बहुत सी महिलाएं अपने घर व बच्चों के कारण नौकरी नहीं कर पातीं

punjabkesari.in Tuesday, Jul 14, 2026 - 04:06 AM (IST)

नैशनल स्टैटिस्टिक्स आफिस (एन.एस.ओ.) की एक रिपोर्ट में हाल ही में बताया गया कि 69 प्रतिशत महिलाएं अपने बच्चों और घर की देखभाल के कारण नौकरी नहीं कर पातीं। इनमें से बहुत सी उच्च शिक्षित और प्रोफैशनल डिग्रियों से लैस हैं। लेकिन जब उन्हें परिवार और नौकरी में से किसी एक को चुनना पड़ता है, तो वे परिवार को प्राथमिकता देती हैं। जबकि ऐसा करने वाले पुरुषों की संख्या मात्र 1 प्रतिशत है। यह रिपोर्ट देश के बड़े 46 शहरों के बारे में है, जिनकी आबादी 10  लाख या उससे अधिक है। यानी कि कस्बों, गांवों में स्थिति क्या होगी, इसका सहज अंदाजा लगाया जा सकता है। पूरे भारत के बारे में तैयार तमाम रिपोर्ट्स से पता चलता है कि यह 73 प्रतिशत है, जहां बच्चे के जन्म के बाद अक्सर स्त्रियां रोजगार को तिलांजलि दे देती हैं।

यह स्थिति भारत में ही नहीं, तमाम विकसित कहाए जाने वाले देशों में है। भारत में अच्छे डे केयर सैंटर्स की सुविधा महानगरों तक में बहुत कम है, जबकि अमरीका में डे केयर सैंटर में बच्चों को रखना बहुत महंगा है। दफ्तरों के आने-जाने का समय भी लचीला नहीं है, इसलिए वहां भी बहुत सी स्त्रियां बच्चों को संभालने के लिए नौकरी छोड़ देती हैं। यही नहीं, तय समय पर काम पर लौटने की अनिवार्यता भी स्त्रियों को काम छोडऩे पर मजबूर करती है। एक समस्या यह भी है कि चाहे स्त्री पूरे दिन काम करके थकी-हारी लौटे लेकिन बच्चों और घर को संभालने की प्राथमिक जिम्मेदारी उसकी ही मानी जाती है। ऐसे में यदि बच्चा छोटा है, तो यह और अधिक बढ़ जाती है। इसलिए यही आसान  लगता है कि पहले वे बच्चे की ठीक से देखभाल कर लें, जब वह कुछ बड़ा हो जाए, तो फिर से नौकरी की तलाश करें। हालांकि जैसे-जैसे वक्त गुजरता है, ऐसी महिलाओं के लिए रोजगार के अवसर कम होते चले जाते हैं। बहुत साल पहले कई कम्पनियों ने तय किया था कि जो महिलाएं बच्चों को पालने के लिए काम से दूर रहती हैं, यदि वे दोबारा नौकरी प्राप्त करना चाहें तो उन्हें प्रोत्साहित किया जाए, न कि नौकरी न देकर उहें दंडित किया जाए।

स्त्रियों के रोजगार छोडऩे के सबसे बड़े कारणों में बताया जाता है प्रसूति अवकाश के बाद काम पर लौटने की निश्चित अवधि का होना। दफ्तर के समय में, वहां आने-जाने के समय में कोई लचीलापन न होना। पारंपरिक रूप से मां और पत्नी के कत्र्तव्यों की सूची का लम्बा होते चले जाना, जिसमें स्त्री के रोजगार के मुकाबले, घर के प्रति प्राथमिकता हमेशा रेखांकित की जाती है। जहां सिर्फ कत्र्तव्य लादे जाते हैं, किसी भी तरह की सुविधा और अधिकार देने की बात नहीं की जाती। जबकि कत्र्तव्य और अधिकार एक-दूसरे के पूरक ही हैं। एक हमेशा दूसरे के बिना अधूरा ही है। इसके अलावा इन दिनों बच्चों को पालना, उनकी शिक्षा-दीक्षा बहुत महंगी है। स्त्रियां सोचती हैं कि वे बच्चों को किसी और के भरोसे छोडऩे के लिए डे केयर सैंटर या घरेलू सहायिका की मदद ले रही हैं। इन पर खूब पैसे खर्च कर रही हैं, बच्चे भी मां से दूर हैं, तो क्यों न खुद उनकी देखभाल करें। इससे जो पैसा नौकरी से कमाकर औरों पर खर्च कर रही हैं, वह भी बच जाएगा। बच्चों को भी मां का समय और देखभाल मिल जाएगी। 

जब इस रिपोर्ट को पढ़ रही थी, तो कुछ बातें समझ में आ रही थीं। एक तो यह कि रिपोर्ट पूरी तरह से शहर केंद्रित है, खास तौर से उन शहरों पर, जहां की आबादी 10 लाख से ऊपर है। इसमें जिन स्त्रियों की बात की गई है, उनमें से अधिकांश एकल परिवारों में ही रहती होंगी। क्योंकि जिन परिवारों में बुजुर्ग रहते हैं, चाहे वे खुद कितनी ही परेशानियों में हों, अक्सर अपने नाती-पोतों, पोतियों की देखभाल में खुशी महसूस करते हैं। उनका समय भी कटता है। बच्चों  की तरह-तरह की लीलाएं देखकर मुदित भी होते हैं। अपना बचपन भी याद आता है। 
इसके अलावा न जाने क्यों भारत में स्त्री विमर्श से वे अधिसंख्य स्त्रियां गायब हैं, जो बड़े शहरों में नहीं रहतीं।  

मध्यवर्ग की नहीं हैं। जिनके पास असीमित साधन भी नहीं। जिनके बच्चे भी हैं लेकिन यदि वे काम न करें, तो एक दिन का भोजन भी न पके। इसलिए अपने बच्चों को ही अपने साथ काम पर ले जाती हैं। कभी मजदूरी करने, कभी खेत पर काम करने। इनके बच्चे किसी सड़क के किनारे या किसी पेड़ के नीचे गर्मी, सर्दी, धूप, ताप सहते हुए दिन काट लेते हैं। मां जब खाना खाने आती है, तभी एक नजर इन्हें देख लेती है, दूध पिलाना हो तो दूध पिला देती है। 

बल्कि छोटे शहर तो क्या, इस लेखिका का दफ्तर  दिल्ली के कनाट प्लेस में था। एक बार वहां सड़क और सब-वे का निर्माण हो रहा था। एक गर्भवती महिला ईंटें ढोने का काम करती थी। एक दिन पता चला कि आज उसका बच्चा हुआ है। लगा कि अब वह कई दिनों तक शायद न दिखे। लेकिन यह देखकर दंग रह गई कि वह अगले ही दिन से फिर ईंटें ढोने लगी।-क्षमा शर्मा 
 


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