न्यूनतम समर्थन मूल्य की गारंटी : क्या और कैसे

punjabkesari.in Tuesday, Dec 06, 2022 - 04:36 AM (IST)

इस साल तो लहसुन का किसान बर्बाद हो गया। कम से कम भी लगाएं तो 1 किलो लहसुन की लागत किसान को 12 से 15 रुपए पड़ती है। लेकिन इस साल उसे सिर्फ 3 से 5 रुपए किलो मंडी में मिल रहा है। मंडी में ले जाने का खर्चा भी नहीं निकल रहा। एक जमाना वह भी था कि लहसुन बेचकर आते थे और उसी कमाई से मोटरसाइकिल या कभी कार भी खरीद लेते थे। इस साल तो कर्जा भी नहीं चुका पाए हैं।’ यह कहानी पश्चिमी मध्य प्रदेश के किसान की है। राजस्थान और गुजरात से जुड़े इस इलाके में किसान लहसुन के अलावा प्याज की खेती भी करते हैं, इस साल उसमें भी घाटा हुआ। लागत है 6 से 7 रुपए किलो, लेकिन बाजार में 1 रुपए किलो तक बिका। 

समस्या केवल इस साल या मध्य प्रदेश की नहीं है। भारत जोड़ो यात्रा के दौरान अब तक 7 राज्यों के किसानों से संवाद करने का अवसर मिला है। हर इलाके की समस्या अलग है। लेकिन एक दर्द देश के हर किसान को जोड़ता है। बाजार में फसल का सही दाम नहीं मिलता। 

प्याज और लहसुन जैसी सब्जियों या फिर फलों पर तो कोई न्यूनतम समर्थन मूल्य है ही नहीं, लेकिन जिन फसलों पर समर्थन मूल्य घोषित भी होता है वहां भी नहीं मिलता। मूंग, चना, अरहर जैसी दालों पर कागज में न्यूनतम समर्थन मूल्य घोषित होता है लेकिन खरीद नहीं होती, जिसके फलस्वरूप बाजार में किसान को सरकार द्वारा घोषित न्यूनतम समर्थन मूल्य से हजार या दो हजार रुपए तक का घाटा होता है। धान और गेहूं पर सरकारी खरीद होने के बावजूद अधिकांश जगहों पर किसान घाटा खाकर व्यापारी को फसल बेचता है। 

इसलिए देशभर में किसान आंदोलन में तमाम मतभेदों के बावजूद एक मांग पर सहमति बनी है : एम.एस.पी. की कानूनी गारंटी मिलनी चाहिए। दिल्ली के ऐतिहासिक किसान मोर्चा से पहले कुछ किसान नेताओं और विशेषज्ञों को छोड़कर एम.एस.पी. का नाम अधिकांश किसान कार्यकत्र्ताओं ने भी नहीं सुना था। लेकिन अब एम.एस.पी. हर किसान और स्थानीय किसान नेता की जुबान पर है। साधारण किसान यह तो  ठीक से नहीं जानता कि एम.एस.पी. क्या है और कैसे मिल सकती है, लेकिन इतना जानता है कि उसका कुछ हक है जो उसे मिल नहीं रहा। इस मुद्दे पर एक राष्ट्रव्यापी आंदोलन खड़ा करने के लिए यह पर्याप्त है। लेकिन अब भी अलग-अलग किसान नेता और संगठन न्यूनतम समर्थन मूल्य की कानूनी गारंटी की मांग को अलग-अलग तरीके से पेश करते हैं। इसलिए यह जरूरी है कि इस सवाल पर सफाई हो।

एम.एस.पी. की कानूनी गारंटी का मतलब है कि हर किसान को पूरी फसल पर लाभकारी न्यूनतम समर्थन मूल्य मिलने की कानूनी गारंटी दी जाएगी। इस एक वाक्य में चार मांगें अंतर्निहित हैं। पहली, कि सभी फसलों पर न्यूनतम समर्थन मूल्य  घोषित किया जाएगा। फिलहाल केंद्र सरकार सिर्फ 23  फसलों (मुख्यत: अनाज, दलहन और तिलहन) पर एम.एस.पी. की घोषणा करती है। किसान आंदोलन की मांग होनी चाहिए कि इस सूची में तमाम मोटे अनाज, वन उपज, फल सब्जी और दूध अंडा को भी शामिल किया जाए, किसान की आजीविका के लिए महत्वपूर्ण इन सभी फसलों का न्यूनतम समर्थन मूल्य घोषित किया जाए। 

दूसरी मांग है कि एम.एस.पी. का निर्धारण लाभदायक मूल्य के सिद्धांत से होगा। यानी स्वामीनाथन कमीशन द्वारा सुझाए फार्मूले के अनुसार एम.एस.पी. पूर्ण लागत ( सरकारी भाषा में सी2 लागत) पर कम से कम 50 प्रतिशत लाभ के हिसाब से तय होगी। तीसरी मांग यह है कि सरकार सिर्फ एम.एस.पी. की घोषणा नहीं करेगी, बल्कि सभी किसानों को उनकी पूरी फसल पर कम से कम एम.एस.पी. जितना दाम दिलवाने की जिम्मेदारी स्वीकार करेगी।

चाहे सरकार खुद फसल की खरीद करे या अन्य कोई उपाय करे लेकिन किसान को उतना दाम दिलवाना सरकार का काम है। इस मांग का अंतिम और चौथा अंश यह है कि एम.एस.पी. दिलवाना केवल सरकारी योजना नहीं होगी, बल्कि मनरेगा की तरह एक कानून बनाकर इसकी गारंटी दी जाएगी। यानी अगर किसान को एम.एस.पी. से कम दाम मिले तो वह कोर्ट कचहरी जाकर अपना अधिकार ले सके, हर्जाना मांग सके। 

जब एम.एस.पी. की कानूनी गारंटी की मांग को इस स्वरूप में पेश किया जाता है तो यह सवाल उठाया जाता है कि यह कैसे संभव होगा? राजनेता पूछते हैं कि क्या सचमुच इसे लागू किया जा सकता है? अफसर सवाल उठाते हैं कि इसकी व्यावहारिकता क्या होगी? अर्थशास्त्री पूछते हैं क्या इतना पैसा सरकार के पास है? सरकार यह गारंटी ले कि गेहूं और धान आदि की सरकारी खरीद का वर्तमान स्तर कम नहीं किया जाएगा। साथ ही मोटे अनाज, दलहन और तिलहन की पर्याप्त सरकारी खरीद की जाएगी। दूसरा तरीका है भावांतर, यानी बाजार में दाम कम मिलने पर सरकार एम.एस.पी. और बाजार भाव के अंतर की भरपाई करेगी। यह प्रयोग मध्य प्रदेश में फेल हो गया था लेकिन जब इसे बदले हुए स्वरूप में गंभीरता से हरियाणा में बाजरा के लिए लागू किया गया तो इसमें काफी सफलता मिली। 

तीसरा, बाजार में दाम  गिरने पर सरकार खरीदी कर दाम ठीक करेगी। यह कोई नया विचार नहीं है। कपास जैसी फसल में सरकार यही करती है। इस उद्देश्य से सरकार की एक योजना भी है, लेकिन बजट में इसके लिए पर्याप्त फंड नहीं रखे जाते। इस योजना को गंभीरता से लागू करना होगा। चौथा, आयात-निर्यात नीति से दाम गिरने से रोका जाएगा। पांचवां और अंतिम औजार कानूनी प्रावधान हो सकता है कि मंडी में एम.एस.पी. से कम पर बोली लगाने पर पाबंदी होगी। लेकिन यह ध्यान रहे कि अगर पहले चार कदम नहीं उठाए गए तो यह पांचवां औजार निरर्थक और खतरनाक हो सकता है।

इन पांचों औजारों का समझदारी से इस्तेमाल करने पर किसान को अपनी मेहनत का पूरा दाम दिलवाने का सपना पूरा किया जा सकता है। संयुक्त किसान मोर्चा ने 26 नवम्बर से इस मांग और किसानों की अन्य मांगों को लेकर एक राष्ट्रव्यापी आंदोलन की घोषणा कर दी है। मोर्चे के बाहर के किसान संगठनों ने भी इस मांग का समर्थन किया है। आशा करनी चाहिए कि किसान आंदोलन इन छोटे मतभेदों को भुलाकर 2024 के चुनाव से पहले एम.एस.पी. की कानूनी गारंटी पर एक निर्णायक लड़ाई लड़ेगा।-योगेन्द्र यादव
 


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