उत्तर प्रदेश में चमत्कार के भरोसे विपक्ष
punjabkesari.in Friday, Oct 09, 2026 - 04:35 AM (IST)
उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी (सपा) और कांग्रेस के बीच एक छद्म युद्ध चल रहा है। विधानसभा का अगला चुनाव कौन कितनी सीटों पर लड़ेगा, इसको लेकर हवा में तीर फैंके जा रहे हैं। कभी कोई कांग्रेसी फरमान देता है कि 150 से एक भी कम नहीं, तो कोई समाजवादी चुनौती देता है कि 25 से ज्यादा लेकर दिखाओ। सपा सुप्रीमो अखिलेश यादव पी.डी.ए. अर्थात् पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक के दम पर भाजपा को पछाडऩे की उम्मीद कर रहे हैं। कांग्रेस जानती है कि सपा के बिना उसका गुजारा नहीं, फिर भी उसे ब्राह्मण, दलित और मुसलमान के पुराने गठजोड़ के दिन वापस लौटने की उम्मीद है। विपक्ष की तीसरी शक्ति बहुजन समाज पार्टी (बसपा) भी दलित, अति पिछड़ा, मुसलमान और ब्राह्मण के 2006 वाले समीकरण की वापसी की उम्मीद में जी रही है, जब उसे किसी बड़ी पार्टी को साथ लिए बिना विधानसभा में बहुमत मिल गया था।
तीनों ही पार्टियां मोदी-योगी युग में 2017 के बाद बदले हालात से बेखबर नहीं हैं। उन्हें मालूम है कि अति पिछड़े और अति दलितों का एक बड़ा हिस्सा भाजपा की तरफ खिसक चुका है और उसके बिना कोई चुनाव जीतना आसान नहीं। यही तीन पार्टियां हैं, जो 2027 के विधानसभा चुनाव में भाजपा को चुनौती दे सकती हैं। चुनाव अगले साल अप्रैल-मई में होंगे। करीब 6 महीने का ही समय बचा है लेकिन अब तक विपक्षी पार्टियों की कोई रणनीति सामने नहीं आई।
गठबंधन और जीत का आंकड़ा : पिछले चुनावों के नतीजे साफ बताते हैं कि अकेले दम पर भाजपा को चुनौती देना किसी एक पार्टी के बस में नहीं है। फिर भी ऐसा लगता है कि विपक्षी पार्टियों के नेता अपने व्यक्तिगत दंभ के शिकार हैं या फिर किसी चमत्कार की उम्मीद में जी रहे हैं। कांग्रेस और सपा 2022 का विधानसभा चुनाव अलग-अलग लड़ीं। कांग्रेस ने प्रदेश की कुल 403 सीटों में से 399 पर उम्मीदवार उतारे लेकिन जीती महज 2 सीटें। 387 यानी लगभग 97 प्रतिशत सीटों पर उसके उम्मीदवारों की जमानत जब्त हो गई। कांग्रेस को कुल लगभग 2.4 प्रतिशत वोट मिले। समाजवादी पार्टी 347 सीटों पर लड़ी और 111 सीटें जीतने में कामयाब रही। उसकी सहयोगी छोटी-छोटी पाॢटयों को भी 14 सीटें मिलीं। बसपा सभी 403 सीटों पर लड़ी और सिर्फ 1 सीट जीत पाई। 290 यानी लगभग 72 प्रतिशत सीटों पर उसके उम्मीदवारों की भी जमानत जब्त हो गई। लेकिन 2024 के लोकसभा चुनाव में सपा और कांग्रेस एक साथ आ गईं तो नतीजे बदल गए। इस चुनाव में प्रदेश की 80 सीटों में से समाजवादी पार्टी 62 सीटों पर लड़ी और 37 सीटें जीतने में कामयाब रही। कांग्रेस 17 सीटों पर लड़ी और 6 सीटें जीतने में कामयाब रही। बसपा 79 सीटों पर लड़ी लेकिन एक भी सीट नहीं जीत पाई। 2019 के लोकसभा चुनाव में बसपा और समाजवादी पार्टी साथ मिलकर लड़ीं, तब बसपा को 10 और सपा को 5 सीटें मिली थीं। इन आंकड़ों से साफ है कि भाजपा को असली चुनौती सपा, कांग्रेस और बसपा का गठबंधन ही दे सकता है और उसकी संभावना बहुत कम है।
अल्पसंख्यक फैक्टर पर प्रहार : उत्तर प्रदेश में हार जीत के फैसले में लंबे समय तक अल्पसंख्यक मतदाता महत्वपूर्ण भूमिका निभाते थे। प्रदेश में सबसे ज्यादा आबादी करीब 19 प्रतिशत मुसलमानों की है। कांग्रेस, बसपा और सपा को सबसे ज्यादा उम्मीद अल्पसंख्यकों से है। लेकिन उनका वोट हर बार बंट जाता है। पिछले कुछ चुनावों के नतीजे बताते हैं कि बहुजन समाज पार्टी से अल्पसंख्यकों का मोहभंग हो चुका है। लेकिन प्रदेश की राजनीति में ए.आई.एम.आई.एम. का प्रवेश चुनाव के पहले भ्रम फैलाने के लिए काफी है। ये पार्टी चुनाव जीतती नहीं लेकिन गैर भाजपा उम्मीदवारों के लिए माहौल खराब जरूर करती है। पसमांदा यानी गरीब वर्ग के मुसलमानों को अलग वोट बैंक बनाने की कोशिश नाकामयाब हो चुकी है। अब भाजपा उसे इस्तेमाल करके विपक्षी वोट को बांटने की कोशिश में जुटी है। एम.वाई. यानी मुसलमान-यादव गठबंधन भी अब चुनाव जिताने का फार्मूला नहीं रह गया। अति पिछड़ों और अति दलितों की छोटी-छोटी पाॢटयां और नेता खड़े हो गए हैं। उनका झुकाव भाजपा की ओर दिखाई देता है। सपा के लिए यह एक बड़ी चुनौती है। कांग्रेस अपने अतीत से बाहर नहीं निकल पा रही है। हाल में पार्टी संगठन में फेर-बदल करके एक सवर्ण की जगह दूसरे सवर्ण को अध्यक्ष बना दिया गया। भाजपा से थोड़ी-बहुत नाराजगी के बावजूद ब्राह्मण उसका साथ छोड़ेंगे, इसमें संदेह है। राहुल गांधी बात तो पिछड़ों और दलितों की करने लगे हैं लेकिन जब नेतृत्व की बात आती है तो कांग्रेस चूक जाती है।
जितनी संख्या उतना हिस्सा : इन सब के बीच भाजपा अपना रास्ता आसान करने में लगी है। राज्यसभा के लिए टिकट भी बांटे तो राज्य के जातीय समीकरण का पूरा ध्यान रखा। उसकी सूची में ब्राह्मण और राजपूत भी हैं। पिछड़े और दलित के साथ महिला मतदाताओं को साधने का पूरा इंतजाम है। जिसकी जितनी संख्या उसका उतना हिस्सा। नारा तो यह समाजवादी नेता राम मनोहर लोहिया का था लेकिन भाजपा ने समझ लिया है कि चुनाव जीतने का सटीक फ़ार्मूला इसी समीकरण में है। पूरे विपक्ष को एस.आई.आर. और मुख्य चुनाव आयुक्त से जंग में फंसाकर भाजपा तीसरी बार जीत की तैयारी में है। पेपर लीक से नाराज जेन जी या महंगाई से परेशान आम लोगों के लिए अंतत: जाति के चक्रव्यूह से निकलना मुश्किल है। भाजपा का पूरा चुनावी ताना-बाना इसके इर्द गिर्द ही रचा जा रहा है। इसके इतर योगी बाबा के उग्र हिंदुत्व के चोगे में लिपटा हिंदू राष्ट्रवाद तो है ही। चुनाव जीतने का एक फार्मूला मुसलमानों का एकजुट समर्थन हो सकता है, तो दूसरा फार्मूला मुस्लिम विरोध को साधकर भी बनाया ही जा सकता है। भाजपा जीत के इस मंत्र को साधने में जुटी है।-शैलेश कुमार
