बलों को ही पेगासस बेचती है। यह सच है तो जहां भी जासूसी हुई उसके पीछे सरकारी एजैंसियों की ही भूमिका होगी। पहले एमनेस्टी इंटरनैशनल और फिर फॉरबिडन स्टोरीज की ओर से दावा किया गया था कि एन.एस.ओ. के फोन रिकॉर्ड का सबूत उनके हाथ लगा है, जिसे उन्होंने भारत समेत दुनियाभर के कई मीडिया संगठनों के साथ सांझा किया था। 

एमनेस्टी इंटरनैशनल का बयान था कि उसकी सिक्योरिटी लैब ने दुनिया भर के मानवाधिकार कार्यकत्र्ताओं और पत्रकारों के कई मोबाइल उपकरणों का गहन फॉरैंसिक विश्लेषण किया है। उसके शोध में यह पाया गया कि एन.एस.ओ. ग्रुप ने पेगासस स्पाईवेयर के जरिए मानवाधिकार कार्यकत्र्ताओं और पत्रकारों की व्यापक, लगातार और गैर-कानूनी तरीके से निगरानी की है। अब मीडिया में एमनेस्टी  इंटरनैशनल का बयान आया है कि उसने कभी यह दावा किया ही नहीं कि यह सूची एन.एस.ओ. से संबंधित थी। इसके अनुसार इस सूची को एन.एस.ओ. पेगासस स्पाईवेयर सूची के तौर पर प्रस्तुत नहीं किया गया। यह सूची कंपनी के ग्राहकों के हितों की सूचक है। सूची में वो लोग शामिल हैं, जिनकी जासूसी करने में एन.एस.ओ. के ग्राहक रुचि रखते हैं। 

इसके बाद निश्चित रूप से केवल भारत ही नहीं पूरी दुनिया को यह विचार करना होगा कि हम एमनेस्टी इंटरनैशनल के पहले के बयान को सच मानें या जो वह अब कह रहा है सच्चाई उसमें है? वैसे एन.एस.ओ. ने इसे एक अंतर्राष्ट्रीय साजिश कह दिया है। भारत सरकार या भारत सरकार से जुड़ी किसी अन्य संस्था द्वारा उसके सॉ टवेयर की खरीदी संबंधी प्रश्न पर एन.एस.ओ. का जवाब है कि हम किसी भी कस्टमर का जिक्र नहीं कर सकते। जिन देशों को हम पेगासस बेचते हैं, उनकी सूची एक गोपनीय जानकारी है। एन.एस.ओ. कह रही है कि इस सूची में से कुछ तो हमारे ग्राहक भी नहीं हैं। 

उसका यह भी कहना है कि उसके साफ्टवेयरों का इस्तेमाल कभी भी किसी के फोन की बातें सुनने, उसे मॉनिटर करने, ट्रैक करने और डाटा इकट्ठा करने में नहीं होता। अगर पेगासस स्पाइवेयर का इस्तेमाल फोन की बात सुनने, मॉनिटर कर नैट पैक करने या डाटा इकट्ठा करने में होता ही नहीं है तो फिर मोबाइलों की जासूसी कैसे संभव हुई? भारत में तो 300 सत्यापित मोबाइल नंबरों की जासूसी होने का दावा किया गया है। इनमें नेताओं, सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश, वहां के पूर्व कर्मचारी के साथ 40 पत्रकारों के नंबर भी शामिल हैं। 

विचित्र बात यह है कि इसमें मोदी सरकार के एक मंत्री का भी नंबर है। पेगासस का उपयोग दुनिया भर की सरकारें करती हैं तभी तो 2013 में सालाना 4 करोड़ डॉलर कमाने वाली इस कंपनी की कमाई 2015 तक 15.5 करोड़ डालर हो गई। जैसा हमने ऊपर कहा कैलिफोर्निया के मामले में व्हाट्सएप के साथ फेसबुक, माइक्रोसॉफ्ट और गूगल भी न्यायालय गई थीं। अगर पेगासस मोबाइल की जासूसी करता ही नहीं है तो ये कंपनियां उसके खिलाफ न्यायालय क्यों गईं? 

एंटीवायरस बनाने वाली कंपनी कैस्परस्की का बयान है कि पेगासस एस.एम.एस., ब्राऊजिंग हिस्ट्री, कांटैक्ट और ई-मेल तो देखता ही है, फोन से स्क्रीनशॉट भी लेता है। यह गलत फोन में इंस्टॉल हो जाए तो खुद को नष्ट करने की क्षमता भी रखता है। विशेषज्ञों के अनुसार इसे स्मार्ट स्पाइवेयर भी कहा गया है क्योंकि यह स्थिति के अनुसार जासूसी के लिए नए तरीके अपनाता है। 

भारत सरकार ने अभी तक इस बात का खंडन नहीं किया है कि वह पेगासस स्पाइवेयर का इस्तेमाल करती है। देश की सुरक्षा, आतंकवाद, आर्थिक अपराध आदि के संदर्भ में जासूसी विश्व में मान्य है और इसमें कोई समस्या नहीं है। मोटे तौर पर इस पर सहमति है कि देश की सुरक्षा का ध्यान रखते हुए किसी पर नजर रखना, उसके बारे में जानकारियां जुटाना आदि आवश्यक है। दुर्भाग्य है कि कई बार राजनीतिक नेतृत्व के समक्ष सुर्खरू कहलाने के लिए एजैंसियों के बड़े-बड़े अधिकारी राष्ट्रीय सुरक्षा के नाम पर ऐसे लोगों को भी दायरे में ले लेते हैं जो राजनीतिक और वैचारिक स्तर पर सरकार के विरोधी होते हैं।-अवधेश कुमार

 


सबसे ज्यादा पढ़े गए

Content Writer

Pardeep

Recommended News