नौतोड़ भूमि : संवैधानिक विलंब की मानवीय कीमत

punjabkesari.in Friday, Oct 23, 2026 - 04:39 AM (IST)

हिमाचल प्रदेश में नौतोड़ भूमि का विवाद अब संवैधानिक सतर्कता और मानवीय अपेक्षाओं के बीच टकराव का रूप लेता जा रहा है। राज्यपाल कविंदर गुप्ता ने पात्रता संबंधी स्पष्टता और पारदर्शी नियमों पर जोर दिया है। लेकिन यदि समय रहते निर्णय नहीं हुआ, तो राजभवन और सुखविंदर सिंह सुक्खू सरकार के बीच टकराव बढ़ सकता है। पूर्व राज्यपाल, शिव प्रताप शुक्ल के कार्यकाल में नौतोड़ भूमि संबंधी विधेयक लंबे समय तक लंबित रहा। सरकार के प्रयासों के बावजूद अपेक्षित प्रगति नहीं हुई। अब राज्यपाल के सामने चुनौती कानूनी पहलुओं की जांच के साथ हजारों परिवारों को राहत देने और संवैधानिक प्रक्रिया की गरिमा बनाए रखने की है। प्रदेश के जनजातीय क्षेत्रों में लगभग 20,000 मामले लंबित बताए जाते हैं, जबकि किन्नौर में आंदोलन तेज हो रहा है। प्रभावित परिवारों के लिए खेती योग्य जमीन केवल संपत्ति नहीं, बल्कि आर्थिक आत्मनिर्भरता और सुरक्षित भविष्य का आधार है।

संवैधानिक सतर्कता बनाम जवाबदेही: राज्यपाल से भूमि नीति को बिना परीक्षण मंजूरी देने की अपेक्षा नहीं की जा सकती। नौतोड़ आवंटन वन संरक्षण, पर्यावरणीय संवेदनशीलता और जनजातीय क्षेत्रों की विशेष संवैधानिक व्यवस्थाओं से जुड़ा है। पात्रता की पुष्टि जरूरी है, ताकि संरक्षित भूमि का दुरुपयोग और अपात्र लोगों को लाभ पहुंचाने की आशंका समाप्त हो। 

सरकार की परीक्षा : सुक्खू सरकार वर्ष 2022 में सत्ता संभालने के बाद से इस मुद्दे को आगे बढ़ाने का प्रयास करती रही है। किन्नौर के राजस्व मंत्री जगत सिंह नेगी ने राज्यपाल और उनके पूर्ववर्ती के समक्ष कई बार मामला उठाया। राजस्व मंत्री जगत सिंह नेगी ने आरोप लगाया है कि राजभवन ने जानबूझकर इस जनहित से जुड़े मामले को लंबित रखा, जबकि इसका सीधा संबंध जनजातीय समुदायों के हजारों भूमिहीन परिवारों की आजीविका से है।

सरकार पात्र जनजातीय परिवारों को भूमि देने के लिए मौजूदा प्रतिबंधों में छूट चाहती है : किन्नौर में नौतोड़ अधिकार यात्रा प्रभावित समुदायों की बढ़ती निराशा का संकेत है। यह विवाद अब राजस्व विभाग और राजभवन के बीच प्रशासनिक मामला भर नहीं रहा, बल्कि जनजातीय समाज से किए गए वादों को पूरा करने की सरकार की क्षमता की परीक्षा बन गया है। कांग्रेस सरकार की विश्वसनीयता इस बात पर निर्भर करेगी कि वह आश्वासनों को व्यावहारिक समाधान में बदलती है या नहीं। दूसरी ओर, राज्यपाल का समयबद्ध निर्णय संवैधानिक जांच और जनशिकायतों के निवारण के बीच संतुलन स्थापित कर सकता है।

भूमिहीनता का व्यापक प्रभाव : किन्नौर, लाहौल-स्पीति और पांगी-भरमौर में खेती योग्य भूमि सीमित है। कृषि और बागवानी आजीविका के प्रमुख साधन हैं, जबकि वैकल्पिक रोजगार के अवसर कम हैं। दुर्गम भूगोल और कठोर जलवायु के कारण उपजाऊ जमीन का महत्व और बढ़ जाता है।
भूमिहीन परिवार के लिए जमीन आर्थिक स्वतंत्रता, पारिवारिक सुरक्षा और अगली पीढ़ी के बेहतर भविष्य का आधार बन सकती है। इससे दूरदराज के गांवों से पलायन रोकने में भी मदद मिल सकती है।

समयबद्ध समाधान जरूरी : राज्यपाल सत्यापित जिला-वार आंकड़ों के आधार पर पात्र परिवारों को विवादित और अधूरे मामलों से अलग करने का निर्देश दे सकते हैं। प्रत्येक आवेदन की जांच स्पष्ट मानदंडों के अनुसार हो तथा अस्वीकृति के कारण दर्ज किए जाएं। पात्रता संबंधी नियम सार्वजनिक किए जाएं और प्रतिबंधित भूमि को कानून के अनुरूप सुरक्षित रखा जाए।

नौतोड़  विवाद अंतत: जनजातीय अधिकारों, पर्यावरण संरक्षण और संवैधानिक जिम्मेदारी की परीक्षा है। हजारों परिवारों के लिए सवाल केवल भूमि आवंटन का नहीं, बल्कि न्यायपूर्ण और विश्वसनीय समाधान का है। संवैधानिक जिम्मेदारी का मूल्यांकन केवल निर्णय की सावधानी से नहीं, बल्कि उसकी निष्पक्षता और समयबद्धता से भी होना चाहिए।-के.एस. तोमर
 


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