‘उड़ी टीथवाल से पाक सैनिक तेजी से पीछे हटने लगे’

2020-11-20T04:08:42.217

‘‘उड़ी से उत्तर की तरफ आगे कृष्ण गंगा घाटी में टीथवाल से दूर, स्पष्ट रूप से पहाडिय़ों के द्वारा अलग स्थान था लेकिन था इसी सैक्टर का हिस्सा। हमारे पास बाकायदा फौजवारी 1 राईफल कंपनी और कुछ आजाद थे।’’ ‘‘इसका मतलब यह है कि असल लड़ाई के इलाके में हमारी फौज बाकायदा फौजियों की एक बटालियन उड़ी के सामने, एक बटालियन और टीथवाल की दूसरी ओर एक कंपनी पर ही सम्मिलित थी। 

मेरे पास 3 और कंपनियां, जो काफी पीछे अर्थात मुजफ्फराबाद, कोहाला और बाग में एक-एक कंपनी मौजूद थी। परन्तु यह केवल स्थानीय बचाव के लिए ही थी और इनको आगे जाने की इजाजत नहीं थी। ब्रिगेड की तीसरी बटालियन में से एक कंपनी मरी (कश्मीर से बाहर) में स्थित थी और बाकी फौज पुंछ के सामने मेरे कंट्रोल से बाहर थी। ब्रिगेड के फौजी केन्द्र और मुझे मरी में रहने का हुक्म दिया गया था। 

हमारे सुरंग बनाने वालों ने जल्दी से सड़क पर काम शुरू किया। एक पुरानी पगडंडी पहले से मौजूद थी और हमने इसे ट्रक गुजारने के लिए उपयुक्त बनाना था जिसकी लम्बाई 50 मील थी। स्थानीय लोग जो बहुत ही जोश में थे, ने प्रति दिन 1000 के लगभग बिना मजदूरी वाले मजदूर उपलब्ध किए लेकिन इसके बावजूद इसे पूरा करने के लिए लंबा समय चाहिए था।’’ 

‘‘इस इलाके में हमारे आने के 4 दिनों के बाद 15 मई को जबकि ब्रिगेड अपने काम में व्यस्त था और हमला शुरू होने से 3 दिन पहले मुझे एक नई हिदायत प्राप्त हुई जिसका सार यह था कि मुझे ब्रिगेड को किसी दूसरे की सरपरस्ती में छोडऩा था और टीथवाल के रास्ते पर आगे जाना था जहां पर हमारा उत्तरी दस्ता था। इसमें 5000 कबायली मेरे अधीन होंगे और हमें श्रीनगर की ओर एक गहरा छापा मारना था ताकि भारतीयों को उत्तर की तरफ मोड़ दे। 

इस प्रकार से उन्हें मुजफ्फराबाद की ओर हमला करने से रोकना था। अगर यह बात पहले बताई जाती तो यह विचार यकीनी तौर पर एक अच्छा विचार था, लेकिन इस मौके पर मुझे ऐसा करना संभव नजर नहीं आ रहा था। 5000 कबायलियों को संभालना जिसके बारे में मुझे मालूम था कि यह एक बहुत भारी काम है, जिसे बिना किसी मंसूबे के पूरा नहीं किया जा सकता था। मुझे इस बात का डर हुआ कि इसका मतलब यह होगा कि मुझे मोर्चे के सबसे महत्वपूर्ण हिस्से को छोडऩा होगा और अकेले पहलू में जाना होगा। वहां पर कुछ किए बगैर लम्बे समय तक प्रतीक्षा करनी होगी क्योंकि 5000 कबायली अभी तो उपलब्ध ही नहीं थे।’’ 

‘‘कबायलियों को जमा करने के लिए लगभग 15 दिन लग जाएंगे इसके बाद मुजफ्फराबाद से निकल कर टीथवाल के दूसरी ओर मोर्चे पर निकलना था इसके लिए लगभग 60 मील पहाड़ों पर चलना था। इसमें लगभग 4 दिन लगने थे। इसका मतलब यह था कि 4 दिनों के लिए अपना राशन साथ लेकर जाना होगा जिसके लिए लगभग 800 कुलियों की जरूरत पड़ेगी। दूर-दराज इलाके में 2 दिनों की रसद को बरकरार रखने के लिए 400 कुली और चाहिएं। 4 और दस्तों की जरूरत होगी और वहां पर रोकााना की रसद को कायम रखने के लिए प्रति दिन 200 कुलियों पर आधारित 4 और टीमें दरकार होंगी। लेकिन अगर हम गोला-बारूद, सामान और मैडीकल भंडार आदि को लेकर जाएं तो इसमें और 200 कुली शामिल करें तो कुल 2200 कुलियों की जरूरत पड़ेगी। 

इनके बारे में मैं अपने तजुर्बे के आधार पर कह सकता हूं कि जल्दी में इतनी बड़ी संख्या में कुलियों को जमा करना असंभव है। अत: 19 मई को सवेरे मैंने इस सुझाव के साथ अपनी रिपोर्ट जमा की कि अगर मैं तैयारियां मुकम्मल होने तक इंतजार करूं तो यह बेहतर होगा, अन्यथा मैं एक ऐसे समय में साधनों के बगैर सफर कर रहा हूंगा जबकि भारतीय फौज उड़ी से आगे बढ़ रही होगी।’’‘‘इस रिपोर्ट पर दस्तख्त करने के बाद मुश्किल से 1 घंटा गुजरा होगा कि अचानक यह खबर आई कि भारतीय सेना की पेशकदमी पिछली रात ही शुरू हो गई थी। दिन भर और संदेश आते रहे। हमें स्पष्ट रूप से 3 हमलों का सामना करना था, अर्थात् उड़ी में जेहलम नदी के दोनों किनारों पर और उत्तर में टीथवाल की ओर से।’’-पेशकश: ओम प्रकाश खेमकरणी
 


Pardeep

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