विपक्ष की एकजुटता समय की जरूरत

punjabkesari.in Friday, Apr 01, 2022 - 03:39 AM (IST)

हाल ही में सुप्रीमकोर्ट की एक खंडपीठ ने मुम्बई में पुलिस प्रमुख के पक्ष में निर्णय लिया और उसके वकीलों के साथ सहमति जताई कि महाराष्ट्र में सत्तासीन सरकार द्वारा पांच आपराधिक आरोपों की निष्पक्ष जांच करने की संभावना नहीं है जो उन पर लगाए गए हैं क्योंकि उसने राज्य के गृहमंत्री के भ्रष्टाचार का पर्दाफाश किया था। माननीय जज के इन विचारों को न्याय संगत ठहराया गया (यद्यपि जनता तथा पुलिस कर्मी इस पूरे षड्यंत्र में मंत्री तथा पुलिस प्रमुख दोनों द्वारा निभाई गई भूमिका से अच्छी तरह अवगत हैं)। 

मगर ऐसे बड़े नियम विरोधी पक्षों से संबंधित नागरिकों के संवैधानिक अधिकारों पर हमलों पर लागू क्यों नहीं किए जाते जब उन्हें डराने के प्रयास किए जाते हैं? सी.ई.ए.ए. कानून के असंवैधानिक अपमान के बाद असम के अतिरिक्त राज्यों में एन.आर.सी. लगाने का खतरा सामने आया। जब संघ परिवार से जुड़े संतों तथा धर्मगुरुओं ने देश में से प्रत्येक मुसलमान को खत्म करने की धमकी दी तो क्यों यू.ए.पी.ए. लागू नहीं किया गया जैसे कि जे.एन.यू. के विद्यार्थियों तथा दिशा रवि पर लगाया गया था? क्यों संघ परिवार के समर्थकों के साथ विपक्षी दलों से जुड़े लोगों से अलग व्यवहार किया जाता है जबकि उन पर लगे अपराध के आरोप उतने ही गंभीर हैं? 

जरूरत है प्रत्येक राज्य विधानसभा तथा लोकसभा में विपक्ष की एक मजबूत आवाज की। बिना एक मजबूत विपक्ष के लोकतंत्र निरंकुश में बदल जाता है। पंजाब में हालिया चुनावों ने वहां एक ही पार्टी का प्रभुत्व कायम कर दिया जो वास्तव में आदर्श नहीं है। पंजाब विधानसभा में एक तरह से ‘आप’ के सामने कोई विपक्ष नहीं है। कांग्रेस आपस में बंटी हुई है। भाजपा का महत्वपूर्ण सीमांत राज्य में कोई अस्तित्व नहीं है जहां यदि सही तरह से स्थितियों से न निपटा जाए तो अचानक खालिस्तान के समर्थक अपना सिर उठा सकते हैं। 

अकाली अभी भी ड्रग्स-तस्करी के दागों को नहीं धो पाए हैं। प्रभु की कृपा से देश के सर्वाधिक जनसंख्या वाले राज्य उत्तर प्रदेश में अखिलेश यादव तथा उनकी समाजवादी पार्टी एक विश्वसनीय विपक्ष के तौर पर उभरे हैं। मतदाताओं ने ऐसा करने का निर्णय किया। उन्होंने स्थिरता सुनिश्चित करने के लिए भाजपा को स्पष्ट बहुमत दिया तथा इसके साथ ही जो लोग हिंदुत्व की विचारधारा के विरोधी थे उन्होंने एक पार्टी को चुना, अखिलेश की ताकि योगी सरकार पर अंकुश लगाकर रखा जा सके। ऐसा ही होना चाहिए। 

अब बात 2024 की हो रही है तथा मोदी जी के ‘डबल इंजन’ बारे। 2024 के लिए मोदी जी ने शुरूआत कर दी है। विपक्ष खंडित है जिसमें 3 हस्तियां नेतृत्व की भूमिका निभाने के लिए प्रयासरत हैं। राहुल गांधी, ममता दीदी तथा अब अरविंद केजरीवाल। मुझे लगता है कि तेलंगाना के टी. चंद्रशेखर राव भी अपने लिए अवसर देख रहे हैं। अपने बूते पर इनमें से कोई भी मोदी जी का मुकाबला नहीं कर सकता। प्रशांत किशोर की जादुई छड़ी तथा उनकी गणनाओं के बावजूद एकता दिखाई नहीं देती। 

प्रत्येक राज्य में शासन करने के अपने पुराने रिकार्ड तथा पदचिन्हों के साथ कांग्रेस ‘विपक्ष की नेता’ की पदवी संभालने के लिए रणनीतिक तौर पर अधिक उपयुक्त दिखाई देती है। दुर्भाग्य से राहुल गांधी वास्तव में एक राजनीतिज्ञ बनने के लिए नहीं हैं। यहां तक कि जब उन्होंने लगातार दोहराया कि ‘चौकीदार चोर है’ उन पर विश्वास नहीं किया गया, जबकि मोदी जी इसके विपरीत बिना पलक झपकाए काले को सफेद या इसके उलट बना सकते हैं। असल बात यह है कि लोग उन पर विश्वास करते हैं। और जब उन्हें राजनीतिक क्षेत्र में राहुल के खिलाफ उतारा गया तो यह ‘मोदी एडवांटेज’ रहा। 

दीदी विपक्ष की एक बेहतर नेता बन सकती हैं। मोदी की तरह उनके पास नाटकों के लिए क्षमता है और जानती हैं कि कैसे लोगों के मनों को प्रभावित करना है। कोई भी उन्हें बंगाल में उनके सिंहासन से नहीं हटा सकता। वह समय के साथ त्रिपुरा पर भी कब्जा कर सकती हैं लेकिन इससे अधिक नहीं। अरविंद केजरीवाल को भाषा में महारत के साथ हिंदी पट्टी में उनके ऊपर बढ़त हासिल है। मगर दक्षिण तथा पूर्व में वह अपने पांव नहीं जमा सकते। मैं नहीं जानता कि कैसे ये अलग-अलग व्यक्तित्व विपक्षी नेतृत्व के महत्वपूर्ण प्रश्र का समाधान करने जा रहे हैं। या फिर प्रशांत किशोर इस मुद्दे का समाधान करने के प्रति आश्वस्त हैं, जिनके संकल्प के बिना भाजपा के बहुलतावादी एजैंडे के खिलाफ एक व्यावहारिक विपक्ष खड़ा नहीं हो पाएगा। 

हिंदुत्व का केंद्रीय निर्वाचन क्षेत्र, जिसमें देश की 20 प्रतिशत मतदाता जनसंख्या है निश्चित तौर पर प्रसन्न होगी। ओ.बी.सी. के 15-20 प्रतिशत समर्थन के साथ भाजपा की राजनीतिक शक्ति और बढ़ती है जिसके साथ पार्टी अपने भारत में हिंदू राष्ट्र बनाने के उद्देश्य को आगे बढ़ा सकती है। जब स्वार्थी नेता किसी समय प्रभुत्वशाली रही भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस द्वारा खाली किए गए स्थान में सर्वोच्चता के लिए झगड़ रहे हैं, विचारधारात्मक तौर पर निष्ठावान हिंदुत्व ताकतों द्वारा उस स्थान पर कब्जा करना लाजिमी है। विपक्ष के बड़े नेताओं के बीच जारी स्पर्धा उन्हें व्यक्तिगत तौर पर अधिक जोखिमपूर्ण बना देगी।-जूलियो रिबैरो (पूर्व डी.जी.पी. पंजाब व पूर्व आई.पी.एस. अधिकारी)
 


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