‘अविश्वास प्रस्ताव’ भाजपा प्रबंधकों के लिए एक जोरदार झटका

Wednesday, Mar 21, 2018 - 03:10 AM (IST)

किसने सोचा था कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी, जो सबसे ताकतवर नेता माने जाते हैं और विस्तार कर रही भाजपा का नेतृत्व कर रहे हैं, उन्हें 4 वर्षों बाद अविश्वास प्रस्ताव का सामना करना पड़ेगा? 2014 में जब मोदी साऊथ ब्लाक पहुंचे तो भाजपा का मानना था कि पार्टी तथा इसके नेता अजेय हैं और अब लगातार चुनावी विजयों से इसमें जोश भरा है जिसने भाजपा नीत राजग को 21 राज्यों में शासन के सक्षम बनाया। इसलिए इस सप्ताह आंध्र प्रदेश के दो क्षेत्रीय दलों तेदेपा तथा वाई.एस.आर. कांग्रेस द्वारा मोदी सरकार के खिलाफ लाया गया पहला अविश्वास प्रस्ताव भाजपा के प्रबंधकों के लिए एक जोरदार झटके की तरह आया है। 

एक लोकतंत्र में अविश्वास प्रस्ताव विपक्ष के लिए एक मजबूत औजार है। समाजवादी नेता आचार्य कृपलानी अगस्त 1963 में जवाहर लाल नेहरू सरकार के खिलाफ पहला अविश्वास प्रस्ताव लाए थे जबकि अंतिम 2008 में भारत-अमरीका परमाणु सौदे को लेकर डा. मनमोहन सिंह सरकार के खिलाफ था। 1999 में वाजपेयी सरकार एक वोट से पराजित हो गई थी। मजे की बात है कि इंदिरा गांधी को रिकार्ड 15 की संख्या में अविश्वास प्रस्तावों का सामना करना पड़ा और उनके बेटे राजीव गांधी को इतना जबरदस्त बहुमत प्राप्त होने के बावजूद भी 1987 में इसका सामना करना पड़ा था। तो मोदी सरकार पर हमला करने के लिए अचानक यह कार्रवाई क्यों? 

इसके लिए उकसावे की पहली कार्रवाई राजग की सहयोगी तेदेपा द्वारा आंध्र प्रदेश को विशेष राज्य का दर्जा देने के मुद्दे पर गठबंधन से बाहर होना था, जैसा कि 2014 में राज्य के विभाजन के समय वायदा किया गया था। इस मुद्दे पर मोदी सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाने की विरोधी वाई.एस.आर. कांग्रेस की योजना का मुकाबला न कर पाने के चलते सत्ताधारी तेदेपा ने भी नोटिस दे दिया। मोदी सरकार पर हमला करने के अवसर को सूंघते हुए कांग्रेस, राकांपा, तृणमूल कांग्रेस, ए.आई.एम.आई.एम., माकपा, आम आदमी पार्टी, भाकपा तथा राजद जैसे कई विपक्षी दलों ने आगे आकर प्रस्ताव का समर्थन किया। 

दूसरे, विपक्ष समझता है कि राजग में दरार पैदा होने के कारण ऐसा प्रस्ताव पेश करने के लिए यह सही समय है। यद्यपि भाजपा ने गत माह उत्तर-पूर्वी राज्यों में शानदार विजय प्राप्त कर सभी को चौंका दिया, इसके बाद उत्तर प्रदेश तथा बिहार में हाल ही में हुए उपचुनावों में इसकी पराजय ने नाराज विपक्ष को सरकार पर हमला करने को उत्साहित किया। यह तथ्य कि कांग्रेस संसदीय दल की नेता सोनिया गांधी, राकांपा प्रमुख शरद पवार, तृणमूल कांग्रेस अध्यक्ष ममता बनर्जी तथा तेलंगाना के मुख्यमंत्री के. चन्द्रशेखर राव द्वारा विपक्षी एकता के लिए प्रयास किए जा रहे हैं, दिखाता है कि विपक्ष को इस अवसर का कितना एहसास है। दो अन्य क्षेत्रीय क्षत्रपों-सपा प्रमुख अखिलेश यादव तथा बसपा प्रमुख मायावती को भी गोरखपुर तथा फूलपुर निर्वाचन क्षेत्रों में विजय से भाजपा का सामना करने की हिम्मत मिली है। 

जेल में बैठे राजद प्रमुख लालू प्रसाद यादव के लिए बिहार के उपचुनावों के परिणाम उनकी आखिरी हंसी जैसे थे। तीसरे, यद्यपि मोदी सरकार को कोई खतरा नहीं है क्योंकि भाजपा तथा इसके सहयोगियों के पास अभी भी 314 वोट हैं, विपक्ष उनकी छवि देश के भीतर तथा विदेशों में खराब करना चाहता है। भाजपा विरोधी ताकतें मोदी शासन को परेशान करने के लिए कोई भी अवसर नहीं गंवाना चाहेंगी। संसदीय मामलों के मंत्री अनंत कुमार ने हाल ही में कहा था, ‘‘मैं कांग्रेस तथा अन्य विपक्षी सदस्यों से कहना चाहता हूं कि सदन के भीतर तथा बाहर पार्टी विश्वास से भरी है इसलिए भाजपा अविश्वास प्रस्ताव का सामना करने को तैयार है।’’ 

चौथे, अन्य नाराज राजग सहयोगी भाजपा नेताओं से बहुत खुश नहीं हैं। बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी के राजग से नाता तोडऩे के बाद एक माह के भीतर ही अलग होने वाली तेदेपा इसकी दूसरी सांझेदार है। महत्वपूर्ण है कि तेदेपा के बाहर निकलने के बाद राजग दक्षिण में किसी भी राज्य में सत्ता में नहीं है। इसकी बड़े लम्बे समय से सहयोगी शिवसेना पहले ही घोषणा कर चुकी है कि वह 2019 के लोकसभा चुनाव भाजपा के साथ मिलकर नहीं लड़ेगी। अकाली दल भी भाजपा से रुष्ट है और उसने यह संदेश पहुंचा दिया है कि भाजपा को शिअद के साथ बेहतर व्यवहार करने की जरूरत है। 

तेदेपा को शक्तिशाली भाजपा का सामना करने की हिम्मत कैसे मिली? तेदेपा प्रमुख चन्द्रबाबू नायडू को यह एहसास हो गया था कि उन्हें जनता को दिखाए गए अधिकतर सपनों को पूरा किए बिना ही 2019 के लोकसभा तथा विधानसभा चुनाव लडऩे होंगे। इसलिए मोदी सरकार को खलनायक बनाने से बेहतर रास्ता और क्या होगा? तेदेपा के विरोधी वाई.एस.आर. कांग्रेस के वाई.एस. जगनमोहन रैड्डी ने भी मौके को देखते हुए अविश्वास प्रस्ताव लाकर जंग में छलांग लगा दी। यद्यपि नायडू ने रैड्डी के तूफान को प्रभावपूर्ण तरीके से अपने पक्ष में करने के साथ-साथ भाजपा की योजनाओं को भी लडख़ड़ा दिया, मगर फिर भी वाई.एस.आर. कांग्रेस इस मौके पर भाजपा के साथ गठबंधन नहीं कर सकती। कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने कहा है कि यदि उनकी पार्टी 2019 में सत्ता में आती है तो वह आंध्र को विशेष राज्य का दर्जा देंगे। इस बात में कोई संदेह नहीं है कि राजग में दरारें उत्पन्न हो गई हैं। 

दूसरे भाजपा की दक्षिण में विस्तार की योजनाओं को भी चोट पहुंची है। तमिलनाडु में इसके ई.पी.एस. तथा ओ.पी.एस. धड़ों को साथ लाने में मदद करने के प्रयास भी सफल नहीं रहे हैं। आने वाले कर्नाटक चुनावों में विजय से भाजपा कार्यकत्र्ताओं के मनोबल में बहुत वृद्धि होगी। यदि भाजपा गठबंधन धर्म जारी रखना चाहती है तो इसे अपने सहयोगियों की चिंताओं का समाधान करना होगा। आखिरकार 80 के दशक के शुरूआती दिनों में एक अछूत पार्टी के दर्जे से एक लम्बा सफर तय करते हुए आज यह 33 राजग सहयोगियों तक आ पहुंची है। प्रस्ताव पर सम्भवत: सदन में चर्चा न हो पाए क्योंकि तमिलनाडु के सांसद कावेरी बोर्ड के गठन की मांग कर रहे हैं और सदन को नहीं चलने दे रहे हैं। न तो सरकार और न ही विपक्ष इस मुद्दे को सुलझाने में रुचि रखता है और अंतत: यह सत्र भी बेकार चला जाएगा।-कल्याणी शंकर

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