कोई व्यक्ति सभी ज्ञानों का भंडार होने का दावा नहीं कर सकता

2021-05-04T02:47:46.697

यह भी पल गुजर जाएगा। ऑक्सीजन सिलैंडर के लिए हाथापाई, जीवन रक्षक दवाइयों, ए बुलैंस तथा अस्पताल बैंडों की कमी ने हमारे स्वास्थ्य ढांचे में एक बड़े छेद को उजागर किया है। एक राष्ट्र के रूप में हम अपने लोगों को सभी सहूलियतें प्रदान करने में विफल रहे। हालांकि सत्ताधारी सरकारों को सहायता के प्रावधान में हिमालय जैसी विफलता के लिए दोषी ठहराया जाना चाहिए। महामारी से लडऩे में निॢववाद रूप से हमसे गलतियां हुईं। 

यदि कोई स्वास्थ्य सेवाओं पर हमारी असफलताओं का कोई कारण बताए तो उसमें सबसे प्रमुख प्रधानमंत्री की कार्यशैली है। उन्होंने अपने कार्यालय में सभी निर्णय लेने वाली शक्तियों का केंद्रीयकरण किया है। उन्होंने बाहर से मिले स्वतंत्र इनपुट को काटते हुए अपने आप में असंतोष जाहिर किया है। 

प्रधानमंत्री के रूप में इंदिरा गांधी तब तक ल बे समय तक सफल रहीं जब तक उन्होंने अपने दिग्गज सहयोगियों पर भरोसा किया। जब तक पी.एन. हक्सर, पी.एन. धर और गोपी अरोड़ा जैसे नौकरशाहों की सलाह उनके साथ थी तब तक उन्होंने राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर याति प्राप्त की। जब उन्होंने अपने सहयोगियों को दरकिनार कर दिया तो उनकी परेशानी शुरू हो गई। 

मोदी पी.एम.ओ. के दिल में क्या है इसका विश्लेषण करने का समय है। यह विश्लेषण करने का समय भी है कि इससे बेहतर प्रदर्शन करने में किन सुधारों को किया जा सकता है। स्वास्थ्य, स्वच्छता जैसे विषय राज्य के विषय हैं और केंद्र इनमें तभी दखलअंदाजी करता है जब कोई राष्ट्रीय संकट हो।

कोरोना वायरस महामारी ने केंद्र को चालक की सीट पर बिठा दिया है जिसमें दिशा-निर्देशों को बनाना, वैक्सीन आबंटित, दवाइयां तथा विशेष फंडों को स्थापित करना था। हालांकि मैडीकल ऑक्सीजन का निर्माण और आबंटन राज्य का काम है। इसके नियम पूर्णत: संबंधित राज्य सरकारों के हाथों में होते हैं। राष्ट्रीय आपदा ने केंद्र सरकार को आबंटन और इसकी वसूली को अपने नियंत्रण में लेने के लिए कहा है। 

हालांकि ऑक्सीजन की कमी तथा अस्पताल बैडों के लिए भागदौड़ अभी भी जारी है, सभी प्रमाण सुझाते हैं कि अगले कुछ दिनों में यह संकट बड़े स्तर पर कम हो सकता है। लोगों में इसी तरह की मारामारी तब देखने को मिली जब लॉकडाऊन का पहला चरण शुरू हुआ था। तब वैंटीलेटरों, पी.पी.ई. किटों और यहां तक कि मास्क की भारी कमी पैदा हो गई थी। सरकार ने समस्या से निपटने के लिए जब अपना मन बनाया तो कुछ ही सप्ताहों के भीतर वैंटीलेटरों तथा पी.पी.ई. की किल्लत के बारे में शिकायतें गायब हो गईं। 

ऑक्सीजन आपूॢत के मामले में भी कुछ ऐसा ही होना चाहिए। हालांकि पिछली सित बर में स्वास्थ्य विशेषज्ञों की केंद्रीय इकाई ने 500 नए प्लांटों को स्थापित करने के लिए अपेक्षित धन के आबंटन को हरी झंडी दे दी थी मगर ज्यादातर राज्य प्रभावी रूप से कार्रवाई करने में असफल रहे। दिल्ली ने एक भी नए प्लांट को स्थापित करने के लिए कदम तक नहीं बढ़ाया। अन्य राज्यों ने आधे से भी कम प्लांटों को स्थापित किया और अब वे इस प्रक्रिया में तेजी ला रहे हैं। पिछले वर्ष चीन के साथ सीमा गतिरोध के मामले में कोरोना वायरस महामारी के दौरान भी मोदी सरकार ने अपनी गलतियों से जल्द ही सीख लिया। उस संकट से निपटने के लिए सरकार ने अपनी दृढ़ता और संयम का परिचय दिया। 

यदि मोदी सरकार ने कुछ माह पूर्व कोविड-19 पर जीत की घोषणा करने की बजाय अपने आपको दूसरी लहर के खिलाफ तैयार किया होता तो महामारी से होने वाली मौतों और तबाही से बचा जा सकता है। सभी राज्य सरकारें नए संक्रमणों तथा मौतों की गिनती बढ़ौतरी देख रही हैं। संक्रमण बीमारी विशेषज्ञों का मानना है कि वायरस की वर्तमान लहर कमजोर पड़ेगी मगर इसका छोटे कस्बों और उत्तर के ग्रामीण क्षेत्रों में असर महसूस किया जाएगा।

दूसरी लहर के प्रकोप को देखते हुए प्रशासन पहले से ही तीसरी और चौथी लहर के लिए अपनी तैयारी कर ले। इस दौरान विधानसभा चुनावों के नतीजे लोगों की निगाहों को कोरोना संकट से कुछ हद तक दूर कर देंगे। इस समय ङ्क्षचता का विषय आंशिक और सैमी-आंशिक लॉकडाऊन है जिससे अर्थव्यवस्था पर असर पड़ेगा। 

पहले लॉकडाऊन से उत्पन्न समस्याओं से अभी हम पूरी तरह से उभरे नहीं हैं। अर्थव्यवस्था के इंजन को थोड़ी-सी गति मिली है। वर्तमान संकट को देखते हुए आॢथक पुनर्जीवन और अधिक पीछे रह गया है। आॢथक गिरावट ने राष्ट्र को और बीमार कर दिया है। यह एक ऐसी चुनौती है जिसे प्रधानमंत्री को हल करने की कोशिश करनी होगी। इसके लिए उन्हें विचार-विमर्श और सहमति बनानी होगी। कोई एक व्यक्ति सभी ज्ञानों का भंडार गृह होने का दावा नहीं कर सकता। एक अच्छे प्रशासन को सामूहिक और सहमति के प्रयास करने चाहिएं।-वरिन्द्र कपूर
 


Content Writer

Pardeep

सबसे ज्यादा पढ़े गए

Recommended News

static