अधिकारियों का अहंकार एवं सेवानिवृति के बाद का जीवन

10/17/2021 5:28:09 AM

रिटायरमैंट एक परिवर्तन है। वक्त बड़े-बड़ों को आईना दिखा देता है। जब तक इन्सान के पास अधिकार होता है तब तक वह इतने घमंड में रहता है कि उसको छोटे-मोटे व्यक्ति की कोई परवाह नहीं होती। अधिकार के लालच  में वह सामान्यत: अपने जमीर को भी बेच देता है। अधिकारियों की तो बात और भी निराली होती है। वे खुद को जागीरदार समझने लगते हैं तथा कनिष्ठ अधिकारियों व आम जनता की ज्यादा परवाह नहीं करते। अधिकार की हेकड़ी से अपने निजी कार्यों को बड़ी आसानी से करवा लेते हैं। अधिकारी बनते ही उनके सिर पर न जाने कौन सा दम्भ रूपी भूत सवार हो जाता है कि वे अपने मूलभूत मानवीय मूल्यों को ताक पर रख कर अपनी अलग सी संस्कृति बना लेते हैं। 

सफेदपोश व असामाजिक तत्वों जैसे लोग तो जैसे-तैसे अधिकारियों के साथ अपने संपर्क बनाने में कामयाब हो जाते हैं। कुछ भ्रष्ट, अनाचारी व अहंकारी अधिकारी तो सहज मान लेते हैं कि उनके अधिकार, कार्यक्षेत्र बहुत असीमित हैं। ऐसा भी देखा गया है कि जब कोई अधिकारी किसी सार्वजनिक महत्व के पद पर आसीन हो जाता है तो वह खुद को दूसरे समकालीन अधिकारियों से ज्यादा गुणवान, चतुर व कत्र्तव्यनिष्ठ समझने लग पड़ता है। उनके अवांछनीय अभिमान की झलक तो कई बार उनके परिजनों, विशेषकर उनकी बीवीयों में भी देखने को मिलती है, जब वे भी कनिष्ठ अधिकारियों पर अपना रौब झाडऩे लग जाती हैं। ऐसे अधिकारी शायद भूल जाते हैं कि वे अपने पद से तो कुछ समय के लिए ही सुशोभित हैं तथा इन्सानियत, जिसका प्रभाव चिरस्थाई रहता है, केवल वही उनको लोगों की नजरों में प्रतिष्ठित व प्रज्ञावान बना सकती है। 

दूसरों की समस्या को अपनी समस्या समझ कर सुलझाने का काम बहुत कम अधिकारी करते हैं तथा किसी आम व्यक्ति के टैलीफोन को सुनना तो वे अपना अपमान समझते हैं। उनको नहीं भूलना चाहिए कि उनकी शोहरत व दौलत तो वक्त के थपेड़ों से न जाने कब चकनाचूर हो जाएगी। परमात्मा ने उन्हें जनता, विशेषकर गरीब, असहाय व असमर्थ लोगों की सेवा का एक महान अवसर दिया है तथा इन अनमोल क्षणों को व्यर्थ न गवाएं।  जब व्यक्ति अर्श से फर्श पर गिरता है तब शारीरिक व मानसिक चोटें आना स्वाभाविक है तथा फिर कोई भी व्यक्ति यहां तक कि आपके रिश्तेदार भी आपके साथ सहानुभूति नहीं जताएंगे। इसलिए आवश्यकता इस बात की है कि अधिकारियों को जमीन पर पांव रख कर चलना चाहिए तथा कभी नहीं भूलना चाहिए कि शतरंज का खेल समाप्त हो जाने पर राजा व सिपाहियों को एक ही डिब्बे में डाल कर रखा जाता है। 

कई अधिकारी तो रिटायर होना ही नहीं चाहते तथा जैसे ही उनकी रिटायरमैंट नजदीक आती जाती है, वे अपना जमीर बेच कर राजनीतिज्ञों के तलवे चाटना शुरु कर देते हैं। कुछ अधिकारी तो इतने छटपटा जाते हैं कि वे किसी न किसी राजनीतिक पार्टी में शामिल हो जाते हैं तथा टिकट या किसी अन्य ओहदे की उम्मीद में अपना सारा कमाया हुआ धन भी नष्ट कर लेते हैं। ऐसे व्यक्ति अपनी जिन्दगी में कभी भी संतुष्ट नहीं रहते तथा उनके छटपटाने का प्रभाव उन पर ही नहीं बल्कि उनकी संतान पर भी पड़ता है तथा स्वर्ग-नर्क के दृश्य उन्हें अपने जीवनकाल में ही देखने को मिल जाते हैं। 

आमतौर यह भी देखा गया है कि अभिमान व दम्भ से ग्रस्त अधिकारी जब सेवानिवृत्त हो जाते हैं तो सेवारत कर्मचारी उन्हें देखते ही अपना मुंह फेर लेते हैं जबकि दूसरी ओर ऐसे भी कुछ ईमानदार, मिलनसार व अपनी गरिमा को संजोए हुए होते हैं, जिन्हें देखते ही सभी उनका अभिवादन करने के लिए उनकी तरफ लपक पड़ते हैं। इसलिए यदि वास्तव में अधिकारी अपना मान-सम्मान बनाए रखना चाहते हैं तो उन्हें नकारात्मक वृत्तियों से दूर होकर जन-मानस की सच्चे मन से सेवा करनी चाहिए। अधिकारियों को अपनी  इच्छाओं  पर  नियंत्रण  रखना  चाहिए। मोह-ममता से मुक्त होकर अपना व्यवस्थित व नियंत्रित जीवन जीना चाहिए। आध्यात्मिक जीवन की ओर ध्यान केन्द्रित करना चाहिए तथा दूसरे लोगों, विशेषकर नौजवानों का मार्गदर्शन करना चाहिए। स्कूलों, सरायों, मंदिरों, गुरुद्वारों में अपनी नेक कमाई का कुछ अंश लगाना चाहिए। कोई हॉबी, जैसे कि संगीत, लेखन, गार्डङ्क्षनग व बच्चों को पढ़ाने इत्यादि पर समय लगाना चाहिए। 

किसी एन.जी.ओ. का सदस्य बन कर भी समाजसेवा में अपना योगदान दे सकते हैं। खुद को अकेला महसूस मत होने दें तथा अपनी सेवानिवृत्ति को सकारात्मक तरीके से जीएं। नौकरी की तलाश में मत भटकें। सरकार ने हर अधिकारी/कर्मचारी को पर्याप्त धनराशि दी हुई होती है तथा साथ में पैंशन भी दी जाती है। अपने मन में किसी भी प्रकार की आसक्ति न पालें। अभिमान की बजाय स्वाभिमान जगाएं। एक अच्छा इंसान बनने की कोशिश करें तथा नैतिक मूल्यों की पहचान करें। जीवन की किताब के लेखक आप खुद हैं। झुकना सीखें नहीं तो सूखी लकड़ी की तरह टूटना ही अंत होगा। श्री कृष्ण ने कहा था कि कर्म का फल व्यक्ति को उसी तरह ढूंढ लेता है जैसे कोई बछड़ा सैंकड़ों गायों के बीच अपनी मां को ढूंढ लेता है। कबीर जी की इन पंक्तियों पर जरा ध्यान दें तथा अपना जीवन सकारात्मक ढंग से जीएं। कबीरा जब हम पैदा हुए, जग हंसा हम रोए।  ऐसी करनी कर चले हम हंसे जग रोए॥-राजेन्द्र मोहन शर्मा डी.आई.जी. (रिटायर्ड)
 


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