दल-बदलुओं के लिए लगा बाजार

2021-06-16T02:31:49.06

इस गर्मी के मौसम में भारत की राजनीति में भी गर्मी महसूस की जा रही है और कैसे? भारत की राजनीति में आज कोई यह नहीं जानता कि कौन किसके साथ गमन कर रहा है, कौन पाला बदल रहा है क्योंकि मित्र और शत्रु सब एक जैसे बन गए हैं। यह इस बात को रेखांकित करता है कि राजनीति में कोई स्थायी शत्रु या मित्र नहीं होते हैं, केवल हित स्थायी होते हैं और सत्ता ही सब कुछ है और इस क्रम में दल-बदल आम बात बन गई है, मानो जैसे इनका बाजार लग गया हो।

पिछले सप्ताह यह खेल बखूबी देखने को मिला। भाजपा के मुकुल रॉय की ममता की तृणमूल कांग्रेस में घर वापसी हुई तो उसके बाद उत्तर प्रदेश के ब्राह्मण नेता जितिन प्रसाद भाजपा में शामिल हो गए और चिराग पासवान की लोजपा के पांच सांसदों ने स्वयं को असली पार्टी बताया और चिराग को अलग कर दिया। एक ओर यह कहा जा सकता है कि ममता बनर्जी भाजपा को उसी की भाषा में जवाब दे रही हैं जिस भाषा में चुनाव पूर्व तृणमूल कांग्रेस के नेताओं ने व्यापक स्तर पर दल-बदल किया था किंतु कुछ लोग यह भी मानते हैं कि जो दल-बदल करते हैं वे महत्वपूर्ण नहीं हैं अपितु उनका दल-बदल करना महत्वपूर्ण है। 

कांग्रेस पार्टी से जितिन प्रसाद का अलग होना यह बताता है कि आज कांग्रेस में दम नहीं रह गया है और यह एक डूबता हुआ जहाज है। किंतु दल-बदलुआें का स्वागत कर भाजपा के लिए भी सब कुछ सुखद नहीं है। उसके समक्ष संगठनात्मक चुनौतियां पैदा हो रही हैं क्योंकि बंगाल, मध्य प्रदेश और कर्नाटक में पार्टी के पुराने और निष्ठावान कार्यकत्र्ता नाराज हो रहे हैंं। 

पार्टी कार्यकत्र्ताओं ने कोलकाता में एक विरोध प्रदर्शन किया। मध्य प्रदेश और कर्नाटक में शिवराज सिंह और येद्दुरप्पा हालांकि कांग्रेस और जद (एस) सरकार को दल-बदल करवाकर अपदस्थ करने में सफल रहे हैं। मध्य प्रदेश में ज्योतिरादित्य सिंधिया अपने 25 समर्थक विधायकों के साथ भाजपा में शामिल हो गए थे तो कर्नाटक में 15 विपक्षी विधायक भाजपा में शामिल हो गए थे। आज भारत के बड़े भूभाग पर भाजपा का नियंत्रण है और वह एक तरह से दल-बदलुओं का महागठबंधन बन गया है। कांग्रेस के नेता पार्टी छोड़ते जा रहे हैं। 

यह सच है कि दल-बदल कर भाजपा को उन नए राज्यों और निर्वाचन क्षेत्रों में उपस्थिति दर्ज कराने का अवसर मिला है जहां उसकी उपस्थिति न के बराबर थी। पूर्वोत्तर, पश्चिम बंगाल और आंध्र प्रदेश में भाजपा ने पैर जमा दिए हैं किंतु इस दल-बदल की कोई गारंटी नहीं होती है। कुल मिलाकर राजनीति प्रतिस्पर्धी की शक्ति को कम करने का खेल है और एक बार यह प्रयोजन पूरा हो जाता है तो वे आपकी भी उपेक्षा करने लग जातेे हैं। 

विजेता कोई चूक नहीं कर सकता है। दल-बदल करने वाला नेता जब सत्तारूढ़ दल में शामिल होता है तो उसके सारे अपराध माफ हो जाते हैं। एसोसिएशन फोर डैमोक्रेटिक रिफार्म के आंकड़े बताते हैं कि वर्ष 2016-2020 के बीच जिन 405 विधायकों ने दल-बदल किया उनमें से 182 विधायक भाजपा में शामिल हुए जबकि 170 विधायकों ने भाजपा छोड़ी। जिसके चलते मणिपुर, मध्य प्रदेश, गोवा अरुणाचल प्रदेश में सरकारें गिरीं और भाजपा के केवल 18 अर्थात 4$ 4 प्रतिशत विधायकों ने दल-बदल किया। जिन 357 विधायकों ने विधानसभा चुनाव लडऩे के लिए दल-बदल किया उनमें से केवल 170 अर्थात 48 प्रतिशत ही विजयी हुए। किंतु विधान सभा उपचुनावों में से 48 मेें 39 अर्थात 81 प्रतिशत दल बदलू फिर से निर्वाचित हुए। 

इसी दौरान लोकसभा के 12 और राज्य सभा के 16 सांसदों ने दल बदलकर चुनाव लड़ा। इनमें से 5 ने भाजपा छोड़ी और अन्य पार्टी  में शामिल हुए और इनमें  से जिन लोगों ने फिर से चुनाव लड़ा उनमें से कोई विजयी नहीं  हुआ। राज्यसभा में जिन 16 सांसदों ने दल बदल किया उनमें से 10 भाजपा में शमिल हुए जिनमें से 7 कांगे्रसी सांसद थे। सभी दल बदलू पुन: निर्वाचित हुए। जिन 433 विधायकों और सांसदों ने दल बदल किया था उनमें से 52 प्रतिशत विजयी हुए। दल बदल रोधी कानून 1985 दल बदल पर रोक लगाता है किंतु यह रोक केवल अस्थायी होती है क्योंकि सत्तारूढ़ दल अपने सांसद या विधायक को स्पीकर बनाकर इसकी अनुमति देता है।

कानून कहता है दल-बदल करने वाले विधायक या सांसद को या तो त्यागपत्र देना चाहिए या अध्यक्ष को उन्हें अयोग्य घोषित करना चाहिए। इसलिए यदि दल बदल सत्तारूढ़ दल के अनुकूल होता है तो अध्यक्ष सांसद या विधायक का त्यागपत्र स्वीकार कर देता है और यदि स्थिति इसके विपरीत होती है तो उसे अयोग्य घोषित कर देता हैं। तेलंगाना और गोवा के उदाहरण बताते हैं कि कानून की हर खामी का लाभ उठाया गया है। 

सत्ता, बाहुबल और धन बल की लालसा आज की राजनीति की कसौटी बन गए हैं। स्पष्ट है कि जब तक सुविधा और अपने लाभ की राजनीति पर अंकुश नहीं लगाया जाता, लोकतंत्र का उपहास होता रहेगा। समय आ गया है कि दल बदल रोधी कानून की खामियों को दूर किया जाए क्योंकि राजनीति के संचालन के लिए निष्पक्षता, स्वतत्रंता, समानता, ईमानदारी, सत्यनिष्ठा और विश्सनीयता की आवश्यकता है। देखना यह है कि  क्या हमारे नेता और राजनीतिक दल विश्वास, साहस और आम सहमति की राजनीति पुन: शुरू करते हैं या नहीं। 

इस समस्या का समाधान क्या है। इसका एक समाधान यह है कि दल-बदल करने वाले विधायकों और सांसदों पर मंत्री बनने या किसी भी सार्वजनिक पद या लाभ के पद को अगले चुनाव तक धारण करने पर रोक लगाई जाए। दूसरा, सरकार को गिराने के लिए दल-बदलू द्वारा दिए गए मत को अवैध घोषित किया जाए। एक नया कानून लाया जाए जिसमें दल-बदल या त्यागपत्र देने पर रोक लगाई जाए।-पूनम आई.कोशिश

 


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Content Writer

Pardeep

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